कलियुग का प्रभाव :रवीन्द्र झा ‘शंकर’

ज्योतिषशास्त्र की मान्यता अनुसार कुल चार युग है– सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलियुग । सृष्टि का आरम्भ सत्ययुग से होता है, जो सत्रह साल अठ्ठाइस हजार वर्ष तक चलता है । पुनः त्रेतायुग का आगमन होता है, जो बारह लाख छियानबे हजार वर्षों तक संचरण करता है । इसके पश्चात द्वापर युग का आगमन होता है, जो आठ लाख चौसठ हजार वर्षों तक चलता है, इसके बाद कलियुग का प्रवेश होता है, जिसकी अवधि चार लाख बत्तीस हजार वर्ष है । चारो युगों का मान तिरालिस लाख बीस हजार वर्ष होता है । इन चार युगों के मानको चतुर्यगों का मान कहा गया है । ऐसे ही जब ये युग एक हजार बार अपना भ्रमण पूर्ण करते हैं, उस समय तक मानवीय गणनानुसार कुल चार अरब बत्तीस करोड़ वर्ष होता है । इसी को एक कल्प कहते है और यही ब्रह्मजी का एक दिन होता है । और इतनी ही रात्रि होती है । अर्थात् ब्रह्माजी का एक ही रात्रि आठ अरब चौसठ करोड़ मानवीय वर्षों के बराबर कहा गया है । इसी को भगवान श्री कृष्ण ने श्री मद्भागवत् गीता में अर्जुन को उपदेश करते हुए कहा है–
सहस्रयुग पर्यन्त महर्यद ब्रह्मणों विदुः ।
रात्रि युगसहस्रान्ता तेऽहोरात्रविदो जनाः ।। गीता (८।१७)
भगवान् श्री कृष्ण कहते हंै, हे अर्जुन ! जो लोग एक हजार युग पर्यन्त ब्रह्मा के दिन को तथा इतनी ही रात्रि को अर्थात् एक हजार युगपर्यन्त जानते हैं, वस्तुतः वे ही अहोरात्रवेता –काल के तत्व को जानने वाले हंै ।
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार जातक के जीवन में ग्रहों की महादशाएँ चलती हैं और उन नवग्रहों की महादशा में प्रत्येक ग्रहों की अन्तर्दशा आती है, पुनः एक ग्रह की अन्तर्दशा में ग्रहों की पर्यन्तदशा चलती है, उस एक ग्रह की अन्तर्दशा में पुनः नौ ग्रहों की सुक्ष्मदशा तथा कई ग्रह की सुक्ष्मदशा में भी नौ ग्रहों की प्राण दशा चला करती है । यह सुक्ष्म विचार कुण्डली में जातक के जीवन सन्दर्भ में ज्योतिविद किया करते हैं । इसी तरह आयुर्वेद में भी ऋतुओं के अनुसार ही रोगादि की उत्पति एवं उनके उपचारों का उल्लेख मिलता है । ६ ऋतु हंै– ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त, शिशिर तथा बसन्त । प्रत्येक ऋतु से छहो ऋतु थोडेÞ समय से परिभ्रमण करती रहती है । आयुर्वेद की मान्यतानुसार प्रत्येक दिन में अर्थात् मनुष्यों के एक अहोरात्र चौबीस घण्टा में प्रत्येक ऋतु चार–चार घण्टे के क्रम में उसी प्रकार व्यतीत होती रहती है । जैसे प्रत्येक दिन में ऋतु, मास, वर्ष आदि के सूक्ष्म अंश दैनिक व्यतीत होते रहते हैं । इसी प्रकार से प्रत्यक युग में चारों युग थोड़ी–थोड़ी अवधि के लिए आते हैं । कलियुग के पश्चात् सत्ययुग का ही आगमन होता है । अतएव कलियुग में भी चारों युगो का अन्तर थोड़े–थोड़े काल पर आता रहेगा । यह प्रकृति का अटल नियम है ।
