कलियुग का प्रभाव

rabishankarयन्नामधेयं प्रियमाण आतुरः
पतन् स्खलन् वा विवशो गृणन् पुमान् ।
विमुत्कमार्गल उत्तमां गतिं
प्राप्नोति यक्ष्यन्ति न तं कलौ जनाः ।
श्रीमद्भागवत १२।३।४४
अहो ! कितने शोक की बात है और कितना भारी आर्श्चर्य है कि श्री हरि के सुमधुर नामों का मनुष्य मरते समय, रोग में तडÞफडाते समय, ठोकर लगने से बिल-बिलाते समय अथवा अन्य किसी दुःख से परवश होकर भी उच्चारण कर लें तो संसारी कर्म बन्धनों से छूट कर परम उत्तम गति को प्राप्त हो जाते हैं, उन्हीं जगत के एक मात्रर् इश्वर का पूजन ये कलिकाल के लोग नहीं करते ।
जब हम श्रीमद्भागवत के द्वादश स्कन्ध में वणिर्त कलि के लक्षणों को पढÞते हैं, तब हमारे रोगंटे खडे हो जाते हैं । उन र्सवज्ञ भगवान व्यासदेव के चरणों में श्रद्धा के कारण स्वतः ही हमार सिर झुकने लगता है ।
कलियुग सब युगों से छोटा है । इसकी सम्पर्ूण्ा आयु ४,३२,०० -चार लाख बत्तीस हजार) वर्षकी ही है । इस में अभी केवल पाँच हजार से कुछ ही अधिक वर्षबीते हैं । फिर भी भगवान व्यासदेव द्वारा उल्लेखित कलियुग के वे लक्षण प्रत्यक्ष दिखने लगे हैं । वे भविष्यवाणी करते हैं- कलियुग आने पर चारों ओर दस्युओं का साम्राज्य होगा, वेद पाखण्ड-मार्गों से दूषित हो जाएगा । ब्रहृमचारी केवल नाम के रह जाएंगे । ब्राहृमण पढÞना छोडकर शिश्नोदर-परायण बन जाएंगे और गृहस्थ लोग भीख मांगने लग जाएंगे । व्यापार के लेन-देन में झूठ और धोखे की ही प्रधानता होगी । द्रव्यहीन होने पर नौकर और स्त्रियाँ अपने स्वामियों का परित्याग करके अन्यत्र चली जाएंगी । पुरुष स्त्रियों के पालतू कुत्ते बन जाएंगे । सन्यासी भी द्रव्य इकठ्ठा करंेगे । अपने को वानप्रस्थ कहने वाले मनुष्य गांवों में आकर रहने लगेंगे । फल वाले वृक्ष नष्ट हो जाएँगे । बीस-पचीस वर्षकी औसत आयु ही लोगों की परमायु समझी जाएगी । दूध देने वाले जानवरों में बकरी ही बडÞी समझी जाएगी । ब्राहृमणों का चिहृन केवल यज्ञोपवीत ही रह जाएगा । भूषण, श्रृंगार आदि सभी नष्ट हो जाएंगे ।
एक माता पिता ने अपने पुत्र को घर बेचकर डाक्टर बनाया और बेटा डाक्टर होने पर यू.के. चला गया । वहाँ जा कर एक डाक्टर लडÞकी से उसने शादी की । अब माता पिता भाडेÞ के घर में कष्ट काट रहे हैं और बेटा फोन करने पर कहता हैं कि हमें अभी छुट्टी नहीं है, हम कैसे आएँ । माता पिता कहते हंै कि कम से कम तो एक बार तो मुख दिखला जाओ । लेकिन पुत्र और पुत्रवधू का केवल टेलिफोन आश्वासन ही मिलता है, ऐसे बहुत सारे उदाहरण हमारे समाज में हैं ।
पाठक इन बातों को वर्तमान समय की दशा से मिलाएँ, पाँच हजार वर्षबीतने पर यह दशा है । इन सब बातों को कहने का हमारा तार्त्पर्य केवल इतना ही है कि आज कपट, असत्य, आलस्य, दम्भ, हिंसा, दुःख, शोक, मोह, भय तथा दीनता आदि कलियुगी गुणों की दिन-रात वृद्धि हो रही है ।
