कर्मभोग एवं कर्मप्रायश्चित

रोग घटे कुछ औषद खाई ।
पाप घटे कुछ हरिगुन गाई ।

krishna_arjun
रवीन्द्र झा
गहना कर्मणेगतिः – गीता ४।१७
कर्म की गति को गहन कहने का तात्पर्य है, जो कर्म करता है, वही फल भोगता है और कर्म का फल भोगना ही पड़ता है– ये ध्रुवसत्य है ।
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणे च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुब्येसु स युक्तः कृत्सनकर्मकृत् ।। गीता ४।१८
जो कर्म में अकर्म देखता है और अकर्म में कर्म देता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है । वह युक्त है । वह समस्त कर्मों को करनेवाला है । कर्म सब हो रहे है, किन्तु आसक्ति नहीं है, उनमें कर्तृत्व का अहंकार नहीं है तो व्यक्ति अकर्ता है और कर कुछ नहीं रहे हैं, किन्तु मन ‘यह करो’ ‘यह करो’ की योजना बना रहा है तो वह देह से कुछ न करनेवाला करता ही हैं ।
प्रधान सेनापति या राष्ट्रपति युद्ध में तोप चलाते हैं या बन्दूक ? लेकिन युद्ध का कर्ता कौन माना जाता है ? विजय किसकी कही जाती है ? सेवक जो काम करते हैः उसका पाप–पुण्य, लाभ–हानि स्वामी का है या नहीं ? आप कहेंगे कि जिसमें कर्तत्व का अहंकार है, कर्मफल उसे होता है । स्वामी में कर्तत्व का अहंकार है । वह कर्ता भले ही न हो, कारियता हैः अतः फलभोग उसे प्राप्त होना ही चाहिए । लेकिन आपने शिवरात्री– व्रत का महात्म्य पढ़ा होगा । एक हिंसक शिकारी दिन भर वन में भटकता रहा । कुछ मिला नहीं भोजन को, अतः भूखा रहा । रात्रि में वन्य पशुओं से बचने के लिए बेल के पेड़ पर चढ़ गया । प्राणभय से रात्रि भर जागता रहा । संयोग ऐसा कि उस वृक्ष के नीचे शिवलिंग था । शिकारी के हिलने–डोलन से बेलपत्र टूटते तो शिवलिंग पर गिरते । यह उसका शिवरात्रि व्रत तथा शिवार्चन मान लिया गया । कहाँ उसमें कर्तृत्व का अहंकार है ?
कर्मफल में अनेक भागीदार होते है । मातां–पिता, पुत्र, पति या पत्नी, देश का शासक, गुरु– ये सब कर्मफल में भाग पाते हैं, भले उस कर्म के किए जाने का उन्हें पता तक न हो । कर्म का आदेश देनेवाले, उसका समर्थन या विरोध करनेवाले, उसकी प्रशंसा या निन्दा करनेवाले भी उसमें भाग पाते हैं ।
इन सब बातों को ध्यान में रख कर कहा गया है कि ‘गहना कर्मण्ये गति ः ।। कर्म की गति अत्यन्त जटिल है । बड़े–बड़े कर्मशास्त्र के ज्ञाता भी इस सम्बन्ध में भ्रम में पड़ जाते है ।
कर्मभोग कितना ?
किस कर्म का क्या भोग प्राप्त होगा ? कितने समय तक प्राप्त होगा ? इसका वर्णन यद्यपि ज्योतिषशास्त्र और कर्म विपाक दोनों में है, यह सत्य है । किन्तु यही कोई बहुत सुनिश्चित बात नहीं है । सब को एक–सा ही फल नहीं मिलता । स्थिति के अनुसार तारतम्य रह सकता है ।
एक ही कर्म का उदीयमान दुःखद फल एक पापरहित प्राणी को दीर्घकाल तक दुःख देता है और एक साधक को कभी कभी तो उसके आराध्य की कृपा से केवल स्वप्न में ही उसका फल भोग हो जाता है, जाग्रत में उसका कोई प्रभाव ही नहीं होता । इसलिए राष्ट्रकवि श्री मैथिली शरण गुप्त ने कहा था–
उपर डराते हो क्यों मुझ को, कह कह विधि का अटल विधान ।
‘कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुम्’ है समर्थ मेरा भगवान ।।
भक्तिशास्त्र में भगवान में जिनकी श्रद्धा है, उन भगवान के मंगल विधान में सहज विश्वास रखनेवाले भक्तो पर प्रारब्ध का कोई प्रभाव नहीं होता । वे सर्वत्र सदा भगवान का मंगल स्पर्श प्राप्त करते हैं । भक्त का कोई पूर्वकृत कर्म ऐसा फल प्रकट नहीं कर सकता, जिसमें भक्त का अहित–अमंगल हो । कर्माविधान का दुःखपारतन्त्रग्य भक्त के लिए जाग्रत् तो क्या, स्वप्न में भी नहीं है । श्री शुकदेवजी तो कहते है–
देवर्षभुताप्तनृर्ण पितृणां
न किङ्करो नायगृणी च राजन् ।
सर्वात्मना यः शरणं शरण्य
गतो मुन्द परिहत्य कर्तम् । –श्रीमभ्दा ११।५।४१।
