कलियुगी हनुमानों का पेट सुरसा की मुँह की तरह खूल तो जाता है पर कुछ भी खिलाने से भरता ही नहीं

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बिम्मी शर्मा, बीरगंज , (व्यग्ँय) | एक हनुमान वह थे जो त्रेता युग में भगवान राम के भक्त के रूप में पैदा हुए थे । जिन्होनें लंका मे आग लगाई और संजीवनी बूटी के लिए पूरा पर्वत ही कंधे पर उठा लाए । पर अब जमाना बदल गया है, यह कलियुग है यहां लाखों हनुमान पैदा हो गए है । त्रेता युग के हनुमानजी की अपनी पूंछ थी कलियुग के हनुमान दल और नेताओं के पूंछ बने हुए हैं । ईसी लिए तो अपने मन पसंद नेताओ के सडे, गले विचारों को सजींवनी पर्वत की तरह उठा कर घुमते है । त्रेता युग के हनुमानजी ने लंका में आग लगाई थी वह कलियुगी हनुमान भी अपने विरोधियों के अखाडे में आग लगाते रहते हैं ।

त्रेता युग के हनुमानजी बातें कम काम ज्यादा करते थे । अभी के हनुमान काम तो करते ही नहीं है बस बाते करते हैं वह भी हवाई किले बनाने जैसा । उस हनुमानजी को फुर्सत ही नहीं होता था ईस हनुमान को फुर्सत हैं इसी लिए दूसरों को नीचा दिखा कर गाली देते हैं और गुस्सा करते हैं । इन्हे इनके मालिको नें यही सिखाया है कि दूसरों को बस पेड़ की तरह उखाडो और पछाड़ दो । इस युग के हनुमान किसी पेड़ के नीचे नहीं चाय की दूकान, शराब की भट्टी और सोशल मीडिया में बहुतायत से पाए जाते हैं । त्रेता युग के हनुमानजी की तरह यह केला और मिठाई नहीं खाते बल्कि दूसरों का दिमाग खाते हैं । इन्हें बस उठापटक करना ही आता है क्योंकि यह लगूंर के वंशज हैं ।

इन कलियुगी हनुमानों को बस अनुमान करना आता है । इसी लिए अपने अनुमानों के आधार पर यह किसी का भी बैंड बजा देते हैं । हमारे देश में यह कलियुगी हनुमान ही अनुमान का मिक्सचर पी कर पत्रकार बन जाते है और दूसरों की दिमागी धुलाई करते हैं । हमारे देश में न्यूज अनलाईन नाम का बहुत सा लंका और अशोक वाटिका है । जहां पर विभिन्न राजनीतिक दल और उनके नेताओं द्धारा पाले, पोसे गए हनुमान दूसरों के लंका यानी अनलाईन को ध्वस्त करने के साथ ही अशोक वाटीका भी जलाते हैं । इन्हे यही सब करने के लिए इनके मालिकों द्धारा पैसा मिलता है । यह त्रेतायुग के हनुमान की तरह जय श्रीराम नही बोलते बल्कि यह जय नेपाल, लाल सलाम या अभिवादन कमरेड कहते हैं ।

कलियुग में हनुमान किसी मदिंर मे नहीं मीडिया के दफ्तर और राजनीतिक पार्टी के कार्यालयों मे मिलते हैं । यहां यह अपने भगवान श्रीराम यानी कि अपने मालिक या नेताओं के आगे पीछे गदहा ले कर नहीं पेन और डायरी ले कर चलते हैं । जहां इन के प्रभु के मुखारबिन्द से कुछ गाली या मुहावरा जैसा शब्द गिरा नहीं कि यह उसको तिल का ताड़ बना कर समाचार लिखते हैं । अपने प्रभु का भजन कीर्तन करने के बदले त्रेतायुग के हनुमानजी की तरह इन्हें भी मोतियों की माला उपहार में मिलती है । उन हनुमानजी ने तो वह मोतियों की कीमती माला दांत से तोड़ कर फेंक दिया था पर यह कलियुगी हनुमान जमीन में गिरे हुए पैसे को भी दांतो से काट कर और जीभ से चाट कर अपने पैकेट में रखते हैं । हाथ तो इन का हमेशा पेन पकड़ने, मोबाईल मे बात करने, लैपटाप में टाईप करते हुए और अपने मालिकों का पैर दवाने में ही व्यस्त रहते हैं । बेचारे कितने मालिक भक्त हैं ?

