ओली सरकार : मेड इन चाइना

अमरेन्द्र यादव :काठमाण्डू मे अभी नेकपा (एकीकृत माक्र्सवादी लेनिनवादी) के अध्यक्ष के.पी शर्मा ओली के नेतृत्व में गठबन्धन सरकार है । संविधानसभा से संविधान घोषणा के पश्चात् सम्पन्न प्रधानमन्त्री निर्वाचन में नेपाली कांग्रेस के सभापति सुशील कोइराला को हराकर कमरेड ओली बालुवाटार स्थित प्रधानमन्त्री निवास पहुँचे हैं । ओली सरकार को प्रचण्ड नेतृत्व के एकीकृत नेकपा माओवादी और कमल थापा के नेतृत्ववाले दक्षिणपन्थी–राजावादी पार्टी राष्ट्रीय प्रजातन्त्र पार्टी–नेपाल का समर्थन प्राप्त है । नेकपा माक्र्सवादी लेनिनवादी, राष्ट्रीय जनमोर्चा और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी संयुक्त जैसी वामपन्थी पार्टी भी सरकार मे शामिल हैं । साथ ही विजय गच्छदार जैसे अवसरवादी मधेशवादी नेता भीतर से ही समर्थन दे रहे हैं, तो उत्तर कोरियाली शासन सत्ता को अपने आदर्श मानने वाले नारायणमान विजुक्छे की पार्टी बाहर से समर्थन कर रही है ।
अवसरवादियों का काकटेल पार्टी
ओली नेतृत्व का वर्तमान गठबन्धन सरकार अपने आप में अभूतपूर्व और आश्चर्यचकित कर देने वाली सरकार हैं । खुद को वामपन्थी कहने वाले नेकपा (एकीकृत माक्र्सवादी लेनिनवादी) के नेतृत्व में तो सरकार है ही । इस सरकार को प्रचण्ड नेतृत्व की माओवादी पार्टी समर्थन दे रही हैं । प्रचण्ड की पार्टी वही पार्टी है, जो नेकपा (एकीकृत माक्र्सवादी लेनिनवादी) को अवसरवादी पार्टी मानती है । एक तरफ सारी वामपन्थी पार्टियाँ और दूसरी तरफ कमल थापा के राप्रपा नेपाल जैसे घोर दक्षिणपन्थी पार्टी भी इसी सरकार में शामिल हैं । इसी के साथ आन्दोलनरत मधेशी और थारु समुदाय को बीच सड़क पर ही छोड़कर घोर अवसरवादी विजय गच्छदार और उनके फोरम लोकतांत्रिक नामक पार्टी इस सरकार में पिछले दरवाजे से घुस गए हैं । इसीलिए लोग सवाल करते हैं कि ये कैसा गठबन्धन है ? इसलिए बुद्धिजीवी विमर्श करते हैं कि ये कैसे संभव हो पाया ?
ये इसलिए संभव हो पाया कि ये अवसरवादियों की मिलीभगत में बनी सरकार है । क्योंकि किसी निश्चित और साझा राजनीतिक सिद्धान्त और विचार पर आधारित रहकर इस सरकारी गठबन्धन का निर्माण नही हुआ है । संसद में सिर्फ ८० सीट होते हुए भी एकीकृत माओवादी ने ज्यादा और मालदार मंत्रालय पाने के लोभ में ओली को समर्थन दिया है । राष्ट्रीय जनमोर्चा के चित्रबहादुर केसी जिन्दगी में एक बार मन्त्री बनने के लालच में इस सरकार को समर्थन दे रहे हैं । नेकपा माक्र्सवादी लेनिनवादी के प्रमुख सीपी मैनाली को सिद्धान्त से कोई लेनादेना नही रहता हैं । गच्छदार की तरह वो भी सत्ता के सदाबहार लालची हैं । इससे पहले सुशील कोइराला के नेतृत्व में उनकी पत्नी मन्त्री थी । अब वो खुद वही मन्त्रालय सम्हालने चले गए हैं । सबसे ज्यादा लोग कमल थापा के सत्तारोहण से आश्चर्य चकित हैं । वामपन्थी पार्टियाँे से उनकी न कोई विचार धारा और न सिद्धान्त मिलती है । नया संविधान में राजतन्त्र और हिन्दु धर्म की पुनसर््थापना जैसी प्रमुख मांग में एक भी मुद्दा सम्बोधित नही हुआ है, तो कमल थापा इस सरकार में क्याें शामिल हैं ? जाहिर है कि ये अवसरवादियों की सरकार है । सबने अपने अपने अवसर प्राप्ति के लिए ओली का साथ दिया है । बाहर से देखें तो यही हकीकत है ।
