Tue. Sep 25th, 2018

औरत खुद में एक कविता होती है और उसमें शामिल हर शब्द हमारे कुकृत्यों पर आंसू बहाते हैं : ललन चौधरी

ललन चौधरी | साहित्य अपने पलकों पर स्वप्न सजाए एक खूबसूरत दुनियां को देखती है,जहां कोई औरत सुदंर सपने मे हंस रही होती है और उसकी मनभावन ,लुभावन अदा पर सृष्टि के कण कण प्रफुल्लित हो रहे होते हैं और कोई कवि की कविता जब उन दृश्यों को अपनी पेनीय नजर से देखती है तो उसके अंदर की दुनिया कितनी अंधेरी और खौफनाक प्रतीत होती है ,जहां बलात्कार ,यातना,कष्ट ,असह्य पीड़ा और वेदना की अनन्त मारक अनुभूतियां कराह रही होती है। हिंदी कविताओं में क ई बार औरत को केन्द्र में रखकर बहुत कुछ लिखा गया..बहुत कुछ कहा गया..साहित्य का सबसे घृणित कार्य औरत पर संपादित और पूर्ण हुआ..अफसोस कि हमारी काव्य संवेदना और उसके अश्लील सौंदर्यबोध की दुर्गंध से कितनों ने अपने नाक मुंह सिकोड़े और आंखों पर पट्टी लगाए न्याय के चौखट पर दस्तक देकर समाज के कुकृत्य को फांसी की सजा सुनाई..लेकिन अपराध ,अत्याचार,बलात्कार और बच्चियों के साथ किये गये घिनौने कुकृत्य हजारों हजार बार सबने मिलकर आंसू बहाए..आंसू सूख भी गये..वक्त के साथ..लेकिन औरत पर कविता आज भी कराह रही है.. सीती ,द्रौपदी और सावित्री की पवित्रता और धैर्य की पराकाष्ठा का भी अतिक्रमण हुआ है,नारी शक्तियों की आदि परिभाषाएं भी बदली हैं और रूप रंग के तमाम तेवर हवा में रंग बिरंगे बैलून की तरह उडा़ दिए गये..जहां कोई चील झपट्टा मारकर उसकी उड़ान को खत्म कर डाले.. राम रावण के बीच का आदर्श.और मूल्य भी कितने सच थे..लेकिन न आज वैसा रावण रहा और न ही मर्यादापुरूषोत्तम राम..केवल ध्वजा हम राम के आदर्श का फहरा लें या उस पर एक राजनीति कर लें..यह अलग सवाल है..लेकिन कविता तो इन तमाम चीजों पर लंबी बहस की मांग करती है..

‘औरत ‘शीर्षक से प्रकाशित कविता इतिहास और वर्तमान की वह बेचैनी है,जहां भविष्य को सुरक्षित करने की चिंता से आज तक मुक्ति न मिल पाई है..औरत औरत है..सामान और वस्तु का पर्याय..जितना जो चाहे मन के मुताबिक उसका उपयोग कर ले,उसके अंदर से खिलते प्रेम पुष्प को झूठ ,प्रपंच और फरेब की दुनिया में ले जाकर मोल भाव करे..यह स्थिति तब और मारक हो जाती है ,जब उसके अंदर विश्वास को भी तहस नहस कर दिया जाता है.. इतिहास की सबसे ऊंची सीढ़ी पर बैठी रो रही औरत के पांव मे छाले पड़ गये हैं..,जिसे धोखे बाजों ने आकाश की ऊंचाई को छूने और उड़ान भरने का स्वप्न दिखाया था,वो अब नीचे उतरने के लायक भी न रही.. अफसोस है हमारी इस निष्ठुर एवं क्रूर मनोरंजनप्रियता पर जहां औरत को वस्तु समझकर खेला जाता है..हाय!कैसी बिडंबना है..इस जीवन की और प्रेम की… डा.श्वेता दीप्ति की कविताओं में सच सच की तरह होते हैं,लेकिन उन तमाम सच को झूठलाते हुए ,जिसे हम आप सच समझते थे,गरज सच से ऊपर का सच जब सामने होता है तब हमारी आंखें खुलती हैं और हम उस दुनिया को नफरत और घृणा से देखते हैं ,जो हमारे सपनों में शामिल होकर हमें सदियों से ललचाते रहे.. डा.दीप्ति की कविताओंं में औरत की व्याख्या नहीं है..न ही उसके बिडंबना पूर्ण जीवन की आलोचना..वरन औरत खुद में एक कविता होती है और उसमें शामिल हर एक शब्द हमारे कुकृत्यों और जघन्य अपराध पर आंसू बहाते हैं..कविता यहीं आकर समाज के लिए सार्थक हस्तक्षेप करती है और इतिहास के खंडहर से कोई दुर्बल और जर्जर होती काया हमें बाहें फैलाकर पुकार रही है..कह रही है कि अब बंद करो हमारे ऊपर हो रहे अत्याचार को…और सबसे खतरनाक तो यह है कि उसके अंदर सृष्टि को बचाये रखने का जो मातृत्व का पावन प्रेम है..वह नष्ट हो रहा है..और लील रही है हमारी वासनाएं.. केवल निष्ठुर प्रकृति की क्रूर नियति का सच रह जायेगा!!

 

 

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