ओलीजी की विभेदकारी नीति ही सीके राउत को जन्म दिया है : श्वेता दीप्ति

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जिम्मेदार पार्टी ने ही देश को दो भागों में बाँट दिया है । जनता की भावनाओं को उकसा कर और राष्ट्रवाद का हवाला देकर माननीय ओली जी ने देश को जिस दो छोरों पर लाकर खड़ा कर दिया है क्या यह विखण्डन की शुरुआत नहीं है ? मधेश की माँग को आयातित कहकर उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ करना, क्या हवन में समिधा का काम नहीं कर रही ?
सवाल यह है कि स्वतंत्र मधेश की माँग, उपनिवेशवाद के अन्त की माँग अगर विखण्डन है तो राष्ट्र के एक प्रमुख पार्टी के अध्यक्ष के द्वारा देश के एक महत्तवपूर्ण हिस्से की जनता को विदेशी कह कर अपमानित करना और अवहेलित करना क्या विखण्डन की आग को सुलगाना नहीं है ?
श्वेता दीप्ति, काठमांडू ,८ फरवरी | नेपाल की राजनीति में कुछ एक शब्द हैं जिसने अपना एक महत्तवपूर्ण स्थान बना लिया है । ये प्रचलित शब्द हैं, समानुपाती, समावेशी, संघीयता, राष्ट्रवादी और विखण्डनकारी । यहाँ उल्लेखित दो शब्द आजकल अन्य शब्दों की अपेक्षा अधिक चर्चा में है वो है, राष्ट्रवादी और विखण्डनकारी । शब्द अलग हैं, शब्दों का गठन अलग है, सही मायने में इसके अर्थ भी अलग हैं किन्तु वर्तमान परिस्थितियों में ये शब्द कहीं ना कहीं एक दूसरे के पूरक बनते नजर आ रहे हैं । जहाँ अनावश्यक राष्ट्रवाद सर उठाता है वहीं असंतोष जन्म लेता है और यही असंतोष विखण्डन को जन्म देता है । सुनने में यह कड़वा है किन्तु सच यही है । राष्ट्र के प्रति समपर्ण, राष्ट्र से प्यार और राष्ट्र के प्रति सम्मान प्रत्येक सच्चे नागरिक का कर्तव्य है और इसका पालन भी करना चाहिए किन्तु जब इन्हीं भावनाओं को गलत तरीके से अपनाकर कोई एक समुदाय, किसी समुदाय विशेष को अवहेलित करता है और उसकी राष्ट्रीयता पर शक करता है तो वहाँ द्वन्द्व का जन्म होता है । 
नेपाल एक सार्वभौम सत्ता है और कई जातियों, विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों का सम्पोषक है । बावजूद इसके कई मुद्दों पर देश के दो समुदाय दो छोर पर नजर आते हैं और इसकी वजह राज्य और सत्ता की विभेदकारी नीति रही है । तराईवासी जिन्होंने अपनी पहचान मधेशी के रूप में स्थापित की है और पिछले मधेश आन्दोलन के पश्चात् विश्वपटल पर भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा ली है, उसे ही राज्य का एक तबका हमेशा शंकित नजरों से देखता आया है । यह शक हमेशा से मधेशियों को आहत करता आया है । इसी पीड़ा ने मधेश की नई पीढ़ी में असंतोष को जन्म दिया है । विगत में जिस भी मसले पर आन्दोलन हुए मधेश की जनता ने खुलकर साथ दिया । उस वक्त न तो कोई मधेशी था और न ही  कोई पहाड़ी । देश की जनता असंतुष्ट थी वर्तमान व्यवस्था से और जिसका प्रतिकार उन्होंने मिलकर किया जिसके फलस्वरूप आज के नेपाल की अवधारणा तैयार हुई । माना गया और नारा भी दिया गया “नया नेपाल” । पर क्या सचमुच कुछ बदला ? सोच और समस्याएँ अपनी जगह यथावत हैं ।