माले, मसाले, मण्डले का अपवित्र गठजोड़
लेकिन अन्दर की बात कुछ और है । अन्दर की बात ये हैं कि ये माले, मसाले और मण्डले की गठजोड़ सरकार हैं । माले हुये केपी ओली और सीपी मैनाली । मसाले हुये प्रचण्ड और चित्रबहादुर केसी और, मण्डले हुये कमल और पशुपति शमशेर राणा । आन्तरिक विवाद के कारण पशुपति शमशेर राणा की राप्रपा पार्टी सरकार में से बाहर हैं मगर उस पार्टी का भी समर्थन इस सरकार को प्राप्त है । निर्दलीय पंचायती राज्यव्यवस्था के पतन के दौरान माले, मसाले और मण्डले ये तीन शब्द बहुत प्रचलित थे । सक्रिय राजतन्त्रात्मक व्यवस्था को अपना आदर्श माननेवाले पार्टी और नेता को मण्डले कहा जाता था । संसदीय व्यवस्था अख्तियार करनेवाले वामपन्थी पार्टी और नेता को माले जैसे विशेषण से जाना जाता था और, माओवादी विचारधारा मानने वाले तत्कालीन नेकपा मसाल नामक पार्टी से उत्पन्न हुए पार्टी और नेता को मसाले कहा जाता था ।
आज की ओली सरकार उसी माले, मसाले और मण्डले विचारधारा वाले राजनीतिक शक्तियों के गठजोड़ का परिणाम है । मण्डले विचारधारा वाले राजनीतिक शक्ति और समूह तो पंचायती राज्यव्यवस्था के समय से ही उग्र राष्ट्रवादी या मधेशियों की भाषा में कहे तो कट्टर महेन्द्रवादी थे ही । सन् १९९० के राजनीतिक परिवर्तन के बाद माले विचारधारा वाले राजनीतिक पार्टी और नेताओं का पतन भी मण्डलेवाद में हुआ है । इसका जीता जागता मिसाल केपी ओली तथा माधव नेपाल और उनकी पार्टी है । इसी तरह शान्तिपूर्ण राजनीति में आने के बाद माओवादी पार्टी ने भी प्रचण्डपथ को त्याग कर महेन्द्र पथ अर्थात् मण्डलेवाद को अख्तियार कर लिया है । इसीलिए यह दावे और प्रमाण के साथ कहा जा सकता हैं कि ओली नेतृत्व की वर्तमान सरकार अन्धराष्ट्रवाद में आधारित राजा महेन्द्र पथ के पथिक या मण्डलेवादियों की सरकार है । इस हिसाब से इस सरकार में सदाबहार अवसरवादी विजय गच्छदार एक अपवाद हो सकते हैं । मगर अन्य सभी पार्टी और नेताओं का मिलनबिन्दु वही महेन्द्रवाद या मण्डलेवाद है, जो भारत को अपना बाह्य शत्रु और मधेश को अपना आन्तरिक दुश्मन मानता है ।
चीन का वरदहस्त प्राप्त सरकार
