कविताएं

अपने हाथ में कुछ भी नहीं है
वीरेन्द्र प्रसाद मिश्र
ऐसा सोचते हैं सब कुछ उनके हाथ में है
जब जो चाहे वो मजे में कर सकते हैं
पूरे प्रयास से जब उन्हें नहीं मिलती सफलता
और बनी को बिगडÞते पाकर, बाध्य होते हैं इस सोच पर
आखिर अपने हाथ में कुछ नहीं है ।विश्व विजय हेतु निकला सिकन्दर खाली हाथ लौटा
अपनी मृत्यु पर्ूव उसने यह आदेश था दिया,
रखे जाएँ मेरे दोनों हाथ कोफिन से बाहर
सब देख सकें मैं भी अपने साथ कुछ नहीं ले जा सका
आखिर, अपने हाथ में कुछ भी नहीं है ।

तुम्हारे सुप्रयासों से कुछ होते हैं खुश, कुछ नाराज
तुम्हारे प्रयासों के साथ उनके कर्मों का भी रहता है सहयोग
उनकी असफलता में उनके भाग्य का भी रहता है असहयोग
मानव एक साधन है जिसके प्रभाव की है एक सीमा
आखिर, अपने हाथ में कुछ नहीं है ।

अपनी उपलब्धियों पर घमंड करने वाले
शान्त मन से सोचो इसमें कितने हो तुम भागीदार
जो कुछ तुमने पाया है उसमें है ऊपर वाले का कमाल
जो मिल न सका तुम्हें उसमें नहीं था उसका खयाल
आखिर, अपने हाथ में कुछ नहीं है ।

जो सोचा था वह कभी भी नहीं मिल पाया
जो पाया था उसे सपने में भी नहीं सोचा था
जो अपने थे वे हो गए पराए
जो थे पराए वो शतप्रतिशत हैं अपने
आखिर अपने हाथ में कुछ नहीं है ।

भाग्यवादी अभिव्यक्ति कहें या पलायनवादी
या अपने कर्त्तव्य पथ से विमुख होना
जीवन के इस भूलभुलैया और तर्कवितर्क में
विवश हूँ निर्ण्र्ाालेना नहीं है अपने वश में
आखिर अपने हाथ में कुछ भी नहीं है ।

ए मधिसे केरा कसरी –
कञ्चना झा
जेठ महीने की तपती दोपहर में,
एक पुरानी साइकल और फलों से भरी टोकरी
तकदीर के साथ संर्घष्ा करता, गली गली आवाज देता वह,
केले ले लो , भई केले ले लो ।पर्ूण्ा यौवन पर थे र्सर्ूयदेव, थक गया था वह
बल्खु की तंग गली में, दीवार से साइकल लगाकर
मूंद ली अपनी दोनो आँखे, शायद कोस रहा था किस्मत को
लेकिन अचानक, तोतली बोली में आवाज आयी
ए मधिसे केरा कसरी –

एहसास एक चुभन की,
एहसास अपने ही मिट्टी में पराये होने की ।
फटी पतलून से तम्बाकू निकाल उसने
निगलने का नाकाम कोशिस की, अपमान की इस घूंट की ।

तीन वर्षबीत चुके थे, बारा से काठमान्डु आये,
ऐसा अपमान तो उसकी दैनिकी थी,
र्फक बस इतना, रोज रोज बडÞे बुजर्ुग पूछते
और आज बच्चे ने पूछ दिया, ए मधिसेे केरा कसरी –

हंस दिया वह, बच्चे तोर् इश्वर के रूप हैं,
अबोध हैं, निश्छल हैं वह तो निर्दोष है,
उसे क्या पता मान क्या और अपमान क्या
बच्चा भी कम न था, लय में गाने लगा, ए मधिसेे केरा कसरी –

फिर अचानक, नजर पडÞी बच्चे की माँ पर,
खिडÞकी से झाँकती वह मन्द मन्द मुस्कुरा रही थी,
संकोच नहीँ, कोई लज्जा नहीं,
मानो गर्वित थी, अपने लाल के बहादुरी पर ।

झल्लाया, नहीं , नहीं अब सहन नहीं होता,
अपमान की इस घूंट को पिया नही जाता,
चेहरा लाल हो गया, हाँफते , तमतमाते
जडÞ दिया उसने बच्चे के कनपटी पर जोरदार तमाचा ।

हलचल, पूरे मोहल्ले में हलचल, मचगया कोहराम,
रोने चिल्लाने की आवाज, हडÞबडÞाया, डर गया और भागा वह
और बच्चा बेहोश पडÞा, कान से बहती रक्त की धारा
किर्ंकर्तव्यविमूढ मंै, क्यों विभेद, कैसा संस्कार
कहाँ से आया, ए मधिसे केरा कसरी –

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