कबलाह

ओमप्रकाश सीकारिया:सदियों से मनुष्य भौतिक सत्ता से परे कुछ निराले की खोज में लगा रहा है, किसी ऐसी सत्ता की खोज जो पूर्ण रूप से पवित्र और आनन्दमय हो. यहूदी परम्परा में सृजनकर्ता से एकाकार होने के मार्ग के रूप कबलाह का महात्म्य है. इंटरनेट पर इस विधि के बारे में कई पाठ उपलब्ध हंै. उन पाठाें के पढ़ते और उनके वीडियो देखते हुए जो बोध हुआ उसे प्रस्तुत करने का यह एक प्रयास भर है. यहूदी परम्परा भी उतनी हीं प्राचीन है जितनी की सनातन हिन्दू परम्पराएँ और दोनों के दर्शन में अद्भुत समानता है. उनका भी मानना है कि जब तक जीव अपने सृजनकर्ता से एकाकार नहीं होता तब तक इस संसार में उसका पुनर्जन्म होता रहता है. जीव को वे भी सृजनकर्ता का अंशी मानते हैं. इस भौतिक जगत को वे परिणाम मानते हैं और आध्यात्मिक जगत को कारण. जो सिद्धांत आध्यात्मिक जगत (ब्रह्म) में लागू होते है ठीक वही सिद्धांत भौतिक जगत में भी लागू होते है. भौतिक जगत की अनुभूति हम अपनी इन्द्रियों से करते हैं लेकिन अध्यात्मिक जगत की अनुभूति हम नहीं कर पाते क्योंकि दोनों के बीच एक अवरोध है जिसे वे ‘मखÞसोम’ कहते है. कबलाह के मार्ग पर चल कर हम मखÞसोम के आगे की चीजाें के अस्तित्व की अनुभूति कर सकते है. इन्द्रियातीत आध्यात्मिक सत्ता का वर्णन करना सम्भव नहीं क्योंकि हमारी भाषा भौतिक जगत की सीमा तक सीमित है. इसलिए कबलाह का मार्ग अपनाने वाले ऋषियों ने शाखाओं की प्रतीकात्मक भाषा में अपनी बातें कही है. उनकी पुस्तक सफर यतजÞीरा में सृष्टि की कहानी है. इसी प्रकार अन्य महत्वपूर्ण पुस्तक ‘जोहर अल ह तोराह’ अर्थात् तोराह की चमक है. वैसे ही ‘मतन तोरहा’ नामक पुस्तक है जिसमें ‘ज्योति द्वारा दिए गए निर्देशों’ की चर्चा है. कबलाह को बोधगम्य बनाने के लिए अनुभवी कबलाही एक अनुक्रम सुझाते हैं. कबलाह का शाब्दिक अर्थ प्राप्त करना होता है. जीवाें की प्रकृति प्राप्त करने वाली होती है और सृजनकर्ता की प्रकृति देने वाली. जब हम चीजों को प्राप्त करते है तो उसे भोगने की इच्छा से करते हंै, पहले अनुक्रम में उस भोगने की क्रिया में प्रज्ञा का पर्दा लगाने की सलाह दी जाती है. अर्थात चीजो का भोग त्यागपूर्वक करने का अभ्यास करने की बात कही गई है. आगे वे कहते है कि अस्तित्व में सभी चीजें एक संतुलन कायम करने के लिए प्रयासरत है. जीव स्वभाविक रूप से अपने सृजनकर्ता से एकाकाकर होने के लिए से प्रयासरत होते हैं, उसे जानने का निर्णय लेने की आवश्यकता नहीं यह लालसा सभी जीवों में स्वभाविक होती है. अस्तित्व में जितनी भी चीजे है उन्हें सृजनकर्ता ने बनाया है और उसे बनाने के पीछे सृजनकर्ता का क्या भाव है और क्या आशय है उसे जीव समझ सकता है, और मार्ग पर चलने वालों को उसे समझना भी चाहिए. जैसे जब हम किसी लकड़ी की कुर्सी को देखते हैं तो उस कुर्सी में उसे बनाने वाले बढ़ई के आशय को समझ सकते है. चीजो को भौतिक रूप से ही नहीं वरन अध्यात्मिक रूप से समझने की आवश्यकता है और जब उसे हम समझते हैं तो हम सृजनकर्ता से एकाकार होने के मार्ग पर बढ़ते है. हमारे सामने जो भी अवस्था उपस्थित होती है उसमें सृजनकर्ता का एक संदेश छुपा होता है, आशय छुपा होता है. जीव को उस आशय को समझना चाहिए.
