कब शान्ति की सा“स लेगा मधेश –

कैलास दास:मधेश आन्दोलन से मधेश की चर्चा राष्ट्रीय-अन्तर्रर्ाा्रीय स्तर पर होने लगी है, चाहे वह अधिकार के वास्ते हो या आपसी आन्तरिक द्वन्द्व । होना भी स्वाभाविक है । नेपाल की सबसे ज्यादा आबादी और क्षेत्रफल मधेश में है । परन्तु एकलौते शासन के कारण मधेश में रहने वाले मधेशी समुदाय दो सौ पचास वर्षसे शोषित, पीडिÞत और उपेक्षित रहा है । यहाँ तक की मधेश राजनीतिक, भौतिक, एवं मानसिक विकास उर्वर भूमि बनी रही, फिर भी यहाँ की जनता में कोई सुधार देखने को नहीं मिलता । madhesh armforce
२०६२/०६३ के जनआन्दोलन पश्चात् मधेश आन्दोलन हुआ और इसके पश्चात् अन्तर्रर्ाा्रीय स्तर पर मधेश ने अपनी उपस्थिति दर्ज कर्राई विश्व ने यह जाना कि नेपाल में मधेश भी एक विशेष क्षेत्र है । इस आन्दोलन से दो प्रकार कीे राजनीतिक स्थिति उत्पन्न हर्ुइ । एक सडÞक राजनीति और दूसरी भूमिगत । जिसने राष्ट्रीय मुद्दा का रूप ले लिया । सडÞक पर राजनीति करने वालो ने मधेश में बन्द, हडÞताल, नारा-जुलुस लगाकर अपनी उँचाई बढर्Þाई तो भूमिगत समूहों ने अपने ही भाई बन्धुओं की हत्या, अपहरण, फिरौती के द्वारा त्रास फैलाया । जबकि दोनो का एक ही लक्ष्य था ‘मधेश मुक्ति’ ।
अगर मधेशी में राजनीतिक परिपक्वता होती तो अवसर का विशेष फायदा अवश्य उठाया होता । २०६४ के संविधान सभा चुनाव में नेपाल कीे राजनीति में मधेशी दल का चौथा स्थान था । उस समय भी मधेश की राजनीति खूब चर्चे में रही । यहाँ हरेक जिला में नेताओं को हरियाली देखने को मिले । यह हरियाली देखकर मधेशी जनता शायद सबसे ज्यादा खुश हर्ुइ थी  । उन्हें लगा कि अब अपना राशन, अपना शासन और अपनी व्यवस्था होगी । किन्तु किसानों का नेता वही रहा, जो मधेश को हमेशा हीनभाव से देखा करता था । ऐसे में भला कैसे यह हरियाली ज्यादा दिन तक टिक सकती थी । एक मुद्दा, एक नारा और एक आवाज जो मधेश को सशक्त और प्रौढ बना सकता था, वह स्थाई नहीं हो सका और ‘फूट डालो, शासन करो’ ने ऐसा जाल बिछा दिया कि मधेश फिर से चर्चा में आ गया । तीन दल, दो दर्जन से ज्यादा दल में विभाजित होकर शक्तिहीन हो गए । जिसका परिणाम २०७० के संविधान सभा चुनाव में स्पष्ट देखने को मिला । फिलहाल  मधेशी दल की स्थिति इस मुहाबरे की तरह हो गई है ‘घर का ना घाट का’ । मधेश मुक्ति की लडर्Þाई तभी सफल होती जब संविधान सभा में बहुमत से जीतकर संविधान निर्माण मंे मधेश का अधिकार सुनिश्चित करवा पाता । परन्तु अपने ही कुकृत्य के कारण इस बार न सरकार में है और न ही संविधान निर्माण मंे किसी की स्थिति मजबूत है ।
