ओली की बोली का असर अब खतम होने लगा, अचानक महतो पर मेहरबान क्यों ! श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति, काठमांडू , १३ जनवरी २०१६ |
राजनीति वो मंच है, जहाँ न कोई दुश्मन होता है और न ही दोस्त । न तो गाली देने में देर लगती है और न गले मिलने में । पिछले एक वर्ष से सद्भावना अध्यक्ष महतो और प्रधानमंत्री ओली के बीच बातचीत बंद थी । यह मौन उस समय से था जब ओली जी ने कहा था कि बिहार और यूपी को भी मधेश में मिला लो । महतो का नाम तक नहीं सुनने वाले ओली आज अचानक महतो पर मेहरबान हो गए हैं । एक वर्ष के मौन युद्ध के बाद अचानक प्रधानमंत्री ओली को सद्भावना अध्यक्ष राजेन्द्र महतो के स्वास्थ्य की चिन्ता सताती है और वो दिल्ली प्रवास में रहे महतो को फोन करने की जहमत उठाते हैं । कितनी अजीब बात है जिस सरकार ने खुद लाठी चार्ज करवाया और सोची समझी नीति के तहत निहत्थे सद्भावना अध्यक्ष पर लाठी बरसाई गई और तो और अब तक इस बात के लिए कोई अफसोस नहीं जताया गया, आज अचानक उनके स्वास्थ्य की चिन्ता होने लगी है । उन्हें वार्ता के लिए काठमान्डौ आने का आग्रह किया जा रहा है । साफ जाहिर है कि इसके पीछे ओली जी की क्या मंशा है । वो समझ रहे हैं कि महतो जितने अधिक दिन भारत में रहेंगे मधेश मुद्दा का उतना ही अन्तरराष्ट्रीयकरण होगा । महतो का दिल्ली में रहना इनके लिए भारत भ्रमण को मुश्किल बना रहा है । इसलिए बड़े आग्रह के साथ महतो को काठमान्डू आने की गुजारिश की जा रही है । oli-mahto
इतना ही नहीं वक्त बेवक्त भारत के प्रति जहर उगलने वाले प्रधानमंत्री ओली अपने प्रधानमंत्रीत्व काल की पहली विदेश यात्रा भारत से शुरु करना चाह रहे हैं । जो कल तक नेपाली मीडिया के द्वारा स्वाभिमान की दुहाई देकर यह प्रचार प्रसार करवा रहे थे कि जब तक नेपाल का माहोल सहज नहीं हो जाएगा जो भारत की वजह से बिगड़ा है तब तक वो भारत यात्रा नहीं करेंगे । आज अचानक दिल्ली दरबार जाने के इच्छुक हो गए हैं और इसके लिए उन्होंने दिल्ली के वातावरण को अपने प्रति सहज बनाने की कोशिश भी शुरु कर दी थी, परन्तु खबर आ रही है कि उनका ये पासा उल्टा ही पड़ रहा है । फिलहाल दिल्ली भ्रमण की सम्भावना न्यून नजर आ रही है । क्योंकि विश्व स्तर पर अपनी विषाक्त बोली से भारत की छवि बिगाड़ने की जो कोशिश इन्होंने की है वह भारत भी शायद इतनी जल्दी विस्मृत नहीं कर सकता है । साथ ही  दिल्ली सरकार नेपाल सरकार की टालमटोल की नीति से भी खुश नहीं है और उनकी नाराजगी नेपाल सरकार को भारी पड़ रही है । भारत बार बार कह रहा है कि मधेश की समस्या को सहमति, वार्ता और संविधान संशोधन से जल्द से जल्द सुलझाया जाय । किन्तु नेपाल सरकार एक बार फिर मधेश की सहमति के बगैर संशोधन की तैयारी में व्यस्त है जिसे मधेश मानने से इन्कार कर चुका है । मधेश जिस अहम मुद्दे के लिए विगत पाँच महीनों से लड़ रहा है और जिसके लिए पचास से अधिक लोगों ने अपनी जान गँवा दी है सरकार अब तक उस मुद्दे पर गम्भीरता से सामने नहीं आ रही । अब तक सिर्फ बहलावे का काम हो रहा है । जबकि मधेश बिना सीमांकन के किसी भी बात को सुनने, समझने या मानने के लिए तैयार नहीं है । आज सरकार जो कर रही है वह अगर आन्दोलन के शुरुआती दौर में हुआ होता तो शायद मधेश मान भी गया होता, पर आज बात इतनी आगे बढ़ गई है कि अधिकार की लड़ाई अब आर पार की लड़ाई हो गई है । मधेश की जनता अब किसी वादे पर भरोसा करने के लिए तैयार नहीं है अब उन्हें प्रत्यक्ष परिणाम चाहिए और इसके लिए वो सड़क पर से हटने की मानसिकता में नहीं है । 
काँग्रेस आगामी अधिवेशन की तैयारी में व्यस्त है और सत्ता के माहिर खिलाड़ी प्रचण्ड अपने दाँव में हैं कि कब कुर्सी उन्हें मिल जाय । जनता पर से भी ओली जी की बोली का असर अब खतम होने लगा है । कल तक मधेश के खिलाफ उनकी बोली पर खुश होने वाली काठमान्डौ की जनता अब उनकी उसी बोली से उबने लगी है । फिलहाल अपने खेल में ओली अकेले नजर आ रहें हैं । उनका कुर्सी छिन जाने का डर सर चढ़कर बोलने लगा है और यही वजह है कि कल तक जिसका नाम सुनना उन्हें गँवारा नहीं था आज उनकी याद शिद्दत के साथ आई है । यह सभी संकेत ओली जी की नक्षत्रों से मेल नहीं खा रहा और कुर्सी से पकड़ छूटती नजर आ रही है । पर यह राजनीति भी क्रिकेट के खेल की तरह ही है अंतिम समय तक समीकरण बदलने के आसार होते हैं ।
भारत का एक राज्य जो भारत की राजनीति में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है बिहार, अब खुलकर मधेश के पक्ष में खड़ा है । और मधेश की जनता की माँगों को जायज बताते हुए काठमान्डौ पर दबाब देने की तैयारी में है । सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि नेपाल की महत्वपूर्ण सीमा बीरगंज रक्सौल बिहार से जुड़ी हुई है और इसकी गम्भीरता को सरकार को समझना होगा । जदयू के नेता डा. रघुवंश सिंह ने स्पष्ट कहा है कि अगर मधेश की माँगों को संबोधित नहीं किया गया तो बड़ी दुर्घटना हो सकती है । सरकार को यह समझना होगा कि सरकार की तरफ से बन्दूक चलाकर मधेश को उकसाने की कोशिश ना करें ।

 

 
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