ओली की भारत यात्रा

मधेशी आन्दोलन के समय भारत को दुश्मन बताने वाले ओली ने भारत में एक बार भी अघोषित नाकाबन्दी की चर्चा नहीं की और सज्जन पुरुष बने रहे हैं ।

भ्रमण के पहले दिन हवाई अड्डे पर ओली को भारतीय विदेश मन्त्री सुषमा स्वराज्य के स्वगत से ही संतोष करना पड़ा वहीं दूसरी ओर मधेशी युवकों ने प्रधानमन्त्री ओली को काले झण्डे भी दिखाए

Kp-oli-And-Modi-5

प्रो. नवीन मिश्रा :नेपाली प्रधानमन्त्री ओली की भारत यात्रा से पूर्व कुछ अजीबोगरीब घटनाएँ देखने को मिली । सर्वप्रथम एक तरफ प्रधानमन्त्री ओली की भारत यात्रा की तैयारी जोर शोर से चल रही थी वहीं दूसरी ओर वर्तमान ओली सरकार पञ्चायती व्यवस्था की तर्ज पर मधेशी आन्दोलन में सक्रिय मधेशी युवाओं को झूठे मुकदमे में फँसा कर तथा उन्हें गिरफ्तार कर प्रताडि़त करने में लगी हुई थी । इन युवाओं के अभिभावक जब हताश में मदद की गुहार लगाने बड़े पार्टियों के स्थानीय नेताओं के पास पहुँचे तब उनका जवाब मिला कि तुमलोग आज तक हमारी पार्टी में थे, तो कभी कोई