इन हनुमानों को दूसरे राजनीतिक दल और उनके नेताओं के हनुमानों से आए दिन पंगा होता रहता है । वह भी आमने सामने नहीं किसी पत्रिका, अनलाईन या भर्चुअल वलर्ड यानी कि सोशल मीडिया में यह कुत्ते बिल्ली की तरह झगड्ते रहते हैं । त्रेतायुग के हनुमानजी का अपने पिछवाडे में पूंछ लटका हुआ था । इन कलियुगी हनुमानों का पूंछ आगे दिमाग मे लट्का रहता है । नेकपा एमाले पार्टी के हनुमानों को अपना दल और इस के नेता ही अयोध्या और इसके नेतागण ही भगवान श्रीराम है और बांकी पार्टियों के नेता सब रावण और उनका पार्टी कार्यालय लंका जैसी ।

उसी तरह नेपाली कागे्रंस के हनुमानों को अपनी पार्टी और इस के नेता ही राम, लक्ष्मण और सीता और अपना पार्टी कार्यालय अयोध्या । माओवादी केन्द्र के हनुमान भी अपने रावण जैसे नेता को भगवान श्रीराम और लंका जैसी पार्टी को भी अयोध्या मानने का भ्रम पाल रहे हैं । अभी तक भ्रम की कोई दवा तो बनी नहीं इसी लिए यह खुद भी भ्रम में है और दूसरों को भी भरमाते हैं । पर इन तथाकथित राम, लक्ष्मण और हनुमानों को अपने दल यानी कि अयोध्या के विजय पर शंका है इसी लिए तो अपने घनघोर विरोधियों से तालमेल कर के चुनाव जीतने का षडयंत्र कर रहें हैं ।

कहीं मय दानव और कंश का तालमेल हो रहा है तो कंही रावण और जरासंध का तालमेल हो रहा है । बाघ और बकरी एक ही घाट में पानी पी कर सौहार्दता का प्रपंच कर रहे हैं । और इनके हनुमान अपने प्रभु को सबसे बडा और प्रभावशाली तथा खुद को प्रभु का घोर आज्ञा पालक दिखाने मे कोई कोरकसर नहीं छोड रहें है । यह निर्वाचन इन हनुमानों के लिए सबसे बडी परीक्षा की घडी है । क्यों कि इन्हें मालुम है अगर इनके प्रभु बाली, सुग्रीव की लड़ाईं मे हार गए तो इनको बख्शेगें नहीं । अपनी लंका जैसी अयोध्या को तो यह जलाएगें नहीं पर विभीषण जैसे घर का भेदी हनुमानों को यह अपने तीर कमान से ही मार गिराएगें । क्योंकि इनके पास एक से एक तिकडमी तीर है ।

राम, रावण युद्ध में बंदर, भालू, गिद्ध और कौएं भी शामिल थे । पर निर्वाचन का यह आधुनिक युद्ध में रावण वर्सेज रावण के साथ ही हो रहा है । इसी लिए इनके हनुमानों का स्वभाव भी गीदड़ और लोमड़ी की तरह है । यह तीर कमान नहीं चलाते पर अपने लातों के भूत और गाली से अपने विरोधियों को परास्त करने का कोई भी मौका नही चूकते । इनके मुँह से मुहावरों का आग्नेयास्त्र और आरोपों का ब्रम्हास्त्र निकलता है । त्रेतायुग के हनुमानजी को भूख लगने पर खाने के लिए प्रभु श्रीराम ने फलों का बगीचा ही उनके अधिकार में दे दिया था । ठीक उसी तरह कलियुग के हनुमानों को पालने के लिए हर एक राजनीतिक पार्टी और इनके नेताओं ने पत्रिका, एफएम और अनलाईन का संचालन किया हुआ है । उन हनुमानजी का पेट तुलसी दल में श्रीराम लिख कर देने से ही भर जाता था पर इन कलियुगी हनुमानों का पेट सुरसा की मुँह की तरह बड़ा है जो खूल तो जाता है पर कुछ भी देने या खिलाने से जल्दी भरता नहीं न बंद ही होता है ।

 

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