ओली की चीन यात्रा मील का पत्थर साबित होगी या रेत का किला ? श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति,काठमाण्डू,23 मार्च ।

अपने ही देश के एक भूखण्ड के लिए जिस तरह से सत्ता पेश आ रही है वह सिर्फ देश को विखण्डन की राह पर ही आगे बढ़ा रहा है इसमें किसी और को दोष नहीं दिया जा सकता है यह पूरी तरह से राज्य के व्यवहार के कारण हो रहा है । देखना यह है कि प्रधानमंत्री अपनी ऐतिहासिक यात्राओं के मद से कब बाहर निकलेंगे और देश की आन्तरिक और अहम समस्या की ओर उनका ध्यान कब जाएगा ? श्वेता दीप्ति

kp.oliप्रधानमंत्री ओली ने एक बार फिर अपनी यात्रा को ऐतिहासिक और अभूतपूर्व बताया है । यह कितना अभूतपूर्व होगा, या है यह तो समय बताएगा । फिलहाल नेपाली दूतावास बेइजिंग में मंगलवार को पत्रकार सम्मेलन में उन्होंने बताया कि यात्रा की उपलब्धि ने ही चीन यात्रा को अभूतपूर्व बना दिया है । क्योंकि भारत के साथ लम्बे समय से पारवहन सुविधा लेते आए नेपाल ने भूपरिवेष्ठित मुल्क द्वारा पाए जाने वाले अधिकार के रूप में पहली बार चीन से यह सुविधा ली है । यह तो वक्त बताएगा कि यह यात्रा मील का पत्थर साबित होगी या रेत का किला जो टिकता नहीं ढह जाता है । ओली की भारत यात्रा को कुछ इस तरह प्रचारित किया गया था मानो किसी किला फतह करने प्रधानमंत्री जा रहे हैं उसी तरह चीन के साथ हुए समझौतों को भी इस तरह दिखाया जा रहा है मानो भारत को नेपाल ने एक बार पुनः जीत लिया है जबकि यह सारी प्रक्रिया किसी भी देश के लिए महज एक कूटनीतिक प्रयास होता है जो देश के हित के लिए कितना सार्थक है इस पर निर्भर किया जाता है । बहरहाल भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कोई भी देश को भूपरिवेष्ठित पारवहन स्वतंत्रता होती है और वह यह समझौता किसी भी अन्य देश से करने के लिए स्वतन्त्र होता है । भारत ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि नेपाल के साथ भारत का जो सदियों से चला आ रहा ऐतिहासिक और साँस्कृतिक रिश्ता है उसकी तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती है ।
दिल्ली के साथ सात समझौते हुए और चीन के साथ दस इसकी चर्चा भारत में भी दिख रही है । खास कर पारवहन समझौता और केरुंग रेलवे निर्माण को लेकर भारत की दिलचस्पी देखी जा सकती है । यह अस्वाभाविक भी नहीं है क्योंकि नेपाल और भारत की खुली सीमा होने की वजह से भारत का इन मसलों पर सतर्क होना आवश्यक भी है । चीन की विस्तारवादी नीति कोई छुपी हुई बात नहीं है । वैसे प्रधानमंत्री ओली ने अपने चीन कार्ड को खेल लिया है और अपनी सफलता पर प्रसन्न भी हैं । चीन कार्ड भारत के पास भी है जिसे वह सम्भवतः अभी खेलना नहीं चाह रहा है । वक्त पर उसकी नजर होगी और चीन तथा नेपाल के रिश्तों की गहराई को नाप रही होगी ।
जिन समझौतों को लेकर प्रधानमंत्री अति उत्साहित नजर आ रहे हैं, उन्हीं समझौतों के लिए विशेषज्ञों का मानना है कि चीन जब तक तिब्बत का क्षेत्र विश्व के लिए खुला नहीं करता तब तक नेपाल के साथ पारवहन और रेलवे लाइन के समझौतों का कोई अर्थ नही्र रह जाता है । चीन भी नेपाल को शंकित नजरों से देख रहा है क्योंकि उसकी भी जिज्ञासा इस सन्दर्भ में अधिक है कि कहीं नेपाल चीन के साथ समझौता कर के इसे भारत के विरुद्ध तो प्रयोग नहीं करने वाला है । यद्यपि प्रधानमंत्री ने इस का खण्डन किया है और त्रिदेशीय सहकार्य में नेपाल की चाहत व्यक्त की है । देखा जाय तो यह नेपाल की आवश्यकता भी है । भारत के साथ तीन ओर से जुड़ी खुली सीमा, जनता के बीच सद्भाव और व्यक्तिगत रिश्ता, सामाजिक, साँस्कृतिक, धार्मिक भाषिक और दैनिक आधार से सम्बद्ध रिश्ता है जिसे अनदेखा या नकारा ही नही. जा सकता है इसलिए भारत के साथ रिश्ते को बिगाड़ कर नेपाल के विकास को नहीं देखा जा सकता उसी तरह अपने दूसरे पड़ोसी चीन के साथ भले ही उक्त आधार का रिश्ता ना हो किन्तु प्राविधिक क्षेत्र में चीन दुनिया में अपनी महत्ता सिद्ध कर चुका है इस आधार पर चीन नेपाल के विकास मे भी अपनी अहम भूमिका का निर्वाह कर सकता है । इसलिए चीन के साथ एक सहज रिश्ता नेपाल की आवश्यकता है । किन्तु अगर नेपाल की नीति भारत के विरुद्ध गई तो चीन कार्ड भी असफल सिद्ध हो सकता है यह यहाँ के कूटनीतिज्ञों को समझना होगा । विगत में जो नेपाल भारत के रिश्तों में कड़वाहट आई है उसे कम करने की आवश्यकता है न कि बढ़ाने की । वैदेशिक सम्बन्ध के मूल में देश की सुरक्षा, उन्नति, स्वनिर्भरता होती है और इसी को केन्द्र में रखकर वैदेशिक नीति का निर्माण आवश्यक होता है । किन्तु पिछले दिनों में प्रधानमंत्री के भारत भ्रमण के पहले सत्ता ने मधेश आन्दोलन के सन्दर्भ में जिस तरह का व्यवहार किया और मधेश आन्दोलन को भारत के साथ जोड़कर जिस खोखली राष्ट्रीयता की भावना को हवा देकर राष्ट्रीयता, देशहित विरुद्ध कोई समझौता नहीं करने का नारा और दवाब का वातावरण तैयार किया था वह किसी भी तरह उचित नहीं था । इस अविश्वास और भारत विरोधी भावना के कारण ही कूटनीतिक दृष्टिकोण से ओली की भारत यात्रा उपलब्धिविहीन साबित हो चुकी है । देश की सुरक्षा और स्वाभिमान सबसे पहली आवश्यकता होती है किसी भी स्वतन्त्र राष्ट्र के लिए । किन्तु इसे सत्ता के स्वार्थ के लिए प्रयोग करना निश्चय ही घातक कदम है जो पिछले कई महीनों से वर्तमान सत्ता करती आ रही है । अपने ही देश के एक भूखण्ड के लिए जिस तरह से सत्ता पेश आ रही है वह सिर्फ देश को विखण्डन की राह पर ही आगे बढ़ा रहा है इसमें किसी और को दोष नहीं दिया जा सकता है यह पूरी तरह से राज्य के व्यवहार के कारण हो रहा है । देखना यह है कि प्रधानमंत्री अपनी ऐतिहासिक यात्राओं के मद से कब बाहर निकलेंगे और देश की आन्तरिक और अहम समस्या की ओर उनका ध्यान कब जाएगा ?

 

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