और ! बला टल गई…., सत्ता की चासनी में डूबे, मनचले रसगुल्ले…… गंगेश मिश्र

और ! बला टल गई….
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लगा के जैसे,
गठबन्धन की गाँठ,
खुल गई।
नौ ग्रहों की पूजा की,
और ! बला टल गई।
प्रचण्ड धूप से जले,
चासनी में गले,
रसगुल्ले;
फ़िर से,
खुशहाल हो गए।
कुछ और दिनों तक,
देश को नोचने का,
अवसर जो मिल गया।
ख़ून चूसने वाले,
चोर-चोर मौसेरे भाई,
मिल बाँटकर खाते हैं।
देश प्रेम में ओतप्रोत हैं,
फ़िर क्यूँ लूट मचाते हैं ?
रसगुल्लों की तरह,
सत्ता की चासनी में डूबे,
नेतागण …..
राष्ट्रीयता की,
अखण्डता की,
स्वाभिमान की बातें करते हैं।
यही इस देश की सबसे बड़ी,
खाशियत है,
बदनसीबी भी।
जय देश।

मनचले रसगुल्ले……
rasgulla~~~~~~~~~
सत्ता की चासनी में डूबे,
मनचले रसगुल्ले,
चासनी से बाहर,
निकलने को हैं।
नये ताज़े रसगुल्ले,
बनकर तैयार हैं,
पुरानी चासनी में,
डूबने के लिए।
ऐसे ही रसगुल्ले,
बनते रहे,
डूबते रहे,
नहाते रहे,
चीनी-चीनी,
चिल्लाते रहे।
जो गरम चासनी में कूदे,
फट गये,
फूट गये,
पर देश को लूट गये।
सत्ता का खेल,
चोरों का मेल,
कोल्हू में पिसती,
जनता है,तेल;
हालात की मारी,
बेचारी,
क्या करे।
मनचले रसगुल्ले,
मिल बाट कर,
खाने वाले;
बड़े ही,
उदार मना होते हैं।
बिरादरी वालों को,
चासनी में,
डूबने का बराबर,
अवसर देते हैं।
ये राजनीति है, यारों !
जिसमें,
दुश्मनी नहीं होती,
दोस्ती भी नहीं होती।
होती है बस,
मौके की तलाश।
मौका मिलते ही,
टूट पड़ो।
छिः

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