मधेश की जनता ने जिस भावना के साथ विगत के आन्दोलन में अपना साथ दिया, शहादत दी आज इन सबके बदले देश की केन्द्रीय पार्टी एमाले मधेश शब्द को ही मानने से इनकार कर रही है । इससे बड़ा दुर्भाग्य इस देश का क्या हो सकता है कि एक जिम्मेदार पार्टी ने ही देश को दो भागों में बाँट दिया है । जनता की भावनाओं को उकसा कर और राष्ट्रवाद का हवाला देकर माननीय ओली जी ने देश को जिस दो छोरों पर लाकर खड़ा कर दिया है क्या यह विखण्डन की शुरुआत नहीं है ? मधेश की माँग को आयातित कहकर उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ करना, क्या हवन में समिधा का काम नहीं कर रही ? जनता की भावनाओं को उकसाना, एक समुदाय को दूसरे समुदाय के खिलाफ खड़ा करना, समुदाय विशेष को विदेशी कह कर अपमानित करना, उनके अस्तित्व को ही नकार देना, उनकी भाषा, वेशभूषा और सभ्यता को ही हाशिए पर रख देना क्या ये सारी बातें राष्ट्र को बाँटने का काम नहीं कर रही ? यह देश को विखण्डन की राह पर धकेलना नहीं है तो और क्या है ? विश्व का वर्तमान परिवेश ऐसा नहीं है कि कोई भी राष्ट्र अपनी जनता की आवाज को दबाकर विकासशील और समृद्ध हो सकता है ।
कुछ देर के लिए शक्ति का उन्मादी प्रदर्शन आवाज रोक सकती है पर उसके भीतर के आक्रोश को ज्यादा समय तक दबाया नहीं जा सकता है । राज्य की इसी विभेदकारी नीति ने डा.राउत जैसी शख्शियत को जन्म दिया है और देश की यही स्थिति रही तो ऐसे कई राउत पैदा होंगे यह भी जाहिर सी बात है । कितनी हास्यास्पद बात है कि एक अदना सा व्यक्ति, जिसके पास न ही हथियार की शक्ति है और न ही सत्ता की शक्ति । बस गाँधी और मण्डेला की नीति का कमजोर सा आधार है । जिसके बल पर मधेश में एक अलग ही तरंग फैल गई है जिसने सरकार को बार बार परेशान किया है । फलस्वरूप हमेशा उन्हें और उनके समर्थकों को गिरफ्तार किया जाता है और फिर न जाने क्यों छोड़ भी दिया जाता है । कभी कभी तो लगता है कि सरकार डा. राउत को गिरफ्तार कर मधेश की जनता की नब्ज टटोलना चाहती है कि देखें इसका असर क्या होता है  । एक बार फिर वो हिरासत में हैं और इसके विरुद्ध मधेश में जगह जगह प्रदर्शन भी किए जा रहे हैं । सवाल यह है कि स्वतंत्र मधेश की माँग, उपनिवेशवाद के अन्त की माँग अगर विखण्डन है तो राष्ट्र के एक प्रमुख पार्टी के अध्यक्ष के द्वारा देश के एक महत्तवपूर्ण हिस्से की जनता को विदेशी कह कर अपमानित करना और अवहेलित करना क्या विखण्डन की आग को सुलगाना नहीं है ? एक विदेशी ने मधेश आन्दोलन के समय आन्दोलनकारियों के साथ फोटो खिचवा लिया तो उसे देश निकाला मिल गया, देश का एक नागरिक अगर विभेद के अन्त की बात करता है तो उसे हिरासत में रखा जाता है तो एक केन्द्रीय पार्टी के अध्यक्ष अगर राष्ट्रवादी सोच को हवा देकर देश की जनता को उकसा रहे हैं और आग में घी डालने का काम कर रहे हैं तो उसे क्यों नहीं रोका जा रहा है ? आखिर राज्य सत्ता यह क्यों नहीं समझ रही कि मधेश को नकारना ही देश को विखण्डित करना है इसलिए देश की एकता के लिए सही नीति और सही शासन व्यवस्था लागू कर देश को विकास की ओर ले जाना चाहिए । दो की लड़ाई तीसरे को लाभ पहुँचाती है इसलिए संविधान का कार्यान्वयन और सही संशोधन ही समस्या का समाधान कर सकती है जिसे जितनी जल्दी हो सम्पन्न किया जाना चाहिए तभी देश की दिशा सही हो सकती है ।

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