” ओली जी ! ये राष्ट्र के नाम संबोधन था या भानमती का पिटारा ” : गंगेश मिश्र

गंगेश मिश्र, कपिलबस्तु, १५ नोभेम्बर |
लम्बे इन्तज़ार के बाद बोले, तो चुप होने का इन्तज़ार करना पड़ा।
प्रधानमंत्री जी ! ये राष्ट्र के नाम संबोधन था या भानमती का पिटारा।

भूकम्प, भूकम्प सुनते-सुनते कान पक गये, अरे साहब ! उसीसे आप जैसों के कच्चे मकान पक्के बन गये।
अनुदान में भी कैश की माँग करने वाले आत्मसम्मान की बात करें, “लाजै मर्नु” प्रधानमंत्री जी ।
पजेरो, पराडो जैसी मँहगी गाडियों पर सवारी करने वाले, मितव्ययिता की बाते किसके लिए।
मधेश का काला नमक, मसुली चावल तो खाते हो, पर बीज, खाद मँगाने से कतराते हो।
ये क्या मज़ाक है भाई,
थोड़ी सी कठिनाई,
स्वाभिमान जग आई।
मधेश के आन्दोलन को संबोधित करने के बजाय भारत को खूब कोसा ओली जी नें। इनके
हिसाब से तो भूकम्प लाने में भी भारत का हाथ हो सकता है। काँटा बोओगे
काँटे ही पाओगे, जब चुभेगा तो चिल्लाओगे ;
आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान।
खुद की कमी दिखाई नहीं देती, मधेश की तड़प दिखाई नहीं देती।
दिखाई देता है तो बस पजेरो, पराडो में तेल की कमी।
रिसोर्ट में स- परिवार मौज- मस्ती करने जाते हैं,  और जनता को सैयम,
राष्ट्रवाद की गोली खिलाते हैं । ये समानता के पुजारी साम्यवादी।
देश की चिंता छोड़िए ओली सर।  यह देश भगवान भरोसे चला है, चलता  रहेगा ।
आप अपनी चिंता कीजिए, खूब धन जुटा लीजिए। कुछ पार्टी फण्ड के लिए और कुछ
अपने बुरे वक्त के लिए।
ज्यादे काबिल मत बनिए, माँ-बाप बच्चों को उँगली पकड़ कर चलना सिखाते हैं,
बोलना सिखाते हैं। इसे पर “निर्भरता”नहीं कहते, स्नेह कहते हैं, कर्तव्य
कहते हैं। पिटारा बन्द करो, निपटारा करो; देश की समस्याओं का।
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