‘कट्सी मेन्टेन’ में ही सीमित ओली का भारत भ्रमण

वीरेन्द्र केएम:सदियों से नेपाल–भारत के बीच रहे अद्भुत सम्बन्ध में पिछले कुछ महीने से खटास पड़ी हुई है । भारत और नेपाल दोनो देश के अधिकारी इस खटास को फिर से मीठा संबन्ध बनाने के लिए जोड़–तोड़ से लगे हुए हैं । लेकिन बदलती नेपाल की सोच इस राह में बाधा बन रही है । नेपाल की आम जनता की सोच हमेशा से यही रही है कि नेपाल में भारत का दबदबा चलता है और आज ये हालात है कि अब यहाँ चाइना, पाकिस्तान, यूरोपिलियन यूनियन और अमेरिका का भी दब–दबदबा बना हुआ है ।

Bharat naman

Bharat naman

इसका मतलव नेपाल कोई सार्वभौम देश ही नहीं है ऐसा भी नहीं है । अब नेपाल के यूथ जेनेरेसन में काफी बदलाव आ गया है, यूथ जेनेरेसन अब ये नहीं चाहता कि हमारे देश मे किसी बिदेशी देशों का दबदबा हो । लेकिन प्रो–चाइना, प्रो–भारत, और प्रो–यूरेपेलियन यूनियन, प्रो अमेरिका वाले नेपाली राजनीतिक दल, दल के नेता के कारण नेपाल पिछले कुछ साल से विदेसियों के एक्सपेरिमेन्ट का मैदान बना हुआ है । ये तो हुई नेपाल की आम बाते, लेकिन अब चलते हंै प्रधाममन्त्री केपी शर्मा ओली यानी खड्गप्रसाद ओली के भारत भ्रमण की ओर ।
प्रधानमन्त्री ओली के भारत भ्रमण के दौरान हम कुछ पत्रकारों का भी भारत भ्रमण रहा । जहाँ–जहाँ हमारे ओली साहब गए वहाँ–वहाँ हम पत्रकारों की भी नजर रही और साथ भी । प्रधानमन्त्री ओली भले ही अपने भारत भ्रमण से सारी असमझदारी खतम होने का दावा कर रहे हों लेकिन भारत और नेपाल के बीच राजनीतिक रिश्तों में आई तल्खी अभी भी बरकरार ही है । ये भी सच है कि नेपाल के पीएम ओली के भ्रमण के आखिरी दिन तक भी नेपाल मे बिशाल रूप बन गए मधेश मुद्दे को लेकर मतभेद कायम रहा । और इसी वजह से भारत ने संयुक्त वक्तव्य पर हस्ताक्षर करने से ही इंकार कर दिया है । भारत जहां संयुक्त वक्तव्य में सहमति और संवाद के माध्यम से संविधान संशोधन के जरिए मधेश के मुद्दे को हल करने की बात वक्तव्य में उल्लेख करना चाहता था, वहीं नेपाल इसे आन्तरिक मामला कह कर वक्तव्य में इसे कोई स्थान नहीं देने की बात पर अड़ा रहा ।
भारत का मानना है कि भारतीय सीमा से जुड़े नेपाल के तराई क्षेत्र में रहने वाले मधेशी नागरिक जो देश की आधी आबादी हैं, उन्हें कई प्रकार के संवैधानिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया है । यही वजह है कि संविधान जारी होने के बावजूद अभी तक भारत सरकार की ओर से नेपाली सविंधान का स्वागत नहीं किया गया है । हालांकि मधेशी मुद्दा पर नेपाल सरकार ने तीन महीने में ही दो संशोधन कर दिया है लेकिन आन्दोलन कर मधेश केन्द्रित राजनीतिक दल संम्मिलित मधेशी मोर्चा के विरोध के कारण भारत ने इन संशोधन प्रस्ताव को सिर्फ सकारात्मक कदम बताया है ।
नेपाल के पीएम ओली की भारतीय पीएम मोदी से हैदराबाद में हुई द्विपक्षीय वार्ता के दौरान भी यही मुद्दा हावी रहा । दोनों के बीच करीब ४० मिनट तक चले ‘वन टू वन’ मुलाकात के बाद संयुक्त रूप से प्रेस को संबोधित करते हुए मोदी ने एक बार फिर संविधान के विवादित मुद्दों को आपसी सहमति और अधिकतम संतुष्टि के साथ सुलझाने का सुझाव दिया था । भारतीय प्रधानमन्त्री मोदी ने दिए बयान के हर शब्द में काफी अर्थ था उन्होंने ने कहा ‘दशकों के संघर्ष के उपरांत, नेपाल के संविधान की रचना और उसकी घोषणा एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है । इसके निर्माण में नेपाल की सरकार और राजनैतिक नेतृत्व का तथा समाज के सभी वर्गो द्वारा किये गये योगदान का मैं अभिनंदन करता हूँ किंतु इसकी सफलता सहमति और संवाद पर निर्भर है । मुझे विश्वास है कि इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर, राजनैतिक वार्तालाप के माध्यम से, नेपाल के सभी वर्गों को साथ लेकर, आप नेपाल के संविधान से जुड़े सभी मुद्दों का संतोषजनक निवारण कर नेपाल को प्रगति और स्थिरता की राह पर ले जायेंगे ’ ।
और इस कोट किए हुए बयान का अर्थ निकाला जाए तो ये स्पष्ट है कि मोदी ने संवाद और वार्ता से मधेशियों की माँग को संम्बोधन करने पर बल दिया है । हैदराबाद हाउस में ही दोनों देशों के बीच भ्रमण के आखिरी दिन संयुक्त वक्तव्य निकाले जाने पर सहमति हुई थी । लेकिन नेपाल मधेश के मुद्दे को संयुक्त वक्तव्य में कोई स्थान नहीं देना चाहता था जबकि भारत मधेश मुद्दे को शामिल किए बगैर वक्तव्य निकालने के पक्ष में नहीं था । और नेपाल के प्रधानमन्त्री और उनकी टीम की भारत भ्रमण के आखिरी दिन तक संयुक्त वक्तव्य जारी हुआ भी नहीं ।
अतः इसलिए भी प्रधानमन्त्री ओली का भारत भ्रमण सिर्फ कट्सी मेन्टेन में ही सीमित रहा । वैसै तो भारत भ्रमण के दौरान ओली सतर्क थे और अपने तुक्कों और मुहावरों का पिटारा नेपाल में छोड़कर ही गए थे । भारत से आते ही बड़े उत्साहित हो कर अपनी भारत भ्रमण को ऐतिहासिक और पूर्ण सफल भी बताया । जवकि भारत मे ऐसा कुछ देखने को नहीं मिला । भारत ने सिर्फ अपने अतिथि धर्म का निर्वाह किया । राष्ट्रपति भवन में प्रधानमंत्री ओली कोे ठहराना और एयरपोर्ट मे विदेश मन्त्री सुषमा स्वराज द्वारा रिसीभ किया जाना, इस बात को नेपाल द्वारा विषेश और राजकीय सावित किया गया । जवकि भारत मे राष्ट्रपति भवन को पूरी तरह से मरम्मत के बाद पिछले १ साल से सारे बिदेशी कार्यकारी या राष्ट्रप्रमुखको राष्ट्रपति भवन मे ही ठहराया जाता है । तत्कालीन प्रधानमन्त्री गिरिजा प्रसाद कोइराला को स्वयं तत्कालीन प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह द्वारा किए गए रिसीभ और तत्कालीन प्रधानमन्त्री कृष्णप्रसाद भटराई, शेरबहादुर देउवा और मनमोहन सिंह को भी राष्ट्रपति भवन मे ठहरा कर किए गए मेहमानवाजी को शायद ओली सरकार भूल गए हैं । आखिर जो भी हो यह भ्रमण सिर्फ औपचारिकता मे सीमित रही और भारत ने नेपाल के प्रधानमन्त्री ओली की जिज्ञासा को सुना और अपनी बात भी बता दी ।

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