ओली साहब ! निरंकुशता भी अपना सर झुकाती है, जब जनता खुद पर आ जाती है : श्वेता दीप्ति

मधेश की राष्ट्रीयता, वहाँ के लोगों की नागरिकता इन सब पर सन्देह और राज्य की ओर से वर्षों से दी जा रही विभेद की पीड़ा ने, मधेश की जनता को उस मोड़ पर ला खड़ा कर दिया है, जहाँ से वो पीछे नहीं हट सकती ।

श्वेता दीप्ति, काठमांडू ,३१,जनवरी |

अगर सरकार यह सोचती है कि मधेश आन्दोलन दम तोड़ देगा, तो वह उनकी सबसे बड़ी भूल साबित होगी क्योंकि, अधिकार पाने की ललक और स्वतंत्र होने की चाहत, अगर दिलों में बैठ जाय तो वह इतनी बलशाली होती है कि, उसे कोई नीति, कोई दमन या कोई चाल दिलों से निकाल नहीं सकती । समय लग सकता है किन्तु यह कटु सत्य है कि जीत सत्ता की नहीं जनता की होती आई है ।
कुर्सी की दौड़ में सबसे आगे चल रहे खड्गप्रसाद ओली को नेपाल का नेतृत्व सौंपा गया । उम्मीद थी कि अपनी बेतुके बोलियों के तीर चलाने वाले ओली देश की सत्ता सम्भालने के बाद सम्भवतः गम्भीर हो जायेंगे, किन्तु ऐसा नहीं हुआ । आन्दोलित मधेश के लिए उनका रवैया पूर्ववत है । पड़ोस को दिखाने के लिए वार्ता के ढोंग भी जारी रहे और दमन भी । जब–जब लगा कि कुछ सकारात्मक होने वाला है, तब–तब सत्ता ने ऐसा कुछ किया कि मधेश अशांत होता गया । चार महीनों से अनवरत रूप से जारी आन्दोलन ने अब तक अपने संयम को नहीं खोया है । सत्ता ने हर सम्भव कोशिश की कि शांतिपूर्ण आन्दोलन को कमजोर किया जाय, मधेशियों को उकसाया जाय, ताकि विश्व राजनीति में मधेश आन्दोलन एक हिंसक आन्दोलन के रूप में जाना जाय । इसकी ही एक कड़ी थी विवाह पंचमी में देश के राष्ट्रपति का जनकपुर भ्रमण । उनकी सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए यह आगाह किया गया कि, उनका जनकपुर जाना सही नहीं है । किन्तु एक सोची समझी नीति के तहत उन्हें वहाँ भेजा गया । सरकार जानती थी कि आन्दोलित जनता विरोध अवश्य करेगी क्योंकि, राष्ट्रपति के जनकपुर आगमन से पूर्व उनका पुतला दहन किया जा चुका था । शाक्ति प्रदर्शन के साथ राष्ट्रपति का जनकपुर भ्रमण सम्पन्न हुआ और परिणाम यह हुआ कि मंदिर परिसर रणभूमि में परिणत हो गया और सदियों से चली आ रही परम्परा भी बाधित हुई । इस घटना को महिला अपमान के प्रकरण से जोड़कर एक बार फिर समुदाय विशेष को उकसाने की कोशिश की गई । अभी यह मामला शांत भी नहीं हुआ था कि मधेश मोर्चा के नेता और सद्भावना के अध्यक्ष राजेन्द्र महतो के ऊपर लाठी चार्ज करा कर सरकार वार्ता के रास्ते को तत्काल बन्द कर चुकी है । जनता एक बार फिर लाखों की संख्या में रोज सड़कों पर उतर रही है और अपने आक्रोश को प्रकट कर रही है । आन्दोलन की नई नीति तय की जा रही है ।

अधिकार की माँग, स्वतंत्रता की माँग बनती जा रही है
मधेश आन्दोलन को बार–बार भारत से जोड़कर, मधेशियों को बिहारी और भारतीय कह कर दुत्कारना यह तो एक परम्परा सी बन गई है । मधेश की राष्ट्रीयता, वहाँ के लोगों की नागरिकता इन सब पर सन्देह और राज्य की ओर से वर्षों से दी जा रही विभेद की पीड़ा ने, मधेश की जनता को उस मोड़ पर ला खड़ा कर दिया है, जहाँ से वो पीछे नहीं हट सकती । युवावर्ग किसी भी हाल में अपने अधिकार को पाने के लिए डटी हुई है । सरकार सम्बोधन में जितनी देर कर रही है, उतना ही युवाओं का मन राज्य के इस व्यवहार से उद्वेलित हो रहा है । अधिकार की माँग, कहीं ना कहीं स्वतंत्रता की माँग बनती जा रही है । इतिहास के पन्नों को उलटा जा रहा है । कल तक जो अपने इतिहास से अपरिचित थे, आज वो भी जानना चाह रहे हैं और यह कहने लगे हैं कि उपहार में दिया गया मधेश अब स्वतंत्र होना चाहिए क्योंकि, सरकार को मधेश चाहिए मधेशी जनता नहीं । अगर सरकार की यही नीति रही तो आज जो भावना कुछ दिलों में है, वह सम्पूर्ण मधेश की भावना बन जाएगी । सरकार को यह समझना होगा कि मधेश पूर्वाधार विहीन नहीं है । उसके पास विश्व राजनीति में स्वतंत्रता के कई उदाहरण भी हैं और अपना आधार भी । कल तक जिस मधेश के नाम से विश्व अपरिचित था आज मधेश की उपस्थिति वहाँ दर्ज हो चुकी है । वक्त अब भी है सचेत होने की और देश को विखण्डन से बचाने की । अगर सरकार यह सोचती है कि मधेश आन्दोलन दम तोड़ देगा, तो वह उनकी सबसे बड़ी भूल साबित होगी क्योंकि, अधिकार पाने की ललक और स्वतंत्र होने की चाहत, अगर दिलों में बैठ जाय तो वह इतनी बलशाली होती है कि, उसे कोई नीति, कोई दमन या कोई चाल दिलों से निकाल नहीं सकती । समय लग सकता है किन्तु यह कटु सत्य है कि जीत सत्ता की नहीं जनता की होती आई है । निरंकुशता भी अपना सर झुकाती है, जब जनता खुद पर आ जाती है ।


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