इस भ्रमण के दौरान सात बुँदे समझदारी पर दोनों देशों ने हस्ताक्षर किए । पहली समझदारी भूकम्प के बाद होनेवाले पुनर्निर्माण से सम्बन्धित है, जबकि दूसरी तराई के हुलाकी सड़क से सम्बन्धित । तीसरा विसाखापटनम बन्दरगाह के उपयोग से जुड़ा है । चौथा, ढ़ल्केबर, मुजप्mफरपुर ट्रान्समिशन लाइन सञ्चालन, पाँचवां काकड़भिट्टा, बंगलाबन्ध मार्ग की अनुमति, छठा प्रबुद्ध समूह गठन तथा सातवां संगीत नाटय अकादमी तथा संगीत नाटक अकादमी बीच सहयोग आदान प्रदान से सम्बन्धित विषय हैं ।
परेशानी नहीं हुई और अब तुम्हारे बच्चे मधेशी पार्टियों में शामिल हो गए हैं तो इसकी सजा तो भुगतनी पड़ेगी । इस तरह की घटना यही दर्शाती है कि जिस तरह जनमत संग्रह के वाद बहुदलीय व्यवस्था में सक्रिय लोगों को विभिन्न प्रकार से दण्डित और प्रताडि़त किया गया था, वही काम वर्तमान सरकार भी कर रही है । दूसरे वर्तमान सरकार और प्रधानमन्त्री ओली के द्वारा न सिर्फ बाहर बल्कि संसद में भी यह बयान दिया गया कि भारत भ्रमण के सन्दर्भ में किसी भी प्रकार का राष्ट्र विरोधी सन्धि या समझौता नहीं किया जाएगा । समझ में नहीं आता कि कैसे कोई राष्ट्र अपने पड़ोसी या अन्य राष्ट्र से राष्ट्र विरोधी समझौता करेगा ? फिर इस तरह का हास्यास्पद बयान क्यों जारी किया गया, यह बात समझ से परे है । तीसरे भारत जाने से पहले आनन–फानन में सीमांकन सम्बन्धी समस्या के समाधान के लिए उच्च स्तरीय राजनीतिक संयन्त्र का गठन कर दिया गया । कहा जाता है कि भारतीय राजदूत प्रचण्ड से मिलने गए थे और उन्होंने यह सन्देश दिया था कि अगर नेपाल सरकार ओली के भारत भ्रमण से पहले सीमांकन समस्या के समाधान के लिए राजनीतिक संयन्त्र का गठन कर देगी तो भारत प्रधानमन्त्री ओली का तहे दिल से स्वागत करेगी । फिर मधेशी मोर्चा का भी कहना है कि वर्तमान राजनीतिक संयन्त्र का गठन विदेश मन्त्री कमल थापा द्वारा भारतीय विदेश मन्त्री सुषमा स्वराज से किए गए वादा का परिणाम है । उसका यह भी मानना है कि एकतरफा ढंग से बिना मोर्चा की सहमति के गठन किया गया, यह राजनीतिक संयन्त्र अपूर्ण है जो एक छलावा मात्र है । इससे किसी भी प्रकार के समस्या के समाधान की आशा नहीं की जा सकती । अन्त में कहा गया कि भ्रमण का मूल उद्देश्य पिछले कुछ महीनों में दोनों देशों के बीच उत्पन्न रिक्तता की समाप्ति है ।
भ्रमण के पहले दिन हवाई अड्डे पर ओली को भारतीय विदेश मन्त्री सुषमा स्वराज्य के स्वगत से ही संतोष करना पड़ा वहीं दूसरी ओर मधेशी युवकों ने प्रधानमन्त्री ओली को काले झण्डे भी दिखाए । भ्रमण के दूसरे दिन नेपाली प्रधानमन्त्री ओली की मौजूदगी में भारतीय प्रधानमन्त्री मोदी ने
सरकारी तन्त्रों का कहना है कि मधेश प्रदेश को अलग होने से देश के टुकड़ा होने का खतरा है । उन्हें यह समझ में नहीं आता है कि बार बार मधेशियों की भावनाओं का दमन करने से यह खतरा और भी बढ़ जाएगा । फिलहाल तो देखना है कि ओली के भारत भ्रमण के पश्चात क्या होता है ।
नेपाल में नए संविधान की घोषणा को एक महत्वपूर्ण उपलब्धि की संज्ञा देते हुए यह भी कहा कि लोकतन्त्र के मार्ग में नेपाल ने बड़ी प्रगति हासिल की है । मोदी ने यह भी कहा कि संविधान निर्माण में नेपाल सरकार, राजनीतिक नेतृत्व तथा समाज के सभी वर्गों के योगदान का मैं अभिनन्दन करता हूँ । मोदी का मानना था कि संविधान की सफलता सहमति तथा संवाद पर निर्भर होती है । मुझे विश्वास है कि इसी सिद्धान्त के आधार पर राजनीतिक वार्ता के माध्यम द्वारा नेपाल के सभी वर्गों को साथ लेकर, संविधान सम्बन्धित सभी विषयों का सन्तोषजनक समाधान खोजते हुए नेपाल प्रगति और स्थिरता के मार्ग में अग्रसर होगा । विशेष रूप में संविधान में मधेशी दलों के इच्छा अनुसार नागरिकता की व्यवस्था तथा समुचित सीमांकन का निर्धारण सुनिश्चित नहीं होने के विषय में मोदी ने सांकेतिक रूप में संवाद तथा सहमति के द्वारा इन्हें सुलझाने के सुझाव दिए । नेपाल की आर्थिक उन्नति, विकास तथा प्रगति भारत की कामना रही है और इसके लिए भारत हमेशा ही नेपाल को सकारात्मक सहयोग प्रदान करता रहा है और भविष्य में भी करता रहेगा ।
मोदी ने कहा कि नेपाल की स्थिरता भारत की सुरक्षा से जुड़ी हुई है । हम दोनों देश आतंकवाद तथा अतिवाद के खतरों से मुकाबला के लिए प्रतिवद्ध तथा सहमत हैं । हम आतंकवादियों और अतिवादियों को अपनी खुली सीमा का दुरुपयोग नहीं करने देंगे । उन्होंने फिर दुहराया कि नेपाल में शान्ति, स्थिरता तथा सम्पन्नता दोनों देशों के हित में है । मोदी नेपाल की सहमति से नेपाल में एक आयुर्वेदिक कॉलेज की स्थापना चाहते हैं जो दोनों ही देशों के सांस्कृतिक और व्यापारिक हित में होगा । मोदी के भाषण पश्चात ओली ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि नेपाल–भारत सम्बन्ध का आधार सार्वभौमिकता, समानता, भौगोलिक अखण्डता तथा पारस्परिक सम्मान है । उन्होंने यह भी कहा कि अब दोनों देशों के बीच की असमझदारी दूर हो गई है ।
इस भ्रमण के दौरान सात बुँदे समझदारी पर दोनों देशों ने हस्ताक्षर किए । पहली समझदारी भूकम्प के बाद होनेवाले पुनर्निर्माण से सम्बन्धित है, जबकि दूसरी तराई के हुलाकी सड़क से सम्बन्धित । तीसरा विसाखापटनम बन्दरगाह के उपयोग से जुड़ा है । चौथा, ढ़ल्केबर, मुजप्mफरपुर ट्रान्समिशन लाइन सञ्चालन, पाँचवां काकड़भिट्टा, बंगलाबन्ध मार्ग की अनुमति, छठा प्रबुद्ध समूह गठन तथा सातवां संगीत नाटय अकादमी तथा संगीत नाटक अकादमी बीच सहयोग आदान प्रदान से सम्बन्धित विषय हैं । मधेशी आन्दोलन के समय भारत को दुश्मन बताने वाले ओली ने भारत में एक बार भी अघोषित नाकाबन्दी की चर्चा नहीं की और सज्जन पुरुष बने रहे हैं । लेकिन पता नहीं नेपाल वापस आने के बाद फिर उनकी बोली बदल जाए । वैसे भी प्रचण्ड़ का मानना है कि भारत के साथ असमझदारी अभी भी समाप्त नहीं हुई है । साथ में माधव नेपाल भी भारत के विरोध में आग उगलने से बाज नहीं आ रहे हैं । कम से कम ओली के भ्रमण तक परहेज कर लेते ।
मधेश आन्दोलन की समाप्ति की भले ही औपचारिक घोषणा नहीं हुई है और मधेशी मोर्चा के नेता कह रहे हंै कि आन्दोलन अभी खत्म नहीं हुआ है और जल्द ही फिर नाकेबन्दी की जाएगी लेकिन वास्तविकता यही है कि व्यवहार में मधेशी आन्दोलन पूर्णतः समाप्त हो चुका है । इसका कारण या तो प्रधानमन्त्री ओली की भारत यात्रा हो या फिर मधेशी जनता की थकान । ६ महीने की अवधि कम नहीं होती है । ६ महीने में मधेशी जनता थक चुकी है, भर चुकी है । अब इसे मधेशी आन्दोलन में कुशल और सबल नेतृत्व का अभाव कहें या फिर सरकार की हठधर्मिता की मधेशी आन्दोलन सफल नहीं हो सका । मधेशी आन्दोलन की एक विशेषता रही है कि यह जब भी हुआ है, स्वस्फुरित हुआ है । इसे कभी भी दिशा नहीं मिली, जिससे यह अपने उद्देश्य की प्राप्ति में सफल नहीं हुआ । सरकारी तन्त्रों का कहना है कि मधेश प्रदेश को अलग होने से देश के टुकड़ा होने का खतरा है । उन्हें यह समझ में नहीं आता है कि बार बार मधेशियों की भावनाओं का दमन करने से यह खतरा और भी बढ़ जाएगा । फिलहाल तो देखना है कि ओली के भारत भ्रमण के पश्चात क्या होता है ।

Loading...