कमिशनमांडू

मुकुन्द आचार्य:काठमांडू अपना नाम समय-समय पर बदलते रहता है । जैसे कुछ बनिया-बैताल सरकारी महसूल डकारने के लिए अपने र्फम का नाम बदलते रहते हैं और सरकार को ठेंगा दिखा देते हैं । कानून अंधा भी तो होता है ।
जितने पके पकाए, सोलिड लोग हैं, वे सब तो जानते ही हैं कि आज का काठमांडू पहले जमाने में ‘काष्ठमण्डप’ हुआ करता था । काठों -लकडियां) से बना मण्डप । और क्या ! काठ गोदाम ही समझ लीजिए न !
आदिकवि भानुभक्त आचार्य बुढÞऊ को न जाने क्या सूझा, अपनी धुन में मगन होकर उन्होंने इस रुखेसूखे काष्ठमंडप को सरल-सरस कान्तिपुरी बना दिया । उनके जमाने में प्रकृति, खास कर उपत्यका की अक्षत यौवना थी । उसे किसी ने छेडÞ छाडÞ नहीं की थी । तभी तो उनको अलकापुरी को कान्तिपुरी नगरी लिखते समय तनिक भी संकोच नहीं हुआ कि कल को कोई भी कह सकता है- हे कवियों के पर-परदादा क्यों तंूने कर दी- कान्तिपुर की तारीफ इतनी ज्यादा । छोडिए, भानुभक्त के जमाने की बात को । जो दुनियाँ से गुजर जाते हैं, उनके सात खून माफ कर दिए जाते हैं । लोग ऐसा कहते हैं- प्यारे पाठकों, इसका ये मतलव न समझ लेना कि बूढेÞ होने पर खून करना चाहिए । मरने पर सात खून तो माफ होने ही वाले हैं । मरना ही है तो चलो बैंक लूट लें । इस शहीदाना मौत पर बालबच्चे दुआ तो देंगे ।
साल-दो साल पहले का वाकया है । पडÞोसी मुल्क के एक घनघोर जोशीले शायर यहाँ पधारे और आते ही ‘काठमांडू’ को उन्होंने ‘पोयमाण्डू’ बना दिया । नए नामकरण के उपलक्ष्य में आगन्तुक कवि महोदय ने नए-पुराने, छोटे-बडÞे सभी साइज के कवियों को बटोर कर पोयमांडू नाम को रौशन करना शुरु किया । सलाम है शायर के जज्बे को, जिसने काठमांडू को पोयमाण्डू बना दिया और भूले बिसरे, अंधेरे में पडÞे, मूलप्रवाह से दूर खडÞे, माइक-मञ्च के भूखे-प्यासे कवियों को जिन्दगी का भँडÞास निकाल कर कुछ राहत महसूस करने का सुनहरा मौका तो दिया । खैर … ! खुदा करे ऐसे शायर गाहे बगाहे यहाँ आते रहें और साहित्यिक माहौल में गर्माहट पैदा करें ।
बहरहाल, काठमांडू का एक नयाँ नाम सुनने में आया है । जानकार सूत्रों का कहना है, यही नाम सौ फीसदी वाजिब है, उपयुक्त है । यह नाम है- कमिशनमांडू । राजनीति के गलियारे में, प्रशासनिक पेंचों में यह भला-सा नाम गंूजता रहता है । बुजुर्गों का मानना है, कमीशन का दीमक बडÞे प्यार से देश को चाट जाता है । और किसी को कानो कान खबर भी नहीं होती ।
एक तजर्ुर्वेकार सरकारी अफसर ने सुनाया- जापानी सरकार की ओर से नेपाल सरकार की मदद में अनेक सडÞकों का निर्माण होने वाला था । उसके मुतालिक सारे जरूरी काम हो चुके थे । समझौते के कागज सिर्फदस्तखत के मोहताज थे । शायद खुदा को यह मंजूर न था कि नेपाल की सडÞक भी रिश्वतखोरों के चेहरे की तरह चमकें । इतने में नेपाली मन्त्री ने प्रश्न का पटाखा छोडÞा- इतना सब कुछ करने के बाद हमें क्या मिलेगा – अर्थात् कमीशन की रकम मुझे कितनी मिलेगी – ऐसी मांग एक मोहतरमा मन्त्राणी ने की थी । अब नाम और शख्सियत का पता फर्ुसत में आप लगा सकते हैं । सारा मामला खर्टाई में पडÞ गया । कमीशनमांडू ने सारा खेल खराब कर दिया । जापानी सरकार कमीशन देने से तो रही । नेपाली किस्मत और सडÞक दोनों मुँह बाए देखती रह गई । शायद इसी सूरतेहाल को कहते हैं- आसमान से गिरा तो खजूर पे अटका !
