कला के वगैर तो मनुष्य पशु के समान : संजय कुमार साहनी

संजय कुमार साहनी ललित कला के जाने माने प्रोफेसर हैं .

संजय कुमार साहनी ललित कला के जाने माने प्रोफेसर हैं . विगत 15 वर्षों से वे बिजनोर में स्थित सार्वजनिक आर्य इन्टर  कालेज  के फ्रोफेसर हैं. उन्होंने एम जी के वि पी वाराणसी से ललित कला में विद्यावारिधि की उपाधि हासिल की है .उन्हें दो दर्जन से अधिक अवार्ड भी  मिल चुका है .ठमेल में स्थित मिथिला यें आर्ट गैलारी में आयोजित इन्टरनेसनल आर्ट वर्कशाप में अपनी कला की प्रस्तुति हेतु एक हफ्ते पहले  काठमान्डू आए थे.इसी दौरान हिमालिनी के सह सम्पादक विनोदकुमार विश्व्वकर्मा ने ललित काला से सम्बन्धित   बातचीत की थी .पेश है बातचीत  का सम्पादित अंश –

 १ ललित कला को आप किस प्रकार से परिभाषित करते हैन ?
ललित कला में जीतनी  भी कलायें होती हैं वह आन्तरिक अभिव्यक्ति का एक माध्यम है .इससे ज्यादा मेरे समझ से और कुछ नही हैं.जिस तरह से आदमी को भूख लगती है ,तो उन्हें जीने के लिए भोजन चाहिए .इसी प्रकार आदमी को मानसिक खुराक के लिए ललित कला की आवश्यकता होती है .जब हम शारीरिक कार्य करते हैं ,तो ज्यादा थकान महसूस होती है .उस वक्त हमें मेन्टल रिलैक्स की जरुरत पड्ती है .और वह मेन्टल रिलैक्स सिर्फ़  कला में ही होती है .यह सौन्दर्य बोध के माध्यम से हमारे अन्डर स्फूर्ति भी पैदा करती है और नया सृजन करने के लिए हमें प्रेरित करती है .
 २ आप ललित कला से कैसे जुड़े ?
देखिए ,इसे हम अपने जीवन  को ट्रेजेडी मानते हैं .क्योंकि इस कला में जुड़ने से पूर्व मैं खिलाडी था .खेलकूद में मेरी ज्यादा रुची थी .एक कहावत है -होना होता है कुछ , लेकिन होता है कुछ .मेरे जीवन में भी ऐसा ही हुआ  .नाइन्थ  कक्षा में पढते    वक्त मेरे एक दोस्त थे दिनेश साहनी ,जिन्होंने मुझे आर्ट बनाने के लिए प्रेरित किया .उस समय उनका अच्छा क्रेज था उस स्कूल में .उन्हीं की प्रेरणा से मैने ललित कला को नजदीक   से देखा और सीखा भी .इसी प्रसंग में मैं कहना चाहुंगा कि मेरी कमजोरी कहिये या जो कहिये -जिस चीज के पीछे पड जाता हूँ उसे लास्ट में अन्जाम तक पहुचा देता हूँ .अपंनी स्कूली शिक्षा की प्राप्ति के पश्चात हम उच्च सिक्षा अद्ध्यन हेतु वारानासी गए और ललित कला में एडमिसन भी किए . वहीं से मैंने फाइन आर्ट्स में स्नातक की डिग्री हासिल की और मुझे गोल्ड मेडल भी मिला .तत्पश्चात वहीं से पी .जी .भी किया और गोल्डमेडल भी मिला .इस तरह हम ललित कला की तरफ आगे बढ़ते गए .हमारे यहाँ एक कहावत है -निकला था अकेले मन्जिल की ओर  लोग मिलते गए ,कारवां बनता गया .इसी के बदौलत आज मैं इस मुकाम पर हूँ और सीखने का प्रयास कर रहा हूँ .
 ३ समाज के लोग किस प्रकार ललित कला सेद् जुड़े हुयें हैं ?
समाज का प्रत्येक प्राणी कला प्रेमी होता है .जब उसकी दिनचर्या शुरू होती है,तो सुबह से लेकर शाम तक उसके हर कार्य में कलात्मकता परिपूर्ण होती  है .जैसे ,जलपान कैसे किया जाय,कपड़े कैसे पहना जाय ,आदि सभी में कला होती है .कला के वगैर तो मनुष्य पशु के समान है और कला के वगैर कोई व्यक्ति एक पल रह ही नहीं सकता.हर व्यक्ति के अन्दर किसी न किसी कला की अधिकता होती है .हम चित्रकार हैं तो चित्र के माध्यम से कुछ दे रहे हैं .कोई कृषि कार्य करता है तो वो कृषि  के जरिये लोगों को कुछ दे रहा होता है .कोई पर्फोर्मिंग करता  है तो उसके जरिए  वो लोगों को मनोरंजन करा रहा होता है .इस प्रकार हम देखते हैं कि समाज के हर प्राणी इस कला से जुड़े हुए हैं .
  ४ आप अन्तर्राष्ट्रीय आर्ट वर्कशाप में शामिल हुए हैं .काठमान्डू में ललित कला का कैसा स्कौप देखते है ?
देखिए ,काठमांडू में कला का अच्छा बाजार है लेकिन काम अच्छा होना चाहिए विजन भी अच्छा होना चाहिए .हम देख रहे हैं कि जिस इलाके में हम  बैठें हैं उस  इलाके मे हर दस दुकानों के बाद एक अच्छा-खासा आर्ट गैलरी है .इससे मैं अन्दाजा लगा सकता हूँ कि इस पूरे इलाके के लोग आर्ट लवर हैं .इससे मुझे एहसास होता है कि यहाँ आर्ट का बहुत बडा स्काप है .चूंकि यहाँ के लोग खरीदते हैं और आनन्द भी करते हैं .
 ५ अन्त में आप हिमालिनी के जरिये कुछ कहना चाहेंगे ?
सर्वप्रथम ,  मैं हिमालिनी  की पूरी टीम को धन्यवाद देना चाहूंगा और मैं  यह आग्रह करना चाहूंगा कि आपलोग प्रकृति को बचाइये और बचाकर चालिए क्योंकि प्रकृति ही आपकी पहचान है .जब इन्सान की पहचान खत्म हो जाती है ,तो उसका अस्तित्व ही खत्म हो जाता है .इसके साथ साथ प्लास्टिक का कम उपयोग करिये ,इसका दोहन कम करिये ,अपने आसपास के माहौल को हरिआली बनाए रखिए | .
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