दूसरी ओर भूमिगत होकर मधेश मुक्ति के नाम पर लडÞ रहे समूहों ने भी मधेश को कभी शान्ति की साँस नही लेने दिया । उसकी भी कथनी और करनी हाथी के दाँत की तरह रही । वह भी राजनीतिक गतिविधि अनुसार आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, साँस्कृतिक भाषिक और राष्ट्रीय पहचान की लडर्Þाई लडÞे होते तो आज जिस प्रकार से प्रशासन द्वारा गिरफ्तार कर दोषी करार दिया जा रहा है वह नतीजा देखने को नही मिलता । तर्राई के जिलों में जितनी भी हत्या, हिंसा, अपहरण, फिरौती, धाक-धमकी की पीडÞा मधेशी समुदाय को सहना पडÞा यह इन्हीं लोगों ने किया है यह तो नही कहा जा सकता, परन्तु यह सत्य है कि सभी की जिम्मेवारी इन्ही लोगों ने ली है ।
मधेश मुक्ति की लडर्Þाई सशस्त्र भूमिगत समूहों ने जिस प्रकार से प्रारम्भ किया, उनमें तर्राई के आठ जिले सबसे ज्यादा आतंकित रहे । जबकि सभी जानते है कि इन्ही आठ जिले से राजनीति की शुरुआत होती है और यही पतन भी करवा देती है । इतिहास गवाह है कि काँग्रेस, एमाले की राजनीतिक भूमि मधेश का जिला रहा और इसने राणा शासन को खत्म कर दिया । एमाओवादी की राजनीतिक यात्रा एवं जनयुद्ध ने राजतन्त्र का अन्त कर दिया । इसने मधेश ने भी साथ दिया । परन्तु अपनी भूमि के अधिकार के वास्ते जो दो प्रकार के राजनीतिक आन्दोलन हुए, आज अधिकार पाने से पहले परास्त हो चुके हैं ऐसा महसूस हो रहा है ।
वि.स. २००७ साल २०४६ और २०६२/०६३ के आन्दोलन पश्चात् भी मधेश भूमि को शान्ति की साँस नहीं मिली । मधेश आन्दोलन ने रमेश महतो की हत्या पश्चात् उग्र रुप लिया, जिसका नेतृत्व मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव ने किया था और जो मधेश की शक्ति के रूप में आगे आये । परन्तु उन्होंने ने भी महतो हत्यारा को मन्त्री परिषद् द्वारा तैयार किए गए रिहाई के कागजात पर हस्ताक्षर कर मधेश मुद्दा को गुमराह कर दिया ।
जनता और देश के लिए जो राजनीतिक लडर्Þाई होती है वह कभी खत्म और अपराध के दायरे में नहीं आती है । मधेश में जितनी भी हत्या हिंसा हर्ुइ है, यह सभी भूमिगत समूह ने किया होगा, ऐसा नहीं है । ऐसा भी हो सकता है कि मधेश के मुद्दा को समाप्त करने के लिए यह चाल चली गई हो । लेकिन जिस प्रकार से मधेश मुक्ति की लडर्Þाई को बदनाम करने के लिए सशस्त्र समूह ने जिम्मेवारी लिया है, वह अवश्य ही अपराध है ।
बहुत अफसोस की बात है कि मधेशी जनता से सहयोग लेकर, मधेश भूमि का प्रयोग कर, मधेशी नेता को आगे लाकर आज मधेश मुद्दा समाप्त कर दिया गया है । मधेश मुक्ति के नाम पर ४८ सशस्त्र भूमिगत समूह हैं, जिन्होंने मधेशी जनता को आतंक के सिवा कुछ नही दिया है । अगर्रर् इमानदारी पर्ूवक मधेश मुक्ति की लडर्Þाई लडेÞ होते तो अभी जिस प्रकार से राज्य पक्ष द्वारा गिरफ्तारी का अभियान चलाया गया है वह दिन नहीं आता । स्वार्थ एवं पैसा के लालच में उन सभी ने जनता को इस प्रकार आतंकित बना दिया कि पुलिस के इस अभियान से जनता प्रफुल्लित हो रही है ।
