ओली सरकार मधेशियों पर ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपना रही है : श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति, काठमांडू, १४ जून |

वर्तमान में यह स्पष्ट दिख रहा है कि मधेशी मोर्चा असमंजस में पड़ी हुई है । यह तो पहले से ही जाहिर है कि एक मंच पर आने के बाद भी ये सही मायने में एक नहीं हो पाए हैं । वक्त बेवक्त इनकी आपसी तालमेल में मतभेद की बात सामने आती रही है । असंतोष और वर्चस्व की आकांक्षा कभी कभी मधेश हित से भी अधिक इनमें लक्षित होती है । दूसरी ओर प्रधानमंत्री हैं जो वार्ता आह्वान तो करते हैं, किन्तु यह भी ऊपरी तौर पर ही आज तक किया जाता रहा है । आजतक वार्ता का आह्वान कई बार हुआ है और हर बार मोर्चा इसे अस्वीकार करती आई है । यह आरोप हमेशा लगता आया है कि सरकार सिर्फ बात को टाल रही है, इस ओर सही मायने में गम्भीर नहीं है । कहीं ना कहीं यह सही भी है । क्योंकि वार्ता का हर बार उस समय आह्वान किया गया है जब सरकार को या तो कहीं अपनी छवि सुधारनी थी या फिर अपना काम सिद्ध करना था । सरकार की गम्भीरता कभी नहीं दिखाई दी है । खैर इस बार फिर वार्ता का आह्वान किया गया है । किन्तु इसबार भी अनशनरत मधेशी नेता पेशोपेश में हैं । कुछ हैं जिन्हें वार्ता के लिए आए गए पत्र की भाषा और सम्बोधन पर ही एतराज है तो कुछ को यह पत्र पहले की अपेक्षा सकारात्मक दिखाई दे रहा है ।

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संघीय समाजवादी फोरम पक्ष का इस पत्र पर एतराज इस बात को लेकर है कि उक्त पत्र में संघीय गठबन्धन को सम्बोधित नहीं किया गया है बल्कि मोर्चा को सम्बोधित किया गया है । जबकि उनका मानना है कि वार्ता गठबन्धन के साथ होनी चाहिए । दूसरी ओर मोर्चा का कहना है कि वार्ता मोर्चा के साथ ही होनी चाहिए, इसलिए इससे आबद्ध अन्य दलों के नेताओं का मानना है कि यह पत्र अधिक सकारात्मक है, इसलिए अगर सरकारी पक्ष प्रतिबद्धता के साथ आता है तो वार्ता की शुरुआत हो सकती है । जेष्ठ १० को जो पत्र आया उससे थोड़ी सुधरी हुई भाषा इस पत्र की है, इसलिए कुछ नेता उत्साहित हैं तो कुछ असंतुष्ट भी । वैसे यह तो जाहिर है कि प्रधानमंत्री कार्यालय भाषाओं में उलझाने का ही काम कर रही है । अगर नीयत साफ होती तो एक बार में ही कोई ठोस और सुस्पष्ट बात सामने आती किन्तु ऐसा शुरु से ही नहीं हुआ है । सरकार थोड़ी थोड़ी कर के मिठाई परोस रही है कि क्या पता इतने से ही काम चल जाय । जब भी यह उम्मीद जगी कि कोई निष्कर्ष सामने आएगा तभी सत्ता की ओर से ऐसी चाल चली गई कि बनती बात बिगड़ गई । आज भी ऐसी ही सम्भावना दिख रही है । कहीं इस गठबन्धन को कमजोर करने की कोशिश तो नहीं हो रही ? इस बात को गठबन्धन को समझना होगा और आपस में मतभेद जाहिर करने से पहले इस गम्भीरता को भी समझना होगा कि अभी एक्यबद्धता की आवश्यकता है । क्याेंकि ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति हमेशा से कामयाब होती रही है । ओली सरकार अपनी कुर्सी बचाना चाह रही है और अभी उसी संवेदनशील घड़ी से गुजर रही है ऐसे में कुर्सी की रक्षा और संविधान का कार्यान्वयन यह दोनों चुनौती उनके सामने है । इसलिए इसी के तहत ओली की भेंट वार्ता देउवा से हुई है क्योंकि वो भी जानते हैं कि बिना तीनों दलों के मिले यह सम्भव नहीं हो सकता । इसी नीति के तहत एकबार फिर वार्ता का पाशा फेका गया है क्योंकि संविधान की इमारत जिस खूनी जमीन पर खड़ी की गई थी वह अपने आप में एक विडम्बना ही थी । अगर फिर संविधान का कार्यान्वयन मधेश की माँगो को दरकिनार किया गया तो स्थिति भयावह हो सकती है । सरकार ने जो खेल खेलने की कोशिश की है मोर्चा और गठबन्धन के नाम पर उसमें उन्हें सुधार करना चाहिए अगर वो सच में वार्ता चाहती है तो, अन्यथा अगर वो भ्रम की स्थिति को ही कायम रख कर आगे बढ़ना चाहती है, तब तो कोई बात ही नहीं ।

इस दुरुह स्थिति से उबरने के लिए मधेशी नेताओं को मोर्चा और गठबन्धन के नाम पर लड़ने की अपेक्षा बीच की राह निकाल कर आगे बढ़ना चाहिए । क्योंकि मधेश की जनता किसी निर्णायक मोड़ पर पहुँचना चाहती है । मधेश की जनता पर रिले अनशन का कुछ खास असर नहीं दिख रहा सिवा इसके कि वो यह समझ रही है कि बात को सिर्फ टाला जा रहा है या किसी सुअवसर की तलाश में हमारे नेतागण हैं । उनकी यह धारणा गलत भी नहीं है क्योंकि पद ने हमेशा नेताओं को अपनी ओर खींचा है और उस समय जनता की इच्छा और मधेश का हित दोनों ही हाशिए पर चला गया है । इस बार अगर मधेशी नेताओं ने ऐसा कुछ किया तो एक बार फिर आहत मधेशी जनता उन्हीं के शरण में जाएगी जिसने वर्षों से उन्हें छला है और अधिकारविहीन रखा है ।

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