ओलम्पिया वल्र्ड नेपाल का पहला स्मार्ट क्लास वाला स्कूल

० आप अपने स्कूल के विषय में कुछ बताएँ ।
–मैं ओलम्पिया वल्र्ड उमावि में प्राचार्य के रूप में कार्यरत हूँ । यह स्कूल ४ साल पहले एक अलग सोच के साथ स्थापित हुआ था । यह विद्यालय

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आर.डी भट्ट, प्रिन्सिपल
ओलम्पिया वल्र्ड स्कूल

बबरमहल काठमांडू में है । कक्षा १ से १२ तक पढ़ाई होने वाले इस स्कुल के छात्र उमावि शिक्षा परिषद (एचएसइबी) द्वारा ली गई परीक्षा में नेपाल में तृतीय स्थान हासिल कर चुके हैं ।
० आपके स्कूल की शिक्षण पद्धति क्या है ?
– हमारा स्कूल नेपाल का पहला स्मार्ट क्लास वाला स्कूल है । हर सेक्सन में २२ से २४ विद्यार्थी को रखा जाता है । सीएसी के अलावा अतिरिक्त क्रियाकलाप, सुन्दर वातावरण, इन्डिभिजुअल क्लास, प्रैक्टिकल एप्रोच, अनुसन्धानात्मक शिक्षण विधि, डोर टु डोर यातायात सर्भिस, लगनशील शिक्षक, अव्वल व्यवस्थापन, स्थापित प्रोफेसर, लेखक, नामी शिक्षाविद का इस में संलगता होना इसकी अलग पहचान है ।
० शिक्षा को गुणस्तरीय बनाने के लिए आपकी क्या नीति है ?
– हम हर एक बच्चे को एक नितान्त अलग व्यक्तित्व के रूप में देखते हैं । और हरएक को सम्मान और अवसर देते हैं । प्राइभेट शिक्षा एक अनुशासित बिजनेस है । लेकिन हम बिजनेस से ज्यादा शिक्षा में ध्यान देते हैं । हमारे विद्यालय में  रिसर्च विभाग है, जो निरन्तर रिसर्च और शैक्षणिक विकास में कटिवद्ध है ।
० शिक्षक का चुनाव आप कैसे करते हैं ?
– हमारे पास सैकड़ों की संख्या में निवेदन आते हैं । उसकी सॉर्ट लिस्टिङ करके हम लिखित परीक्षा लेते हैं । जो लिखित परीक्षा में उत्तीर्ण होते हैं, उन्हें इन्टरभ्यू के लिए बुलाया जाता है । जीडी के पश्चात् डेमो क्लास में अव्वल को हम नियुक्ति देते हंै ।
० बच्चों का बचपन भारी बैग और होमवर्क के बोझ से दबता जा रहा है ? आप इस पर कहाँ तक सहमत हैं ?
– ओलम्पिया के लिए यह तथ्य नहीं है । यहाँ हर बच्चे को एक लॉकर मिलता है । उसमें कॉपी–किताब रखते हैं । होमवक भी सीमित दिया जाता है । हम होमवर्क और परीक्षा से ज्यादा सिखाई में विश्वास रखते हैं, जो बच्चे स्कूल में भरपूर आनन्द के साथ करते हैं । ये पद्धति दूसरे स्कूल भी लागू कर पाएँगे तो सब बच्चों को लिए अच्छा होगा ।
० स्कूल की प्रारम्भिक शिक्षा की शुरुआत के लिए बच्चों की सही उम्र क्या होनी चाहिए ?
– ओलम्पिया एक से १२ तक के बच्चों के लिए है । यहाँ साढेÞ पाँच से ६ साल के बच्चों का एडमिशन लिया जाता है । समग्र में बच्चों को पाँच साल से नीचे एडमिशन करके मानसिक दवाब नहीं देना चाहिए । उनको अपने बचपन का भरपूर लुप्त उठाने देना चाहिए ।
० आप बच्चों के अभिभावक से क्या अपेक्षा रखते हैं ?
– घर पहला स्कूल है । अभिभावक शिक्षा के अभिन्न अंग है । बच्चे के व्यक्तित्व विकास में अभिभावक की विशेष जिम्मेदारी होती है । एक बच्चा अपने परिवार के संस्कार और स्कूल से मिली शिक्षा लेकर समाज में योगदान देने के लिए तैयार होता है ।
० बच्चों की मानसिकता को समझने के लिए उनके अभिभावक से जुड़ना आवश्यक होता है, इस दिशा में आपका स्कूल क्या प्रयास करता है ?
– हम समय–समय में अभिभावकों से अन्तरक्रिया करते हैं । उनको जानकारी देते हैं । और एक सहकारी के रूप में सुझाव सलाह लेते हैं । सफलता की कुंजी सहकार्य में है । हम यह समझते हैं । हमारे यहाँ बच्चों को व्यवहारिक अध्ययन दिया जाता है । उनकी रुचि और व्यवहार में आते परिवर्तन को हमारा सर्टिफाइड काउन्सिलर अध्ययन करती है और अभिभावक के साथ सहकार्य करके बच्चों को सुधार करती हैं ।
० सभी बच्चे एक से नहीं होते, जो पढने में कुछ कमजोर होते हैं, क्या उसके लिए कोई विशेष व्यवस्था है आपके यहाँ ?
– कोई बच्चा पढ़ाई में कमजोर हो सकता है, लेकिन वह किसी और चीज  में अच्छा होगा । हर बच्चे की जो एक अलग पहचान है, हम उसको उजागर करने का प्रयास करते हैं । ‘आफ्टर स्कूल प्रोग्राम’ में बच्चे शिक्षकों से ज्यादा सीख पाएँगे, इसलिए इसकी व्यवस्था की गई है ।
० अंत में नेपाल बोर्ड और सीबीएससी बोर्ड की कोई कमी कमजोरी आपकी नजर में ?
– हम दोनों स्कूलों में प्राचार्य रह चुके हैं ।  सीबीएससी बोर्ड की अपनी खूबी है और एसएलसी बोर्ड की अपनी । एसएलसी बोर्ड में अंग्रेजी  और सीबीएससी में गणित में ध्यान दिया जा सकता है । लेकिन बोर्ड के विद्वान सदस्यों को शिक्षार्थियों, भौगोलिक, भाषिक असमानताओं को ध्यान में रखते हुए अपने कार्य में और मापन प्रणाली में ध्यान देना चाहिए । हम को लगता है, पठन–पाठन से दक्षिण एसियाई क्षेत्र में तो मापन में ज्यादा ध्यान दिया जाता है । परीक्षा तो पढ़ाई की ट्रेनिङ है । इस चीज को अभिभावक, विद्यार्थी, शिक्षक, बोर्ड, समाज को अच्छी तरह समझना चाहिए ।
प्रस्तुतिः कविता दास

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