कब किससे वार्ता हर्ुइ –
मधेश मुक्ति की लडर्Þाई में यहाँ पर जितने जिला हैं, उससे ज्यादा भूमिगत समूह हैं । सरकारी तथ्यांक के अनुसार ४८ समूह ने विभिन्न अपराधों में घटना की जिम्मेवारी ली है । इन सभी से हत्या हिंसा छोडÞने के लिए नेपाल सरकार द्वारा गठित सरकारी वार्ता टोली ने करीब ४५ भूमिगत समूह के साथ वार्ता किया, ऐसा मन्त्रालय के वेवसाइट मंे उल्लेख है ।
२६ मार्गशर्ीष्ा २०६५ में मधेसी भाइरस किलर्स, ११ पौष २०६५ में संयुक्त जनतान्त्रिक तर्राई मुक्ति मोर्चा, १८ कार्तिक २०६८ में संयुक्त जनतान्त्रिक तर्राई मुक्ति मोर्चा संस्थापन पक्ष, ८ मार्गशर्ीष्ा २०६८ में संयुक्त जनतान्त्रिक तर्राई मुक्ति मोर्चा कौटिल्य शर्मा समूह, १६ पौष २०६५ में तर्राई संयुक्त जनक्रान्ति पार्र्टर्ी, २६ पौष २०६५ में जनतान्त्रिक तर्राई मुक्ति मोर्चा राजन मुक्ति समूह, १० फागुन २०६५ में लिवरेशन टाइगर अफ तर्राई इलम -एलटीटीइ), ७ चैत्र २०६५ में मधेस मुक्ति टार्इगर्स, २४ बैशाख २०६७ में अखिल तर्राई मुक्ति मोर्चा संस्थापन पक्ष, १६ पौष २०६८ में संयुक्त जनतान्त्रिक तर्राई मुक्ति मोर्चा -पवन समूह), २८ पौष २०६८ में संयुक्त जनतान्त्रिक तर्राई मुक्ति मोर्चा -आजाद समूह), ७ माघ २०६८ में अखिल तर्राई मुक्ति मोर्चा -जयकृष्ण गोइत समूह), १३ माघ २०६८ में जनतान्त्रिक तर्राई मुक्ति मोर्चा -भगत सिंह समूह), २१ फागुन २०६८ में जनतान्त्रिक मधेस तर्राई मुक्ति मोर्चा -झबर साह, प्रताप समूह) और ६ बैशाख २०६९ में संयुक्त क्रान्तिकारी तर्राई मधेस मुक्ति मोर्चा के साथ वार्ता की गई ।
क्या थी शतर्ें –
विभिन्न चरण में हर्ुइ वार्ता में कहीं भी मधेश मुक्ति की बात नहीं देखी गई है । शर्त थी वार्ता अवधि तक सशस्त्र समूह का वार्ता टोली के सदस्यों की सुरक्षा नेपाल सरकार करेगी, सशस्त्र समूहों की सशस्त्र कारवाही स्थगित हो, नेपाल सरकार की ओर से उस समूह के नेताओं तथा कार्यकर्ताओं के साथ राजनीतिज्ञ के रूप में व्यवहार, जेल में रहे और आरोप लगाए गए कार्यकर्ताओं कीे नामावली नेपाल सरकार को उपलब्ध करा कर उन्हें अनुसन्धान के बाद रिहा कर दिया जाए, स्वतन्त्र एवं शान्तिपर्ूण्ा रूप में राजनीतिक सभा, जुलूस, रैली, गोष्ठी, सेमीनार तथा राष्ट्र निर्माण का कार्यक्रम, सम्बन्धित जिला प्रशासन कार्यालय के साथ समन्वय कर संचालन किया जाए, मुल्क में शान्ति स्थापना के लिए अन्य द्वन्द्वरत राजनीतिक समूहों को भी वार्ता के टेवल में लाकर समझौता किया जाए ।