‘राज्न परीक्षित् । शरण लेनेयोग्य श्रीमुकुन्दकी शरण में जो अपने कर्तृत्वोभिमान को छोड़कर सर्वात्मना चला गया, वह अब देवता, ऋषि, प्राणी, श्रेष्ठ मनुष्य (राजादि) एवं पितरों का भी न सेवक है और न ऋणी ।
अतः कर्म का भोग कब, कैसे मिलेगा और कैसे नहीं मिलेगा, इस चिन्ता को छोड़कर मंगलमय श्रीहरि के मंगल–विधान पर विश्वास–रखकर उनकी शरण ग्रहण करना सबसे निरापद मार्ग है । जो ऐसा नहीं कर पाते, उनके लिए सूकाम अुनष्ठान तथा कर्म प्रायश्चित का विधानशास्त्र ने किया है ।
कर्मप्रायश्चितः
मनुष्य स्वयम्–नियम से रहे और नियमित पथ्य, अहार–बिहार रखे तो उसके रोगी होने की सम्भावना बहुत कम रहती है । रोग प्रायः आहार विहार के असंयम से अथवा कही किसी प्रकार की सवाधानी में त्रुटि हो जाने से होता हैं । रोगी स्वयं कुशल चिकित्सक भी हो तो भी अपनी चिकित्सा स्वयं न करें, यह नियम है । उसे दूसरे अच्छे चिकित्सक की सम्मति लेनी चाहिए । जो चिकित्साशास्त्र जानते ही नहीं अथवा अपूर्ण जानते है, उनके द्वारा कोई चिकित्सा करायेगा तो परिणाम जो कुछ होगा, वह आप समझ सकते हैं ।
पाप मानसिक रोग है । जैसे आहार एवं आधार से च्यूत होने् से शारीरिक रोग होता है और वे दुःख देते हैं, वैसे ही विचार–आचार में च्यूतिका होना ही ‘पाप’ कहलाता है । इससे मन में रोग होते हैं और कालान्तर में ये जब फलदोन्मुख होते है तो तन–मन दोनों के लिए दुःखद होते हैं ।
शारीरिक रोग तत्काल दुःख देने लगते है, किन्तु पाप तो रोग के बीज के समान है । जैसे किसी के शरीर में कैंसर का बीज पहुँच जाय तो वह बहुत देर में रोग के रूप में प्रकट होता है, और पीड़ादायक बनता है, उसी प्रकार पाप दुःख के बीज है, देर में या जन्मान्तर में अपना भयानक रूप प्रकट करते हैं । बुद्धिमान व्यक्ति कैंसर तथा दूसरे किसी रोग का बीज शरीर में पहुँचने की सम्भावना होने पर जाँच करता है और यदि बीज शरीर में हुआ तो उसकी उसी समय चिकित्सा करता है । उस समय रोग की चिकित्सा सरल होती है ।
इसी प्रकार पाप–अशुभकर्म हो जाए । अपने को लगे कि हुए तो इनकी तुरन्त चिकित्सा कर दी जानी चाहिए । इस समय इनका प्रायश्चित उतना कठिन नहीं होता । किन्तु जन्मान्तर में वे फलोन्मुख होंगे, तब इनके प्रभाव को मिटाने के लिए जो अनुष्ठानादी करने होंगे, वे पर्याप्त कठिन होंगे । पापकर्म का प्रायश्चित स्वयमं कर्ता करता निश्चित नहीं कर सकता । क्योंकि एक ही कर्म देश, काल, पात्र तथा कर्ता की योग्यता, मन, स्थिति के अनुसार लघु वा गुरु बनता है । पाप से लघु–गुरु, शुष्क आद्र के स्वतः भी भेद होते है । चीटी की हत्या, गधे की हत्या, मृग या बराही की हत्या, हाथी की हत्या, मनुष्य या गौ की हत्या, ये सब प्राणिवध है । किन्तु इनमें हत्या के समान पाप नहीं है । क्षुद्र जीवों को वध का पाप क्षुद्र माना गया है बडेÞ प्राणियों में भी किन्हीं के वध का पाप कम एवं किन्हीं का बहुत माना गया है । वैसे ही प्रत्येक व्यक्ति प्रायश्चित–निर्देशक नहीं हो सकता । भले वह उच्च कोटि का साधक अथवा महात्मा हो । इसके लिए प्रायश्चित शास्त्र का गम्भीर अध्ययन तथा स्थितियों को समझने का अच्छा अनुभव आवश्यक है । ऐसे–ऐसे व्यक्ति से ही प्रायश्चित–विधान प्राप्त करना चाहिए । ऐसी दशा में आज का मनुष्य क्या करे ? इस युग के लिए पाप परिमार्जन का, सबके लिये सब पापों को परिमार्जन का सुगम साधन शास्त्र ने पहले से सुनिश्चित कर दिया है–
सर्वेषमप्यद्यवर्तामदमेव सनिस्कृतम् ।
नामत्याहरणं विष्णेर्यतस्ताद्विष्या मति ।
(श्रीमदा ६।२।११
‘सब प्रकार के पापों के कर्ता पापियों के लिए केवल यही समुचित प्रायश्चित है कि वे भगवान नारायण के नाम का उचारण–जप–संकीर्तन करे, जिससे भगवान में उनकी बुद्धि लगे । सब पापों का सुनिश्चित एवं सर्वसम्मत प्रायश्चित है, यह सर्वत्र सब समय सबके लिए सुगम है । उपाय है । श्रीमद्ध भागवत ने स्पष्ट कर दिया है–
रोग घटे कुछ औषद खाई ।
पाप घटे कुछ हरिगुन गाई ।

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