ओली ! अब तेरी वारी है, कब तक मधेश के साथ घोखाधड़ी करोगे : – गोपाल ठाकुर

गोपाल ठाकुर, कचोर्वा-१, बारा, जनवरी २२, २०१६|
कल गुरुवार को शक्ति-ओली की शख्ती ने तीन मधेशियों को फिर से ढेर कर दिया । गुरुवार को ही अलपज्ञ ओली की बोली से वार्ता भंग होने की भी खबरें आईं । किंतु अब भी सत्ताधारियों की ओर से वार्ता जारी रखने और मधेशी मोर्चा के नेताओं को मनाने की कोशिष जारी रहने की खबरें भी आ रही हैं । साथ ही शहादत को प्राप्त होनेवाले सभी आम मधेशी हैं । तीन में दो महिलायें हैं । तीनों आदिवासी मधेशी हैं । द्रोपती चौधरी, चिबू माझी ‌और महादेव ऋषिदेव के शिनाख्त को देखते हुए खस-गोर्खाली फिरंगियों का नकाब एक बार फिर से उतरा दिखता है । अपने भाँट जनों के जरिए कुछ खास जातियों के मधेशी नहोने या नेपाल में मधेश नहोने की दलील की पेशकश यहीं खारिज हो चुकी है ।

