कम्बल के निचे घी खाने की आदत कहीं छुट न जाए : कैलाश महतो

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कैलाश महतो, पराशी, ४ मई | प्रकृति अपने आप में एक अदभुत शक्ति होती है । सारी शक्तियाँ प्रकृति से ही आविष्कार और निर्माण होती है । शक्ति की रुप अलग अलग होती है, पर स्रोत प्रकृति ही होती है । वह चाहे भौतिक हों, अध्यात्मिक हों, शिक्षा की हों, जागृति का हों, राजनीति का हों या आर्थिक हों, सब का निर्माण वहीं से होता है । मधेशवादी कुछ नेताओं का व्यक्तव्य है यह कि कम्बल के नीचे घी खाने की जो आदत पडी है-उससे कहीं छुट्टी न हो जाए । यह बडी असमञ्जसपूर्ण अभिव्यक्ति है जो मधेशी जनता को समझना होगा । जाँच पडताल यह करना होगा कि कम्बल के बाहरी शक्ति के भितर घी की आन्तरिक शक्ति को भोजन बनाने बाले कौन रहा है ? वे किसकी बात करते हैं । उनकी अभिव्यक्ति सिर्फ अभिव्यक्ति ही है या वास्तविकता भी ? कम्बल और घी का निर्माण तकरीबन एक ही शक्ति से निर्माण होता है, और वह है घासपात तथा दाना पानी से । घी और कम्बल दोनों की उत्पादन वही दाना पानी खाने बाले जानवरों से होता है । लेकिन जब घी खाया जाता है तो उसका असर आदमी के शरीर और चेहरे दोनों पर दिखाई देती है । और होता यह है कि जो आदमी घी को घी समझकर खाता है, वह स्वस्थ रहता है और जो मूल खाना समझता है, वो घी से ही बिमार ‌होकर मर भी जाता है । और नेता के अभिव्यक्त अनुसार ही अगर कोई कम्बल तले अगर घी खाता हो तो जल्द ही मरेगा, क्यूंकि उसके भितर के गुमसुमाहट खतरनाक ही होता है ।

आजकल नेपाल के राजनीति‌ में अजीबोगरीब किस्म के सुगबुगाहट शुरु हुई है । ऎसा लगता है जैसे सारे घटनाएँ सोची समझी हो । नेपाल का संविधान मानों कोई हिन्दी फिल्म का बडा खलनायक हो और हीरो बनने के लिए नेपाली और मधेशी दोनों पार्टियाँ आपसी लडाई लड रहे हों । और खलनायक कहलाने बाले वह संविधान मन्द मुस्कानों साथ अपना पैर जमाये विराजमान हों । संविधान यह जानता है कि नेपाल के संविधान को मानने मानकर‌ भी न मानने का नाटक करने बाले राजनीतिक दलों का कोई हैसियत ही नहीं है कि वो उसमें कोई सुधार कर दें । अगर की तो वैसा ही अनहोनी कर दिखाने का धम्की खुद संविधान दे रहा है जैसे Pandora’s box खोलने के बाद की अकल्पनीय अनहोनियां संसार को झेलना पडा था । यह बात दोनों पक्षों के राजनीतिक शक्तियाँ जानती है । मगर बेचारे जनता कि बली के बकडे बनने‌ बाले हैं ।

बेचारे राजनीतिक कुछ व्यापारी मधेशी नेता लोग स्थानीय चुनाव लडने के लिए दिवा स्वप्न देखने लगे हैं । उनका मानना है कि उनके मालिकों ने अब उन्हें विशाल गाँव पालिका, नगरपालिका व महानगरपालिकायें बना डाली है । वे चुनाव जितकर बडे स्थानों पर राज करेंगे, हुकुमत करेंगे और जनता के सेवा नाम पर ब्रम्हलुट मचायेंगे और धनाढ्य हो जायेंगे । यह सत्य है कि चुनाव होना जरूरी है । मगर चुनाव होते ही नेपाली राज्य का पतन‌ दिन भी करीब आना भी निश्चितप्राय: है । और यह बात नेपाली राज बखुवी जानती है । इस अवस्था में वह चुनाव क्यूं कराना चाहेगी ? कौन सा पहाड टुट पडा जब दो दशकों तक स्थानीय निर्वाचन नहीं हो पाया ? यह सब नेपाली राज का साजिशपूर्ण रणनीति है कि मधेशी दलों के कारण चुनाव को असंभव करायें । खैर नेपाली राज का जो भी साजिशपूर्ण रणनीति हों, निर्वाचन हो या नहीं हों, फायदे स्वतन्त्र मधेश को होना तय है ।

बडा विचित्र अभिव्यक्ति है, “कम्बल के नीचे घी खाना ।” यह अभिव्यक्ति मोदी की अभिव्यक्ति “रेनकोट लगाकर बाथरुम‌ में स्नान करने जैसा” ही है । इन बेअर्थ के अभिव्यक्ति के अन्दर कमाल के अर्थ छुपा हुआ है । अब यह भी तय होने ही बाला है कि कम्बल के अन्दर घी का डब्बा किसने खाकर जुठा किया ? उसे नेपाली राज पकडने में भले ही आनाकानी करे, लेकिन वह पकडा जरुर जायेगा या घी-बिमार होकर मर जायेगा । उस घी-बिमारी से ही बचने का उपाय है मेढकों की एकीकरण, दो क्षेत्रों के कुत्तों में दोस्ती और अपने‌ प्राक्रितिक चालों को छोडकर मयूर बनने निकले बुलबुल अपनो से भी गया और मयूर तो बन नहीं पाया । ग्रिहमन्त्री बनने चले निधी भाइजान का हालत अभी देखने लायक है । बेचारे मधेशी अभियन्ता डा. सिके राउत को परेशान करके नेपालभक्त होने का दुस्प्रयास करने के बावजुद नेपालियों ने विश्वास नहीं की । संजय साह द्वारा उनके उपर लगाये गये अपराधों को सामने लाने के लिए मांग की जा रही पोलिग्राफ को अवहेलना करना भी राष्ट्रभक्त हने का कोशिश भी नाकामयाब होने, अपने मातहत के इन्सपेक्टर तक ने सम्मान न करने तथा मन्त्रिमण्डल में समेत बरियताक्रम न पाने के पीडा बोध से मन्त्री पद समेत से राजीनामा देना पडना गंभीर अवस्था एक तरफ है तो दूसरी तरफ नेपालियों के लिए खुशखबरी है कि मधेशी होनहार नेताओं को इसी तरह से मधेश में ही इज्जतहीन बनाकर असफल बनाना ।

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