नेपाल के मण्डले राष्ट्रवादियों और उत्तरी पड़ोसी चीन के बीच बहुत पुराना रिश्ता रहा है । राजा महेन्द्र अपने शासन काल में ‘चाइना कार्ड’ खेलते रहे और कार्ड खेलते–खेलते चल बसे । राजा वीरेन्द्र ने इस मामले में अपने पिताजी का बारम्बार अनुसरण किया और बार बार असफल हुए । फिर असफल अनुसरण करते करते वो भी चल बसे । अपने बड़े भैया राजा वीरेन्द्र की अकाल मृत्यु के बाद सत्तासीन हुए ज्ञानेन्द्र शाह भी सिंहासन में आने के बाद से ही चाइना कार्ड खेलना शुरू कर दिए । चीन के बल पर ही शासनसत्ता अपने हाथ मे लेकर अपने पिता की तरह निरकुंश राजतन्त्र लादने का प्रयास किया । इस का खामियाजा सिर्फ उन को ही नही, तमाम राजतन्त्रवादियों को भुगतना पड़ा । माओवादियों ने पहले से ही राजतन्त्र के विरुद्ध युद्ध छेड़ा था । भारत के सद्भाव और समर्थन में दूसरा जनआन्दोलन हुआ । नेपाली जनता ने ज्ञानेन्द्र शाह को ही नही, सदियों पुराने राजशाही को भी सदा के लिए अलविदा कह दिया ।
ऐतिहासिक तथ्यों से हमें पता चलता है कि उत्तरी पड़ोसी चीन ने आम नेपाली जनता और उन के द्वारा संचालित जनसंघर्ष और जनआन्दोलन को कभी साथ नही दिया है । चीन ने राजा महेन्द्र, वीरेन्द्र और ज्ञानेन्द्र जैसे निरकुंश शासको का ही साथ दिया । यहाँ तक कि कथित जनवादी राज्यसत्ता स्थापना हेतु संचालित नेपाली माओवादियों के सशस्त्र संघर्ष को भी उसे कभी साथ और सहयोग नही दिया । इसी आधार पर हम सप्रमाण कह सकते हैं कि चीन सरकार ने नेपाल का जब भी साथ दिया है, निरकुंश सत्ता और सत्ताधारी वर्ग का ही साथ दिया है । इस की वजह ये हो सकती है कि बेइजिङ के शासनसत्ता में निरकुंश शासको का ही कब्जा है ।
माले, मसाले और मण्डले के गठजोड़ से बने वर्तमान निरकुंश सरकार को समर्थन देकर चीन सरकार फिर पुरानी गलती ही दुहरा रही है । चीन के बल पर नेपाल में जो भी काम होता है, वो ज्यादा टिकाऊ नहीं होता है । संघीयता याा समावेशी विरोधी चीन के ही निर्देश पर बड़ी तीन पार्टियों ने विकृत संघीयतासहित का संविधान जारी किया । जारी होने के साथ ही उस संविधान का बुरा हाल सब के सामने है । अब ओली सरकार का वही बुरा हाल होना निश्चित है । क्योकि, इस ओली सरकार को भी चीन ने ही बनाया है । मगर इस में बेइजिङ और संघाई का नही, खासा का मशीन जोड़ दिया है । खासा में निर्मित सामान कितना टिकाउ होता है, ये बात सब नेपाली जनता जानते ही हैं ।
चीन ने सबसे बड़ी भूल नेपाली शासक वर्ग को एकल जातीय संविधान निर्माण में साथ देकर किया है । उस के सहयोग के बिना कोइराला, दाहाल और ओली २०६३ साल के अन्तरिम संविधान से भी पीछे संविधान नही बना सकते । पश्चिम तराई के नवलपरासी से बर्दिया तक के प्रदेश में पहाड़ के जिलाें को मिलाने का काम बड़ी पार्टियों ने चीन के निर्देशन पर ही किया है । गौतम बुद्ध का जन्म स्थल लुम्बिनी मधेशियों के हाथ न चला जाए इसलिए चीन ने पहाड़ी जिलों के उस प्रदेश में मिलवाकर मधेशियाें की आकांक्षाओं पर कुठाराघात किया है । कम से कम नवलपरासी से बर्दिया तक पश्चिम मधेश में मधेशी–थारु बहुल एक प्रदेश रहता तो इतना बड़ा आन्दोलन शायद नहीं भी होता था । अब हालात ये है कि मधेश का जारी आन्दोलन चीन समर्थित संविधान को ही नही, चीन के पार्टपुर्जा से बनी इस ओली सरकार को गिरा कर ही दम लेगी ।

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