महाकवि सूरदास जी के अनुसार कलियुग के पाँच हजार वर्ष बीतने के बाद अर्थात् विक्रम संवत् के दो हजार वर्ष व्यतीत होने पर के हजार वर्ष पर्यन्त कलि प्रभाव अपने चरम पर होगा । एक हजार वर्ष में पुराणों इतिहास ग्रन्थों एवं ज्योतिषशास्त्र में वर्णित नाना प्रकार के उपद्रव, अमंगल एवं कलियुग का विभत्स रूप प्रकट होगा, जनता में त्राहि–त्राहि की स्थिति वन जाएगी । इसी अवधि में दिव्य अन्तरक्षि एवं भौमादि उत्पात भी बढ़ जाएँगें । अधर्म की वृद्धि से प्रकृति क्षुब्ध होगी और जनपयोध्वंस होना आरम्भ हो जाएगा । अधर्म की वृद्धि, धर्म की हानि, सर्वत्र आतंक, प्राकृतिक उत्पात, प्रकृति विपर्यय, प्रजा की अतिशयवृद्धि, पृथ्वी की आकुलता, महामारी, भूकम्प, भूस्खलन, ज्वालामुखी विस्फोट, अणुवस्त्रों का प्रयोग, प्रजा में इति का भय, दुर्भिका प्रकोप, संसार के विभिन्न देशों में युद्ध और विश्वयुद्ध की स्थिति बनने से पृथ्वीवासियों का क्षय होने पर स्वलप धर्मात्मा, पुण्यात्मा ही शेष बचे रहेंगे और यह स्थिति लगभग एक हजार वर्षपर्यन्त चलेगी । पुनः पृथ्वी की परिस्थिति में परिवर्तन होगा, कलियुग में ही सत्युग अवान्तर रूप से प्रवृष्ट होगा । हरिकृपा से धर्म की वृद्धि होगी । अपने पुण्य प्रताप से बची हुई प्रजा सुखी हो जाएगी । वातावरण निर्मल होगा । चारोओर सुख, शान्ति एवं समृद्धि छा जाएगी ।

साइबर की दुनिया और आज का बचपन
जिन आँखों में कभी सपने पलते थे, कानों में दादा–दादी, नाना–नानी के किस्से सुनाई देते थे, किस्से भी ऐसे जो नैतिकता और वीरता की गाथाएँ होती थीं । जिनसे एक शुद्ध चरित्र और आत्मा का विकास होता था । परियों और सपनों की दुनिया में खोए बच्चे बड़ों का साथ चाहते थे । उनके साथ खेलना, रूठना, हँसना, गाना भाता था उन्हें, शाम के वक्त गलियों में गिल्ली डंडा खेलते बच्चे आज खुद किसी कहानी की तरह बन गए हैं । इनकी दुनिया सिमट गई है । असीमित सम्भावनाओं से भरी साइबर की दुनिया के जादू ने बाल मन को अपने जाल में उलझा लिया है । आज वह जो चाहता है साइबर उसे परोस देता है । खेल की दुनिया का आरम्भ यों तो कम्पयूटर पर कारें दौड़ा कर की गई थीं, किन्तु आज यह काफी आगे निकल गई है । आज बच्चों की पकड़ में चैट, फेसबुक, व्हाट्सअप जैसी सोशल साइटें हैं । इतना ही नहीं नग्नता और अश्लीलता परोसती पोर्न सामग्री भी आज उनके हाथों में है । आज बच्चे पढ़ने का बहाना कर कमरा बन्द कर रात–रात भर इन्टरनेट से जुड़ गए हैं । चैटिंग, मेल, एस.एम.एस. से जुड़कर उनके हाथों में अब स्मार्टफोन आ गया है । अपनों के साथ बैठना उन्हें अच्छा नहीं लगता । खाना–पीना सब नेट के साथ ही होता है । अपना अधिकतर समय बच्चे नेट पर बिताते हैं । आज हर घर में कम्पयूटर है और इसके पीछे एक वजह बच्चों के स्कूल भी हैं । छोटे छोटे बच्चों को भी कमप्यूटर सिखाने के नाम पर घरों में कम्पयूटर का होना आवश्यक हो गया है ।
विगत वर्षों में सोशल नेटवर्किंग का साइट बहुत तेजी के साथ बढ़ा है । १९९७ में बनी इंटरनेट पर अब दो सौ से ज्यादा साइट्स उपलब्ध हैं । फेसबुक २००४ में लान्च हो गई थी जो आज दुनिया की सबसे बड़ी साइटस बन गई है । आज बच्चे बृहत स्तर पर इससे जुड़े हुए हैं । कार्टुन फिल्म, टी.वी. के रियलिटीज शो ये सभी बच्चों को भाते हैं, उन्हें देखना पसन्द करते हैं । साइबर की यह मनमोहक दुनिया बच्चों को इतनी भा गई है कि अब उनका एक अलग ही ट्रेन्ड बन गया है । इससे जहाँ सोशल साइट्स के वारे न्यारे हो रहे हैं, वहीं बच्चों का मन इसमें उलझकर अपने शारीरिक और मानसिक स्तर का अनजाने ही ह्रास कर रहा है । ई मार्केटर के मुताबिक २०१३ में सोशल नेटवर्किगं साइट को १००० करोड़ का फायदा हुआ है, वहीं मसाब्ले बिजनेश के अनुसार २०११ के पूर्वाद्ध में ही फेसबुक ने ०१ .६ विलियन कमाया और साल के अंत में यह आँकड़ा तीन विलियन तक जा पहुँचा ।
