कथित बड़ी पार्टियां देश को दुर्घटना की ओर ले जा रही हैं : रामबाबू सिंह

रामबाबू सिंह नेपाल सद्भावना परिषद् के संस्थापक सदस्य तथा नेपाल सद्भावना पार्टी के महासचिव भी रह चुके हैं

रामबाबू सिंह नेपाल सद्भावना परिषद् के संस्थापक सदस्य तथा नेपाल सद्भावना पार्टी के महासचिव भी रह चुके हैं

नेपाल में सांस्कृतिक और धार्मिक एकरुपता के साथ–साथ विविधता भी है । तराई–मधेश के लोग उपनिवेशिक जिंदगी जी रहे हैं । पहाड़ के लोग शासकीय रुप में स्थापित हैं, जबकि हिमाल के लोग सोल्जर के रुप में देश व विदेशों में जीवन–यापन करते आ रहे हैं । देश के राजकीय पहुँच में विगत के सत्ताधारियों ने समावेशी व समानुपातिक प्रतिनिधित्व की जो बोतें करते थे, वे बातें अभी गौण हो गई हैं । चूंकि वर्ग विशेष ही यहां की सत्ता में स्थापित हैं, जिसे छोड़ना नहीं चाहते हैं ।
संविधान परिवर्तनशील दस्तावेज है । लेकिन परिवर्तनशील तब होगा, जब मानसिक, वैचारिक, नेपाली के रुप में व नेपाली पहचान के रुप में परिवर्तन होता है । लेकिन यहां ऐसा नहीं हो पाया है । यह संविधान एकात्मक शासन प्रणाली का एक प्रारुप है । यह एकात्मक शासन व शासकीय व्यक्ति द्वारा निर्मित संविधान है, जिसमें मधेशी, जनजाति, थारु, अल्पसंख्यक आदि समुदायों को उपेक्षित रखा गया है । उनके अधिकारों से भी वंचित किया गया है । संविधान जारी होने से पूर्व ही कहा गया था कि संविधान को पूर्णता दे । नेपाल भ्रमण के दौरान भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने भी सुझाव के रुप में कहा था कि नेपाल का संविधान एक गुलदस्ता बने । आशय यह है कि हर क्षेत्र, हर जाति, हर समुदाय यह महसूस करे कि यह मेरा संविधान है । लेकिन उस सुझाव को कथित बड़ी पार्टियों ने इग्नोर करते एकात्मक शासन प्रणाली का संविधान जारी किया ।
संविधान जारी होने के कुछ महीने के पश्चात् अर्थात् २०७२ फागुन १६ गते समानुपातिक प्रतिनिधित्व व समावेशी जैसे दो मुद्दों को लेकर पहली बार संविधान में संशोधन हुआ । भौगोलिक दृष्टिकोण से आरक्षित क्षेत्र की भी घोषणा की गई, जिले को कायम रखा गया । प्रोविन्स की अवधारणा में जब हम संघीय व्यवस्था में प्रवेश करते हैं, तो जिला खुद संघीय व्यवस्था में जाएगा । वर्तमान में सात प्रांतो की परिकल्पना की गयी है और इन्हीं प्रांतों में ७५ जिलों को आवंटित किया गया है । क्या यही समानुपातिक और समावेशी का आधार है ? यह ज्वलंत प्रश्न हमारे सामने मौजूद है । किसी प्रान्त में करोड़ो जनसंख्या है, जबकि किसी में बहुत कम है ।
मैं विश्वस्त हूं कि मौजूदा संविधान किसी खास वर्ग विशेष का है और सदा के लिए शासन करना चाहते हैं । संविधान संशोधन सम्बन्धित बातें सिर्फ दिखाने के लिए कर रहे हैं वे लोग । वे यह भी चाहते हैं कि पहाड़ी राष्ट्रवाद, पहाड़ी भाषा, पहाड़ी संस्कृति व पहाड़ी मौलिकता किसी भी कीमत पर कायम रहे । इसीलिए मैं मधेशी नेताओं को कहना चाहूंगा कि मधेश को एक स्वतन्त्र रुप से वैचारिक, सौद्धान्तिक, आर्थिक, राजनीतिक और अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को उत्खनन कर उन्हें स्थापित करने हेतु आगे बढ़े । इसी में हम सभी की भलाई है ।