चार से पाँच तथ्यों पर दोनांे के बीच प्रथम चरण में सहमति हर्ुइ थी  । दूसरे चरण में उपलब्ध नामावली के अनुसार बन्दी कार्यकर्ता की रिहाई और आरोप वापस लेने की प्रक्रिया कानून तथा न्याय मन्त्रालय और गृह मन्त्रालय के समन्वय में एक महीने के भीतर शुरु किया जाए, सम्पर्ूण्ा हथियार २०६८ भाद्र १४ भीतर नेपाल सरकार को सौंपा जाए, २०६८ सावन २६ में मन्त्रालय में दिए गए विवरण अनुसार मोर्चा के आहृवान में हुए आन्दोलन के क्रम में शहीद हुए मृतकों की नामावली सम्बन्ध में यथार्थ छानबीन कर गृहमन्त्रालय में लिखकर दिया जाए, आन्दोलन के क्रम में घायल नेता कार्यकर्ता को उपचार खर्च उपलब्ध कराया जाए ।
पाँच सूत्रीय समझौता अखिल तर्राई मुक्ति मोर्चा संस्थापन पक्ष की तरफ से वार्ता टोली संयोजक विनोदकुमार चौधरी -विवेक) और सरकारी वार्ता टोली की संयोजक पम्फा भुसाल के बीच २३ सावन २०६८ में हुआ था ।  इसी प्रकार बहुत सारे समूहो के साथ दो तीन चरण तक सरकार और सशस्त्र समूह की वार्ता टोली के साथ समझौता हुआ ।
यक्ष प्रश्न यह है कि आखिर अब कौन मधेश का भाग्य निर्माता होगा – नेता आज भी अपनी स्वार्थपर्ूर्ति में लगे हुए हैं, परिवादवाद फलफूल रहा है, सशस्त्र समूह कलंकित हो चुके हैं इसके अलावे जो थे और जो हैं, उन्होंने मधेश का इस्तेमाल तो किया, पर जब देने का समय आया तो मधेश हमेशा की तरह हासिए पर था । तो आगे क्या – यह प्रश्न हर मधेशी जनता का है, उनकी आँखें उन्हें ढूँढÞ रही हैं जो उनका मसीहा बने न कि खुद का ।

किसने सबसे ज्यादा आतंक फैलाया
खास कर तर्राई के कुछ जिलों को सबसे ज्यादा आतंकित करने वाला राजन मुक्ति कहलाने वाला रंजित झा, अर्जुन सिंह उर्फमुकेश चौधरी, पृथ्वी सिंह उर्फश्याम यादव, स्वामी जी कहलाने वाला उमेश यादव हंै । जिनके ऊपर बडेÞ-बडेÞ अभियोग लगे हंै । नेपाल की ही सबसे बडÞी घटना जनकपुर बम बिस्फोट की जिम्मेवारी इसी समूह ने लिया, जिनमंे पाँच की मौत और ३२ लोग घायल हुए थे । उसी प्रकार सञ्चार उद्यमी अरुण कुमार सिंघानिया की २०६६ साल में होली के दिन गोली मार कर हत्या कर दी गई थी । महिला पत्रकार उमा सिंह की निर्ममता पर्ूवक शरीर के विभिन्न भाग में धारदार हथियार प्रहार कर हत्या कर दी गई । महोत्तरी के सहायक जिला शिक्षा अधिकारी वकीलकुमार निरौला की गोली प्रहार कर हत्या की गई और टेलिफोन द्वारा उन्ही लोगों ने जिम्मेवारी ली थी । सशस्त्र समूह के नायक सहित पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर चुकी है । किसी को जाँचबूझ के लिए रखा गया है तो किसी को जेल तक चलान कर दिया गया है ।
