कवि अभय की जात्रा

Shweta Deepti

श्वेता दीप्ति

एक बार पुनः कवि अभय कुमार की नई कृति ‘जात्रा’ हमारे समक्ष है । कवि अपनी विशिष्ट शैली में पुनः इस कृति में उपस्थित हुआ है । पर आज इस कृति की समीक्षा करते हुए नेपाल की उस सांस्कृतिक धरोहर का भी स्मरण हो रहा है, जिसके अस्तित्व को प्रकृति की चोट ने मिटा दिया है और जो जाने अन्जाने इस कृति मे वर्णित हुई है । नेपाल की संस्कृति, सम्पदा, परम्परा इन सब को कवि ने अपनी इस नवीन कृति में समेटा है । स्थलगत सम्पदा को काव्य का विषय बनाना कवि की विशेषता है । ‘जात्रा’ में कवि ने नेपाल को देखा है उसे वर्णित किया है, उसकी गहराई को मापा है । कवि मानता है कि कविता कुण्ठा नहीं बल्कि जीवन के नैसर्गिक मान्यता का निरन्तर प्रवाह है । इसलिए इनकी कविता में संवेदना बोलती है । नेपाल के विविध पक्ष को जानने और अनुभूत करने के पश्चात् उन्होंने उसे शब्दों में उतारा है । जो एक नए स्वरूप के साथ हमारे सामने उपस्थित होता है । यहाँ की साँस्कृतिक धरोहर कई बार हमारी निगाहों से गुजरी है, परन्तु ‘जात्रा’ की यात्रा करने के पश्चात् वही एक नए रूप में हमारे सामने आती है ।
‘पशुपतिनाथ’ ‘जात्रा’ की पहली कविता है । कवि की एक मौलिक विशेषता है कि इनकी कविता में बिम्ब स्वयं बोलता है —
“एक समयमाjatra Pustak
बागमतीको किनारमा
दुई सुनौला मृग का रूपमा
हर उषाकालसंगै पार्वतीसँग क्रिडामग्न म ।
अहिले सघन वाीतुमा निर्मित
काठका कलात्मक टुँडालको ओठमा
स्वर्णमण्डित ताम्राको छानो
त्यसमाथि सुनौला गजुर
अनि आकर्षक रजतद्वारहरु
मा बस्छु ।”
प्रस्तुत पंक्तियाँ पशुपतिनाथ की धार्मिक कथा के साथ ही उसकी संरचना को भी व्यक्त करने में सफल हुई हैं । कवि की कविता लम्बी भी है और छोटी भी । किन्तु सभी रोचक हैं । पाटन, भक्तपुर, वसन्तपुर, चाँगुनारायण, स्वयंभूनाथ, लुम्बिनी आदि सभी को कवि ने कविता का विषय बनाया है । इतना ही नहीं यहाँ होने वाले विभिन्न जात्राओं को भी इन्होंने समेटा है जैसे गाई जात्रा, घोडे जात्रा, बिस्किट जात्रा आदि । कवि काठमान्डौ के बाहर की भी यात्रा करता है और चितवन, धुलीखेल, नगरकोट, पोखरा, दामन, मेल्मची, बागमती आदि । इसके साथ ही नेपाल के प्रसिद्ध व्यक्तित्व को भी इन्होंने अपनी अपनी कविता का विषय बनाया है । सच पूछिए तो कवि ने गागर में सागर भरने की काशिश की है और सफल भी हुए हैं ।
उनकी सभी कविताओं पर एक साथ कहा तो नहीं जा सकता परन्तु, बसन्तपुर दरबार जो आज महाभूकम्प की वजह से ध्वस्त हो चुका है आइए उसके लिए जरा कवि की कल्पना पर अपनी नजर डालें—
जहाँ शिवस्वरूप देव काल भैरव
स्वच्छन्द चरचहरु, जीवात
र शैतानहरुसंग, लुकामारी खेल्छन्
जहाँ पे्रमीहरु आकाशसंग आलिंगनबद्ध
रातो झिँगटी छाने प्यागोडामुनि
स्वर्ग जस्तै सिंढीमा छहारी खोज्छन्
जहाँ जीवित देवी कुमारीहरु
आँखा छलेर सुटुक्क
संवेदनशील तान्त्रिक मूर्तिहरुलाई
उत्सुकताले हेर्छन् …..
उक्त पंक्तियाँ एक जीवित तस्वीर खींच देती है हमारी आँखों के सामने । कुमारी देवी के बालसुलभ हरकतों को भी चित्रित कर देती है ।
अँग्रेजी कविताओं को अनूदित करने का दुरुह कार्य श्री किशोर नेपाल जी ने किया है । कविता का अनुवाद सहज नहीं होता । कवि की भावनाओं को ज्यों का त्यों आत्मसात् करना और फिर उसे शब्दों में बाँधना आसान नहीं होता । किशोर जी ने इसके लिए शब्दानुवाद या भावानुवाद का सहारा न लेकर उनकी अभिव्यंजना और भाव को लेकर नेपाली पाठकों तक पहुँचाने की कोशिश की है । अनुवादक स्वंय मानते हैं कि कविता का अनुवाद एक दुरूह विषय है । किन्तु मुझे लगता है कि किशोर जी ने इस दुरूहता में भी सहजता को खोज लिया है जिसकी वजह से संग्रह की कोई भी कविता अनूदित नहीं लगती बल्कि मौलिक लगती है । यह कवि और अनुवादक दोनों के लिए एक सफल प्रयोग है ।
जात्रा निश्चित तौर पर पाठकों के मन की भी यात्रा करने में सफल होगी और उनकी सराहना और शुभकामना अवश्य मिलेगी । कवि भविष्य में भी कविकर्म में रत रहें और साहित्यप्रेमियों के हाथों में उनकी रचनाएँ आती रहें यही अशेष शुभकामनाएँ हैं हमारी ।

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