हर महकमे में किसी को भी प्रमोशन चाहिए तो मोटी सी रकम कमीशन के लिए तैयार रखिए । ठेक्का पट्टा हो, तबादला हो, स्कुल काँलेज में दाखिला लेना हो । मुद्दा मामला अदालत में अटका हो- लटका हो तो कमीशन का रामवाण ही काम करता है । वह असरदार साबित होता है । आपने भी तो बहुतों बार आजमाया होगा, इस नुस्खे को !
आज कमीशनखोरों को आदर के साथ हिन्दी में दलाल और अंग्रेजी में ब्रोकर कहते हैं । किसी भी शब्द का जब अंग्रेजीकरण हो जाता है, तब नजाने कहाँ से वह शब्द वजनदार बन जाता है । आप दलाल को ब्रोकर कहेंगे तो वह बहुत खुश होगा । हालांकि वह विशुद्ध कमीशनखोर है । आज कल किसी भी पेशा को बुरा नहीं माना जाता । जैसे गांव देहात का हजाम शहर में आ कर ‘हेयर ड्रेसर’ बन जाता है, देहात का दर्जी ‘टेलर मास्टर’ बन जाता है । चपरासी कार्यालय सहायक हो जाता है । चूल्हा फूंकते-फूंकते जिसका दम घुटने लगता है, उसे ‘हाउसवाइफ’ कह कर चने के झाडÞ पर चढÞा दिया जाता है । उसी नियम से दलाल बन जाता है ‘ब्रोकर’ । आप दलाल को ब्रोकर कह दें तो अपनी बत्तीसी दिखा कर वह आप को शुक्रिया अदा करेगा । भारत के एक बडÞे शहर में तो दलाल मार्ग ही है । अतः दलाल और दलाली को हेय न समझें । अर्थतन्त्र की नकेल अपने हाथ में लिए ये कमीशनखोर ऊर्फब्रोकर, उर्फदलाल शान के साथ देश की हड्डी में से मज्जा चूस कर मजे लेता है । आपको जितना कूढÞना हो कुढÞ लीजिए, किसी को कोई र्फक नहीं पडÞता । आप कूढÞते रहंेगे, वे चूसते रहेंगे ।
काठमांडू को भी कमीशनमांडू कहने पर कोई र्फक नहीं पडÞता । शरीर में जैसे रक्तसञ्चार बेहद जरूरी होता है, उसी तरह आज नेपाली अर्थतन्त्र को कमीशनतन्त्र ने जिन्दा रखा है । जमाना बदल गया है, क्या कीजिएगा । दलाल बनने में संकोच न करें ।
आप भी चाहें तो कमीशनमांडू में दोचार हाथ आजमा सकते हैं । कमीशन वाले पेशे में हर्रर्ेेगे न फिटकिरी रंग चोखा । जिस तरह प्रभु के अनेक रूप और अवतार होते हैं, कमीशन के भी अनेक रूप होते हैं । कुछ भलामानुंस अपने घर में जुवा खेलाते हैं । और जुवारियों से कमीशन ले कर अपनी उद्यमशीलता को प्रखरता प्रदान करते हैं । रियल स्टेट -जमीन और घर) के विजनेस में भी कमीशन का शानदार खेल होता है । अच्छे खिलाडÞी जल्द ही मालामाल हो जाते हैं ।
मेरी इतनी बकवास सुनने के बाद आप झख मार कर काठमांडू को कमीशनमांडू कहेंगे । कल काठमांडू महानगर रास्ते में यूं ही मिल गया था । और मुझे उलाहना दे रहा था- सुनते हैं, आप मेरा नाम बदल कर कमीशनमांडू बनाने जा रहे हैं –
मैंने कहा- तुम्हें कोई एतराज तो नहीं – काठमांडू मुस्कुरा कर कहने लगा- गिरिधर मुरलीधर कहें, कछु दुख मानत नाहीं ।
अर्थात् गिरिधर कृष्ण को आप मुरलीधर भी कहेंगे तो वे थोडेÞ न दुःखी होंगे –

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