” ओली सरकार ! के ताबूत में अन्तिम कील साबित होगी; यह मनमानी।

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” हटने होइन डटि लड़ने, नेपालीको बानी हुन्छ।”
” हटे नहीं, डटे रहे;
क़त्ल-ए-आम करते रहे।”
17000 हजार (सरकारी आकड़ा), निरपराध लोगों को, निहित स्वार्थ की बलिवेदी
पर कुर्बान कर दिया; विकास के अधिकांश पूर्वाधार को ध्वस्त कर डाला।
प्रचण्ड जी के माओवादी साम्यवाद नें ; नरसंहार करने वाले, इनके वही
लड़ाके सेना में शामिल कर लिए गए और माओ के भतीजे नेतागण संविधान की
मुख्य धारा में ।इस जनयुद्ध की आवश्यकता क्या थी? किसलिए और किस के लिए
लड़ा गया ? इससे देश को क्या मिला, कोई पूछे इनसे? लड़े, तो सत्ता मिली,
पद लोलुपता के कारण; अकारण निर्दोष जनता मारी गई। इतने बड़े नरसंहार के
बाद, देश में आमूल परिवर्तन होना चाहिए था। देश की दशा, दिशा बदलनी चाहिए
थी। क्या ऐसा हुआ ? ” ढाक के तीन पात “; वही पुरानी बात। घूम फिर के वही
लोग, वही चाल; वही चरित्र।
दूरदर्शिता,  दूर की बात है; यहाँ तो बस घात-प्रतिघात है। इनकी कुटिलता
तो देखिए; भट्टराई जी को हटाते हैं,  गिरजा बाबू आते हैं। गिरजा बाबू
जाते हैं,  देउवा आते हैं।यह क्रम बाबूराम भट्टराई तक चलता रहा, अपने ही
सरकार को गिरा कर खुद प्रधानमन्त्री बनने की परम्परा : इसी देश में ही
सम्भव है। वाह ! क्या राजनैतिक चरित्र है, तनिक शरम करो।
आख़िर बना ही डाला, ख़ूनी संविधान; लाशों की ढेर पर बैठे ओली जी!  और
उनका कुनबा: मधेश को कुरुक्षेत्र बनाने पर तुले हैं। अब संविधान संशोधन
की तैयारी सुरु हो गई है, यह मनमानी ओली सरकार ! के ताबूत में अन्तिम कील
साबित होगी ? निः संदेह, यह आन्दोलन मधेश के भविष्य का निर्धारण करेगा;
अब मधेश नव आगन्तुक देश बनने की राह पर चल पड़ा है।
ओली जी ही नहीं नेपाल के हर शासक, मधेश को सशंकित निगाह से देखते रहे;
महाराजा वीरेंद्र के समय में हर्ष बहादुर गुरुङ के प्रतिवेदन से, यह बात
स्पष्ट होती है।जिसमें उन्होंने कहा था, मधेश में  तीस  लाख से भी अधिक
भारतीय ; नेपाल की नागरिकता ले कर रह रहे हैं। यह बात तब की है, जब देश
में राजतन्त्र था।अब यह देश, प्रजातन्त्र से गणतन्त्र की ओर अग्रसर है;
परन्तु इनकी मानसिकता  वही पुरानी है। भारत का विरोध करने वाले वही लोग
हैं, जो इस देश से सबसे अधिक लाभ उठाते हैं। भारतीय छात्रवृति से
पत्रकारिता की पढ़ाई कर के लौटे, पत्रकार बन्धुओं ने; भारत के ख़िलाफ
सबसे ज्यादे ज़हर उगला।कृतज्ञता तक, प्रकट  न  कर सकने वाले मूर्खों की
पूरी जमात है, इस देश में।शिष्टाचार इन्हें आती नहीं, भाषा से अल्पज्ञ
अंग्रेजियत के शिकार; बिमार मानसिकता वालों की कमी नहीं है यहाँ। अंत में
यही कहना है, संभल जाओ समय है अभी,नहीं तो एक बार फिर काठमांडू घाटी में
ही; सिमट कर ना रह जाये: इस देश का नाम।
••••••••••••••••••••••••गंगेश मिश्र

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