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यह घटना मोरंग जिले के रंगेली में तब हुई जब मधेशी आंदोलनकारी प्रदर्शन में जुटे थे और एमाले कार्यकर्ताओं को संबोधित करने की ओली की मनसुबा चकनाचूर होने के बावजूद उनके महासचिव ईश्वर को भी वहाँ के मधेशियों ने नहीं स्वीकारा । खस-गोर्खाली फिरंगियों की पुलिस ने तो गोलियाँ चलाई ही, इनके गुण्डों ने खुकुरी प्रहार भी किये । ऐसे बेरहम हैवानों के साथ जुझकर शहादत वरण करनेवाले बहनें ‌और बंधु को मैं सलाम करता हूँ । किंतु सत्ता और भत्ता के लिए एक तरफ अघोषित रूप से वार्ता के नाटक के जरिए इन खस-गोर्खाली फिरंगियों के तलवे चाटने पर उतारू और दूसरी तरफ मधेश आंदोलन के मसीहा बनने को लालायित दिखे दिवालियापन के शिकार कथित मधेशी नेताओं की आलोचना के लिए मैं शब्द नहीं जुटा पा रहा हूँ । आखिर कब तक मधेश राष्ट्र के साथ ये घोखाधड़ी चलेगी ? कब तक टुकड़ों में मधेश के लिए ये लोग लालायित रहेंगे ? कब तक अधिकार के लिए आम मधेशी शहीद होते रहेंगे और ये पाखंडी और बिकाऊ लोग मधेशियों के साथ कृतघ्नता प्रदर्शित करते हुए भी उनके मसीहा बने बैठे रहेंगे ?
जब महंथजी जैसे संत भी मधेश को राष्ट्र बताते हुए इसके साथ सार्वभौमसत्तासंपन्न देश होने के सारे अवयव मौजूद बताते हैं, राजेंद्रजी जैसे चट्टान व्यक्तित्व जारी संघर्ष को सशस्त्र बनाने की बात करते हैं, उपेंद्रजी इन फिरंगियों की नीति को दोगला बताते हैं, सभी के सभी संविधान निर्माण प्रक्रिया का बहिष्कार करते हैं, राजेंद्रजी तो अपने सभासदों से संविधानसभा से इस्तिफा भी दिलवाते हैं; तो फिर ऐसी क्या मजबूरी आ जाती है इनके साथ जो दर्जनों मधेशियों की जान लेनेवाले हत्यारे सुशील को ये लोग मधेश का हमदर्द समझकर उसी दुर्गंधित सदन में वोट डालने पहुँच जाते हैं ? जिस सदन में बहुमत के बल पर मधेशियों को लतियाकर संविधान लाया गया है वहाँ इनका भूला क्या है जो फिर से उसी गणितीय खेल में ऐसे शामिल होने पहुँचते हैं जैसे किसी मालिक ने अपने पशुओं को चाहे जितने चाबूक मारा हो, उनके चुचकारते ही वह पशु अहार खाने दौड़ जाता हो ।
तीसों बार की वार्ता और सार्वजनिक अभिव्यक्ति तक में भी जब कोई भी खस-फिरंगी नेता टुकड़ा मधेश भी दो प्रदेश तक देने को तैयार नहीं हैं, जब पिछले तीस-चालीस वर्षों के बीच मधेश में आकर बसे खस-गोर्खाली फिरंगी मधेश प्रदेश में रहने को तैयार तो नहीं है मधेशी भूमि को भी गैर मधेशी प्रदेश में ले जाने को उतारू हैं ‌और उनके नेता ऐसा ही करते हैं; तो फिर थारू-बाजी, हिंदू-मुस्लिम या फिर तथाकथित नेपाली स्वाधीनता या सार्वभौमिकता के नाम पर अधिकारविहीन टुकड़ा मधेश के लिए ये कथित मधेशी नेता क्यों बेताब हैं ?dharan-1
जाहिर है जिस अखण्डता या सार्वभौमिकता का मधेश या अन्य कोई भी गैर खस-गोर्खाली राष्ट्रीयता अगर हिस्सा नहीं बन पाई है तो वैसी अखण्डता और सार्वभौमिकता से ऐसे पाखंडी मधेशी नेताओं को मोह क्यों ? एक तरफ औपनिवेशीकरण कहना और दूसरे तरफ राष्ट्रीय पहचान पर आधारित संघीयता के तहत राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार सहित का समग्र मधेश एक प्रदेश से दूम दबाना मधेश के साथ गद्दारी नहीं तो और क्या है ? इतना ही नहीं जिनके एक इशारे पर मधेशी जनता पाँच-पाँच महीने से अपनी जान तक कुर्बान कर रही है, वे आंदोलन को उपहास बनाकर क्यों प्रदर्शित कर रहे हैं ? जब काठमांडू में खस-गोर्खाली फिरंगी इन्हें लात मारते हैं तब ये आंदोलन तेज करने को कहते हैं और जब चुचकार कर इन्हें वार्ता या वोटिंग के लिए बोलाया जाता है तो नंगे पाँव काठमांडू दौड़ जाते हैं । ये दोधारी चरित्र दिखाकर ये ठगना किसको चाहते हैं ? मधेशियों को या खूद को ?
आज ही मैं एक मधेश मसीहा को रेडियो पर सुन रहा था । उनके अनुसार केपी ओली के कारण वार्ता भंग हो गया शायद ! सुशील कोइराला ने इस पर केपी ओली की तिखी आलोचना भी की थी शायद ! प्रस्तुति का तरीका कुछ ऐसा लग रहा था जैसे सुशील के मन में मधेश बसता हो और मधेश आंदोलन का वही मसीहा हो । अगर ऐसा ही है तो फिर तीन दर्जन से अधिक मधेशियों को सुशील ने ही मौत की घाट क्यों उतारा ? अब भी अगर उसे मधेश समझ में आया है तो वह क्यों नही कम से कम मोर्चा की मांगे भी मान लेता है ? किंतु ऐसा वह करेगा नहीं । अब तक कांग्रेस, माले, एमाले, एमाओवादी, मजदूर-किसानवादी, मंडले किसी भी झुंड का कोई भी नेता एक तो क्या, दो मधेश भी देने को तैयार नहीं दिखता । बल्कि मधेश आंदोलन के विरुद्ध विष वमन ही करता रहता है । तो इन कथित मधेशी मसीहों का ऐसा दोमुहा चरित्र क्यों ? इसलिए अगर अब भी ये सही तरीके से राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार सहित समग्र मधेश एक प्रदेश सहित की मांगो के पक्ष में समझौताहीन संघर्ष के लिए एक महागठबंधन में नहीं आते हैं, अगर समझौताहीन संघर्ष का उद्घोष नहीं करते हैं, तो यह समझने में देर नहीं करनी चाहिए कि ये अपने मालिकों के हाथ बिक चुके हैं । केवल अपनी औकात बढ़ाने के लिए या यूँ कहें बरकरार रखने के लिए मधेशियों को मरवा रहे हैं ।
ऐसे कृतघ्न नेता खस-गोर्खाली फिरंगी से कैसे कम आँके जा सकते हैं ? तो फिर इनके फंदे में मधेश आंदोलन कब तक कैद रहेगा ? इन सभी बातों पर अब मधेशियों के लिए गंभीरतापूर्वक विचार करने का वक्त आ चुका है । अब यह अवसर भी आ पड़ा दिखता है कि पहले हिसाब-किताब इनके साथ हो । पहली संविधान सभा में मलाई मारने की प्रतिस्पर्धा में मधेश मसीहा के नाम पर इन्होंने ही मधेश को बंधक बनाया । दूसरी संविधान सभा में भी इनका कभी बहिष्कार तो कभी मतदान, कभी आंदोलन तो कभी वार्ता के द्वैध चरित्र ये सावित करता है कि इनके कारण से मधेश को नये तरीके से फिर गुलामी नसीब होने जा रही है । इसलिए अब भी ये अगर सही मधेशी चरित्र को अंगीकार करना चाहते हैं तो सुधरने की बारी अब पहले इनकी है ।

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