सोशल साइटों के निरंतर सम्पर्क से बच्चे असमय ही बड़े हो रहे हैं । उसने अपने आपको परिवार समाज से काटकर एकाकी बना लिया है । ककेली फोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान के प्रो. की रिपोर्ट के अनुसार, जो बच्चे सोशल नेटवर्कि.ग साइट पर घंटों गुजारते हैं, वे अपने आपको समाज से अलग कर आत्मकेन्द्रित और अहंकारी हो रहे हैं । बच्चा अकेलेपन के कारण भावनाओं को अभिव्यक्त करने से दूर होता चला जा रहा है । यौन इच्छाओं की बढ़ती तीव्रता के कारण उसने अपनी निजता को भी सार्वजनिक कर दिया है । उनकी स्वाभाविक चंचलता चिड़चिड़ाहट में बदल गई है । जिसके कारण डिप्रेशन, एन्जाइटी जैसी मानसिक बीमारियाँ उनके अन्दर पनप रही है । आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के न्यूरो वैज्ञानिक वरांमश ग्रीम फील्ड ने बताया है कि सोशल बेवसाइट बच्चों के मस्तिष्क पर हानिकारक प्रभाव डालती है, जिससे बच्चों की आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ती है जो आज हम देख भी रहे हैं । मानसिक तनाव के कारण उनकी एक्रागता कम हुई है । उनके याद करने की प्रवृत्ति कम हुई है । पहाड़े, गुणा भाग तो अब भूल ही गए हैं ।  एस.एम.एस की शार्ट फार्म लेखन ने भाषा को कमजोर किया है और उनकी लेखन कला को भी प्रभावित किया है । पर्वत्योहार सबसे बच्चे दूर होते जा रहे हैं । महापुरुषों की जीवनी पढ़ने की ललक ही नहीं रह गई है । इसकी वजह से इनमें संस्कारों की कमी होती जा रही है ।
साइबर की दुनिया उपयोगी है इससे इनकार नहीं किया जा सकता है । उसने मानव जीवन को असीमित विकास संभावनाओं से जोड़ा है । इन्टरनेट के माध्यम से वित्तीय व वाणिज्य से लेकर कला, संस्कृति, साहित्य तक को विश्व भर के लोगों को सहजता व सरलता से उपलब्ध कराकर जानकारियों का खजाना लोगों के हाथों में सौंपा गया है । लेकिन इसका नकारात्मक पक्ष इससे भी ज्यादा बड़ा है । जिससे बच्चों को बचाने की मुहिम आवश्यक है । सरकार को भी इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है और साथ ही बच्चों के माता पिता की यह जिम्मेदारी होती है कि वो बच्चों को अकेला ना छोड़े तथा उनके साथ समय व्यतीत करें । बच्चों से हर विषय पर खुलकर बातचीत करें । नेट के लाभ और हानि से बच्चों को परिचित कराएँ । बच्चों में सकारात्मक सोच को बढ़ाएँ । समय की उपयोगिता बताएा । ये बच्चे ही कल का भविष्य हैं । एक स्वस्थ, सजग व सहज, सुयोग्य स्वतन्त्र और सक्रिय समाज के निर्माण के लिए बच्चों को तैयार किया जाना चाहिए और यह तभी सम्भव है जब बच्चों को साइबर की दुनिया की नकारात्मक पहुँच से हम उन्हें सुरक्षित रख पाएँ । –हि.स.

loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz