कथनी और करनी में समानता होनी चाहिए : उर्मिला पांडे

Urmila Pandy
उर्मिला पांडे, काठमांडू , २ फरवरी | देश में शिक्षा व जागरुकता बढ़ने के साथ ही महिलाओं की स्थिति पहले से बेहत्तर हुई है । उनकी सुरक्षा व सम्मान से जुड़े कई नये कानूनों को हाल के कुछ वर्षों में लागू किया गया । कुछ वर्षों से राष्ट्रीय महिला आयोग महिलाओं के उत्थान व विकास में सक्रिय है । पुरुषों का एक बड़ा तबका भी महिलाओं के अधिकार व सम्मान के समर्थन में खड़ा दिखता है । जाहिर है कि वि.सं. २०४७ साल के वाद महिलाएं अपने अधिकार के लिए आगे बढ़ने की शुरुआत की है । एक जमाना ऐसा था कि महिलाओं को घर से निकलने ही नहीं दिया जाता था । शिक्षा की कमी थी, राजनीतिक चेतना का अभाव था । लेकिन अभी इनमें बढ़ोत्तरी हो रही है ।
वर्तमान में मधेशी महिला भी शिक्षा व राजनीति में धीरे–धीरे आगे बढ़ रही है । उनमें सचेतन का विकास हो रहा है । भले ही ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं पढ़ी–लिखी न हों, लेकिन उनमें अनुभव की कमी नहीं है । अनुभव की दृष्टि से देखा जाए तो हिमाल व पहाड की महिलाएं भी बहुत आगे हैं । वर्तमान नेपाल की राजनीति में यह देखा गया है कि पढ़ी–लिखी महिलाओं को ही विशेष अवसर दिया जाता है । मेरा मानना है कि भले ही महिला कम पढी–लिखी क्यों न हो वह अनुभवी हो, तो अपनी जिम्मेदारी दक्षता से निवाह सकती है । स्थान मिलने पर आगे बढ़ सकती है । लेकिन विडम्बना है नेपाल जैसे देश में, इन महिलाओं को आगे बढ़ने से रोका जाता है ।
जहाँ तक रही बात मधेश की, तो दुःख के साथ कहना पड़ता है कि वहां महिलाओं के साथ भी ऐसे ही बरताव किया जाता है, विभेद किया जाता है । अभी मधेश में जिसके पास पैसा है, जिसके पति नेता है, जिसके पास शक्ति है, तो वह महिला बहुत जल्द आगे बढ़ जाती है । दूसरी तरफ जो महिला लंबे अरसे से सक्रियता के साथ पार्टी से आवद्ध है, लेकिन उनके पास पैसा नहीं है, पार्टी में पहुँच नहीं है, तो वह महिला पीछे पड़ी है । पार्टी के अन्दर समावेशी समानुपातिक की बात करते हैं । विधान, नीति–नियम में इस मुद्दे को उल्लेख किया जाता है । लेकिन व्यवहारतः क्रियान्वित नहीं किया जाता है । इसलिए कथनी और करनी में समानता होनी चाहिए ।
(उर्मिला पांडे नेपाल सद्भावना पार्टी की केन्द्रीय सदस्य तथा नेपाल महिला मंच की अध्यक्ष हैं ।)
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