मधेशी को उनके भूभाग के साथ–साथ उनके जमीनी अधिकार व राष्ट्रीय पहचान को कायम करना है, तो यूनियन ऑफ नेपाल की अवधारणा बनानी होगी । इसका आशय यह है कि हम मधेशी और पहाड़ी दोनों भिन्न हैं । मधेशी उपनिवेशिक जींदगी जी रहे हैं । उनकी जमीनें भी अतिक्रमण कर ली गयी हैं । इस अवस्था में अगर मधेश की जमीन, मधेश का पानी, मधेश की भाषा व संस्कृति को स्थापित करना चाहते हैं, तो यह संघीयता से काम नहीं चलेगा । इसलिए नेपाल का संविधान ‘यूनियन’ का संविधान बने अर्थात् ‘यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ नेपाल’ बने, जहां बराबर का हक मिल सके । इसलिए संशोधन से बेहतर होगा कि मौजूदा संविधान को ही एब्बाइड कर इस संविधान को हम नहीं मानते हैं, यह संविधान हमारा है ही नहीं, यह संविधान हमें संरक्षित कर ही नहीं सकता है’ ऐसी विचारधारा से आगे बढ़े ।
मौजूदा घोषित चुनाव के बारे में मैं कहना चाहूंगा कि चुनाव एक तांडव है । चुनाव को लेकर सरकार स्थानीय निकाय को ताकतवर बना रही है । सरकार वर्गीय द्वन्द्व चाहती है । वे यह चाहती है कि मधेश में वर्गीय विभाजन हो, जातीय विभाजन हो और प्रशासनिक तौर पर हम मौज करें । अभी पार्लियामेन्ट का चुनाव करवाना चाहिए था । स्थानीय चुनाव राज्य द्वारा होना चाहिए था । जबकि सरकार चाहती है कि देश में वर्गीय द्वन्द्व हो । इस देश को वामपंथीकरण कर रहा है और योजनाएं भी बनाई जा रही हैं, ऐसा मुझे लगता है । इस योजना से बचने के लिए संविधान संशोधन से समस्या का हल नहीं हो सकेगा । सरकार व कथित बड़ी पार्टियां हमारी भावना और परिस्थिति को नहीं समझ रही है । हमने भी जो अपनी आवाजें उठाई हैं, उसे वे अपनी मजबूरी समझ कर अपने दृष्टिकोण से संशोधन का प्रस्ताव किया है । इधर हर पार्टी के भीतर अनेक विचार भी प्रतिबिंबित हुआ है ।
अब जहां तक सवाल है चुनाव होने का, तो मेरे ख्याल से चुनाव होगा ही नहीं । क्योंकि उपर्युक्त जटिलताएं मधेश के अतिरिक्त हिमाल व पहाड़ में भी है । अभी हर क्षेत्र में अविश्वसनीयता बढ़ती जा रही है । खासकर माओवादी केन्द्र, कांग्रेस व एमाले ने अविश्वसनीयता को और बढ़ा कर देश को दुर्घटना की ओर ले जा रहे हैं । वे दुर्घटना की ओर इसलिए ले जा रहे हैं कि मौजूदा व्यवस्था को संचालन करने में असफल हो गये हैं और अपनी असफलता को छुपाने व दबाने के लिए चुनाव करवाने का नाटक कर रहे हैं, जो एक तांडब है । कुछ ही दिनों में इसका पटाक्षेप हो जाएगा । इसके बाद देश की स्थिति क्या होगी ? देश कहां जाएगा ? ये तो समय ही बताएगा ।
(रामबाबू सिंह नेपाल सद्भावना परिषद् के संस्थापक सदस्य तथा नेपाल सद्भावना पार्टी के महासचिव भी रह चुके हैं)
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