इस सम्बन्ध में एक पुराण में बडÞी सुन्दर कथा वणिर्त है- एक बार सब ऋषियों में युगों की श्रेष्ठता पर वादविवाद छिडÞ गया । कोई सत्य युग को, कोई त्रेता को और कोई द्वापर को श्रेष्ठ बतलाने लगे । अन्त में सभी मिल कर भगवान व्यास के पास निर्ण्र्ााकराने गए । व्यासदेव उस समय भागीरथी में गोते लगाते-लगाते जोर से कहते जाते थेे, ‘कलिः साधुः’ -वि.पु ६।२।६।) अर्थात् कलियुग ही श्रेष्ठ है । स्नान के बाद ऋषियों नें उन्हें प्रणाम किया । व्यासदेव ने उनके आगमन का कारण पूछा, तब ऋषियों ने कहा- ‘भगवान् ! आने का कारण तो हम पीछे बताएगें, पहले आप यह बतलाएं कि आपने चारों युगों में कलि को ही श्रेष्ठ क्यों बताया – इस पर हंसते हुए भगवान व्यास कहने लगे-
‘कृते यद् ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः
द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्हरिकर्ीतनात् ।। -१२।३।५२)
‘सत्ययुग में जो सिद्धि ध्यान से, त्रेता में यज्ञों से और द्वापर में पूजा से प्राप्त होती थी, वह कलियुग में केवल केशव-कर्ीतन से ही प्राप्त हो सकती है ।
इतना ही नहीं, सत्ययुग में जो फल हजार वर्षके ध्यान से मिलता था, वह त्रेता में सौ वर्षके तप से मिलने लगा, द्वापर में वही वर्षभर के ध्यान-पूजा पाठ से प्राप्त होने लगा । कलियुग में उतना ही फल केवल एक दिन-रात के हरि कर्ीतन से मिल जाता है । इसलिए दूसरे युगों के सिद्ध पुरुष, जो अनेक युगों से जप-तप करते रहते हैं, कलियुग में मुक्त होने के लिए उत्पन्न होते हैं । इस घोर कलिकाल में जिनकी भगवत्-चरणारविन्दो में प्रीति होती है, उन्हें निश्चय ही मुक्त जीव समझना चाहिए ।
ऐसे एक नहीं, अनेक उदाहरण हैं । पहले गंगाघाट पर ऋषिगण हजारों वर्षकी दीक्षा लेकर यज्ञ याग करते थे । गंगा के दोनों तट वेदों की ऋचाओं से गूँजते रहते थे । वह त्रैलोक्यपावनी गूँज न जाने कहाँ विलीन हो गई । इस गए-बीते जमाने में भी -जिसे आज लगभग डेढÞ सौ वर्षहुए होंगे) बिठूर में नानासाहब -पेशवा बाजिराब द्वितीय) ८४ मन दूध प्रतिदिन जिस गंगा माता को चढÞाते थे । आज उस -दूध) की जगह गंगा जी में कर्साई-खानों का रक्त और कलकारखानों का सडÞा और गन्दा जल तथा गंगा किनारे के शहरों के म्युनिसिपल क्षेत्र में मल-मूत्र बहाया जाता है । यही बात शुकदेव जी ने राजा परीक्षित से कही है-
कलेदोषनिधे राजन्नस्ति ह्येको महान् गुणः ।
कर्ीतनादेज कृष्णस्य मुक्तस· परं व्रजेत् ।।
हे राजन् ! यह कलियुग दोषों की खान है । किंतु इस में एक बडÞा भारी गुण है, वह यह है कि श्रीकृष्ण भगवान का कर्ीतन करते ही मनुष्य समस्त आसक्तियों से मुक्त हो परमात्मा को प्राप्त हो जाता है । इसके अतिरिक्त संसार-सागर से पार हो जाने का कोई दूसरा मार्ग नहीं है ।

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