प्रकृति में जो भी व्यवस्थाएँ है वे सृजनकर्ता की इच्छा से ही है. हम भौतिक संसार को देखते, सुनते अनुभव करते हंै, लेकिन हम जीव उस सृजनकर्ता की अनुभूति भौतिक या आध्यात्मिक स्तर पर नहीं कर पाते, यह व्यवस्था भी उनकी ही इच्छा से है. इस संसार में बहुत कुछ ऐसा है जो परस्पर विरोधी प्रतीत होता है, लेकिन वे वस्तुतः पूरक हैं. हमें लगता है कि सृजनकर्ता हमें अस्वीकार कर रहा है लेकिन यह भाव प्रकारांतर से उसे पाने की हमारी भावना और पात्रता को और प्रबल बनाता है. एक मात्र सृजनकर्ता के अस्तित्व का विश्वास और उसे पाने की प्रबल इच्छा उस अध्यात्मिक जगत को देख पाने का मार्ग प्रशस्त करती है. ऐसा लगता है जैसे सृजनकर्ता का एक हाथ जीव को अपने पास खींच रहा है तो दूसरा परे धकेल रहा है. दोनों स्थितियों में उसके प्रति विश्वास बना कर रखना आवश्यक होता है.
जैसे हमारा अपना मन होता है, वैसे ही सम्पूर्ण इसरायल (मानवता) का एक सामूहिक मन भी होता है और हमें यह देखना है कि हमारा दुःख या आनंद सिर्फ हमारा नहीं उस सामूहिक मन को प्रभावित करता है. किसी आनन्द को आत्मरति के लिए नहीं भोगना चाहिए और ना ही दुःख के लिए किसी को जिम्मेवार बनाना चाहिए. हमें प्राप्त होने वाले आनंद को उस दैविक उपस्थिति (सखीना) को समर्पित करना है, ना कि आत्मरति का माध्यम बनना है.
मानव की वैचारिक स्वतन्त्रता अध्यात्मिक मार्ग पर उन्नति की अनिवार्य शर्त है. अगर लोगों से पूछा जाए तो सौ में सौ लोग कहेंगे कि वे वैचारिक रूप से स्वतंत्र है. लेकिन जब हम गहरे रूप से विचार करते है तो पाते हैं कि हम अपने विचारों और निर्णयों में आंतरिक एवं बाह्य तत्वों से प्रभावित होते रहते हैं. बाह्य रूप से सामाजिक चीजों से हम प्रभावित होते हैं और आंतरिक रूप से अपने सुख की लालसा में बुद्धि के हस्तक्षेप से. मानव से अधिक स्वतंत्र तो जानवर दिखलाई देतें है. क्योंकि उनका दिमाग प्रकृति के द्वारा उन्हें दी गई समझ से संचालित होता है और उसमें दिमागी हस्तक्षेप नहीं होता. हमारा अहंकार हमारे स्वतंत्र निर्णय के आड़े आता है. “मैं” का वास्तविक स्वरूप हम भूल गए है. कबला के मार्ग पर कोई जोर जबरजस्ती नहीं चल सकती, विचारों में स्वतन्त्रता अहम् है. आत्मा की वास्तविक प्रवृति भी स्वतंत्रता की हिमायती है और यह राजनीति के विकास(क्रम में दृष्टिगोचर होता है. राजनीति में नए नए वाद गढ़े जाते और संस्थाएँ खुलती हैं लेकिन मानव वास्तविक स्वतन्त्रता की अनुभूति नहीं कर पाता, उस स्वतंत्रता को अनुभव करने का मार्ग आध्यात्मिक है. विश्व के किसी भी आध्यात्मिक दर्शन को जब हम जानने की कोशिश करते है तो यह स्पष्ट होता है कि वह एक ही सत्य की ओर इशारा कर रहे है ।

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