सात वर्षतक ये सभी आधुनिक जीवन बिताने के लिए, ऐश आराम और मौज मस्ती का जीवन बिताने के उद्देश्य पर्ूर्ति के लिए गलत आदतों में पFmसकर अपराधिक क्रियाकलाप करते रहे । जबकि प्रारम्भिक काल में मधेशी जनता इन सभी पर गर्व करती थी कि मधेश मुक्ति के लिए इन सपूतों ने जन्म लिया है । जनता की आशा और विश्वास को जिस प्रकार से तोडÞा गया है वह बहुत ही घृणित है । राज्य के साथ अधिकार की लडर्Þाई लडÞने वालों ने अपने ही घर में हत्या हिंसा उत्पन्न कर इन्सानियत को शर्मिन्दा किया है ।

जनकपुर बम विस्फोट
वि.सं. २०६९ बैसाख १८ गते सोमवार को जो बम विस्फोट हुआ था, वह आजतक रहस्यमयी फिल्म की तरह रहस्य के आवरण में ही छुपा हुआ है । इस दुखद घटना में विमल शरण दास, महिला रंगकर्मी रञ्जु झा, झगरु दास, सुरेश उपाध्याय और दीपेन्द्र दास की  मौत हर्ुइ थी और करीब तीन दर्जन घायल हुए थे ।
किसी भी फिल्म में तीन पात्र प्रमुख होते हंै । नायक, खलनायक और नायिका जिससे दर्शको कीे जिज्ञासा बनती और बिखरती रहती है । बम बिस्फोट के इस रहस्यमयी फिल्म  में नायक और नायिका हंै ही नहीं । दो खलनायक पात्रों के बीच जनता दर्शक बनी है और उनकी जिज्ञासा बढÞता जा रही है । घटना उस समय की है जब नेपाली काँग्रेस, एमाले, एमाओवादी और मधेशवादी दल अपनी डफली अपना राग आलाप रहे थे और अलग अलग प्रदेशों की घोषणा कर रहे थे । उसी समय मिथिला राज्य कीे मांग करते हुए मिथिला राज्य संर्घष्ा समितिे सडÞक आन्दोलन कर रहे थे और धरने पर बैठे हुए थे ।
बिस्फोट के कुछ ही देर बाद जयप्रकाश चौधरी, सुरेश कर्ण्र्ााजितेन्द्र लाल कर्ण्र्ाारिपेन्द्र झा को गिरफ्तार कर लिया गया था । जनता में कोलहाल मचा था कि इस घटना में जिला विकास समिति के सह-लेखापाल जीवननाथ चौधरी तथा धनुषा क्षेत्र नं. ४ के सभासद एवं राज्य मन्त्री संजय कुमार साह की संलग्नता हो सकती है । उस समय माओवादी की सरकार थी । जनकपुर में फिर से आन्दोलन हुआ मृतकों को शहीद घोषित किया जाए यह माँग की गई और सरकार ने भी मृतकों के परिवार को दस-दस लाख रुपैया देकर आन्दोलन को शान्त कर दिया ।
घटना के ९ महीने बाद जनकपुर में फिर से बबाल मचा । घटना से सम्बन्धित एक सीडी बजार में आई जिसमें पर्ूव मन्त्री संजय कुमार साह और घटना की जिम्मेवारी लेने वाले मुकेश चौधरी की आवाज थी, जिसमें यह तय किया जा रहा था कि, बम कहा रखा जाए, कौन-कौन धरना में है आदि । इस सीडी के बाजार में आने के बाद मिथिला राज्य संर्घष्ा समिति ने प्रशासन पर दबाव देने के लिए फिर से आन्दोलन किया । उसी समय मधेश क्रान्ति फोरम जिसके संयोजक पर्ूव मन्त्री संजय साह थे उन्होने ने भी जि. वि. स. के सह-लेखापाल जीवनाथ चौधरी और मुकेश चौधरी के काल डिटेल्स र्सार्वजनिक किये गये जिसमें घटना के दिन दोनों के बीच बातचीत हर्ुइ थी यह स्पष्ट पता चलता  है । चौधरी और साह के बीच द्वन्द को देखकर फिर से मिथिला राज्य संर्घष्ा समिति पीछे हट गया ।
बम बिस्फोट घटना की जिम्मेवारी लिए अर्जुन सिंह उर्फमुकेश चौधरी जिन्होने मधेश मुक्ति की लडर्Þाई भूमिगत होकर लडÞ रहे थे उसे भी जिला प्रहरी कार्यालय धनुषा ने ०७० फागुन १८ गिरफ्तार कर लिया है । परन्तु बम बिस्फोट हादसा का योजनाकार कौन है अभी तक र्सार्वजनिक नही किया गया है ।
बिस्फोट की जिम्मेवारी लिए चौधरी क्या कहते हैं –
रामानन्द चौक बम बिस्फोट घटना की जिम्मेवारी लेने वाले मुकेश चौधरी को प्रहरी ने भारत के उत्तर प्रदेश से गिरफ्तार किया, यह बात विभिन्न मिडिया में आने बाद भी जिला प्रशासन कार्यालय धनुषा यही दावा करती आई है कि, उन्हें जनकपुर के जटही से गिरफ्तार किया गया है । बम बिस्फोट के कुछ ही देर बाद उन्होने सञ्चारकर्मियों को फोन कर कहा था कि मधेश को खण्डित करने के लिए यह आन्दोलन किया जा रहा है, इसलिए हमारे पार्टर्ीीे मधेश को खण्डित करनेवालांे के विरोध में यह बिस्फोट कराया है ।
प्रहरी ने जब उन्हे गिरफ्तार किया तो उन्होने कहा कि जिला विकास समिति के सह लेखापाल जीवनाथ चौधरी ने यह बिस्फोट कराने के लिए कहा था । जब प्रहरी को चौधरी की बातों पर विश्वास नहीं हुआ तो उन्हांेने पोल्रि्राफ मशीन -झूठ पकडÞनेवाला मशीन) से जाँचने की बात की जिससे दूध का दूध और पानी का पानी हो जाए ।
 क्या कहता है पोल्रि्राफ मशीन
जनकपुर के रामानन्द चौक में हुआ बम बिस्फोट नेपाल कीे सबसे बडÞी वारदात मानी जाती है । करीब दो वर्षपहले हुए इस बिस्फोट में पाँच की मौत और तीन दर्जन से ज्यादा घायल हुए थे । फिलहाल बिस्फोट करानेवाले अर्जुन सिंह उर्फमुकेश चौधरी अभी प्रहरी हिरासत में है । बिस्फोट का मुख्य योजनाकार कौन है प्रहरी अनुसन्धान में अभी तक स्पष्ट नही हुआ है । चौधरी के बयान पर प्रहरी को शंका हर्ुइ तो सीआईबी नेपाल के टोली ने पोल्रि्राफ मेशिन अर्थात झुठ पकडÞनेवाले मशीन से चौधरी को जाँचा ।
प्रहरी स्रोत के अनुसार चौधरी झूठ बोल रहा है । परन्तु मशीन यह नही कहता है कि इसका मुख्य योजनाकार कौन है । इस मशीन ने यह तो साबित कर दिया कि चौधरी झूठ बोल रहा है आगे का अनुसन्धान अभी तक जारी है ।
कौन है बम बिस्फोट का मुख्य योजनाकार
जनकपुर के रामानन्द चौक पर हुए बम बिस्फोट का मुख्य योजनाकार धनुषा क्षेत्र नं. ४ का सभासद् एवं सद्भावना पार्टर्ीीे वरिष्ठ उपाध्यक्ष संजय कुमार साह है ऐसा प्रहरी ने दावा किया है । धनुषा प्रहरी उपरीक्षक उत्तम राज सुवेदी के अनुसार अनुसन्धान के क्रम में गिरफ्तार किए गए मुकेश चौधरी और ओम प्रकाश यादव के बयान के आधार पर साह मुख्य अभियोगी है । उन्होने यह भी कहा है कि साह के गिरफ्तारी के लिए नेपाल के ७५ जिलों को प्रहरी प्रधान कार्यालय से र्सकुलर जारी कर दिया गया है ।
संजय साह निर्दोष है ः सद्भावना
जनकपुर बम बिस्फोट का मुख्य अभियोगी संजय कुमार साह है, ऐसा प्रहरी दावा कर रहीे है इधर सद्भावना पार्टर्ीीे ज्ञापन पत्र में साह बिलकुल निर्दोष है ऐसा उल्लेख किया जा रहा है । पार्टर्ीीे केन्द्रीय अध्यक्ष राजेन्द्र महतो ने प्रधानमन्त्री सुशील कोइराला को चैत्र ६ गते ज्ञापन पत्र देते हुए जनकपुर बम काण्ड का स्वतन्त्र तथा न्यायिक छानबीन की मांग भी की है । ज्ञापन पत्र में उन्होंने कहा है कि  माननीय सभासद संजय कुमार साह को फँसाया जा रहा है । बम बिस्फोट घटना के दो महीने बाद मृतक महन्थ विमल शरण का बेटा रामशरण ने पिता की हत्या मन्दिर के स्वामित्व को हडÞपने के लिए मोवाइल से फोन कर घटना स्थल पर बुलाकर हत्या करवाया गया, धनुषा जिल्ला प्रहरी कार्यालय ने इस मुद्दा का दर्ता नही किया यह बात भी ज्ञापन पत्र में उल्लेख है । प्रहरी के मुद्दा और अनुसन्धान में कहीं भी साह को प्रत्यक्ष रूप से इस  घटना में संलग्नता नहीं दिखाया गया है । ज्ञापन पत्र में निष्पक्ष, न्यायिक छानबीन हो,  छानबीन आयोग गठन कर वास्तविक दोषी पर कार्रवाई किया जाए उल्लेख है । संजय कुमार साह पार्टर्ीीे वरिष्ठ उपाध्यक्ष भी है ।

राजनीतिक एजेण्डा और क्रान्तिकारी नारा
देकर दिग्भ्रमित किया है ः पुलिस प्रमुख
धनुषा पुलिस प्रमुख उत्तम राज सुवेदी के अनुसार मधेश आन्दोलन पश्चात् सबसे ज्यादा फायदा सशस्त्र समूह ने लिया है । राजनीतिक एजेण्डा और क्रान्तिकारी नारा देकर जनता को दिग्भ्रमित किया गया है । पैसे के लिए अपहरण करना, फिरौती मांगना, बम बिस्फोट करना और कराना, धमकी देना यहाँ तक की हत्या तक कर देना इनका लक्ष्य था । समय अनुसार अलग-अलग तरीका अपनाकर इन समूहों ने आपराधिक क्रियाकलाप किया है । ऐसी भी कुछ घटनाएँ हैं, जिन्हंे समूह के नायक ने स्वयं किया है तो कुछ घटना किराए के आदमी से करवाया है । लेकिन सशस्त्र समूह के नायकों को पुलिस  गिरफ्तार कर चुकी है । उन्होने दावा करते हुए यह भी कहा है कि अपराधी क्रियाकलाप में संलग्न व्यक्ति नेपाल पुलिस की नजर से दूर नहीं रह सकते हैं । चाहे जो भी व्यक्ति होंगे उन्हे कभी नही छोडÞा जाएगा । उन्होंने कहा मधेश में सशस्त्र समूह का प्रभाव लगभग निस्तेज हो चुका है ।

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