कवि हृदय बसन्त चौधरी ! बेकल मन की अभिव्यक्ति चाहताें के साए में : डा.श्वेता दीप्ति ( फोटो फीचर सहित)

कवि हृदय बसन्त चौधरी ! जिन्हें जितना मैंने जाना, व्यापारी व्यक्तित्व में एक मासूम दिल, जो जीना चाहता है— अपनी ख्वाहिशों के साथ, अपने अहसासों के साथ और अपने जाने– अन्जाने रिश्तों के साथ ।

काठमांडू, (हिमालिनी २०१८ मई अंक में प्रकाशित पुस्तक समीक्षा ) २७ गते बैशाख में हुये स्रष्टा सम्मान के फोटो के साथ
हो गया मौसम सुहाना चाहतों के साए में
मिल गया दिल को ठिकाना चाहतों के साए में ।
जी हाँ ! हर दिल में चाहत पलती है, कभी किसी के साथ को पाने की, कभी किसी के स्नेह की, तो कभी किसी के इश्क की और इन सबसे बढकर रोटी की, इज्जत की, घर की, मकाँ की । सच कहूँ तो इंसान चाहतों का पुतला ही तो है ।  चाहत न हो तो जीने का कोई मकसद ना रहे, कोई उम्मीद ना रहे, कोई हौसला ना रहे । हम जीते ही हैं अपनों के लिए, उनके सपनों के लिए और बदले में मिली उनकी चाहतों के लिए । कवि हृदय बसन्त चौधरी ! जिन्हें जितना मैंने जाना, व्यापारी व्यक्तित्व में एक मासूम दिल, जो जीना चाहता है— अपनी ख्वाहिशों के साथ, अपने अहसासों के साथ और अपने जाने– अन्जाने रिश्तों के साथ । खुद आपका मानना है कि—
कोई इंसान भी ऐसा नहीं है
जो दिल की राह से गुजरा नहीं ।
आपने खुद माना है कि ‘चाहतों के साए में’ प्रेम के प्रति उनका समर्पण है । आपकी जिन्दगी में प्रेम प्रेरक शक्ति रही है । इस परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट है कि ‘चाहतों के साए में’ सिर्फ प्यार है, प्यार है और बस प्यार है । पूरी की पूरी कायनात इसी प्रेम के इर्द गिर्द घूमती है । प्रकृति के कण–कण में प्यार है, और नारी सृष्टि की सबसे खूबसूरता रचना जो प्रेम की पर्याय है । दिनकर की उर्वशी कहती है—
यह तुम्हारी कल्पना है,प्यार कर लो.
रूपसी नारी प्रकृति का चित्र है सबसे मनोहर. 
ओ गगनचारी ! यहाँ मधुमास छाया है.
भूमि पर उतारो,
कमल, कर्पूर, कुंकुम से,कुटज से 
इस अतुल सौन्दर्य का श्रृंगार कर लो. 
प्रेम जिसकी कोई परिभाषा नहीं है, जो बस एक अहसास है । जो कभी जीने का मकसद देती है तो कभी सब कछ लुटा देने का जज्बा भी ।
 
प्रस्तुत कृति एक पूरा का पूरा आकाश समेटे हुए है,  जिसमें भावनाओं का गुम्फन कभी कविता, कभी गजल, कभी गीत तो कभी नज्म के रूप में अभिव्यक्त होती चली गई है । एक साथ पाठकगण इन सभी विधाओं का रसास्वादन इस कृति पा सकते हैं । इस मायने में यह  निःसन्देह एक अद्भुत कृति है ।
कवि कहते हैं —
कोई भी तभी कवि बनता है
जब प्रकृति में सौन्दर्य खिलता है
जब केवल फूलों की डालियों पर ही नहीं
पत्तों तक में भी कविता खिलती है ।
और इन सबके बीच अगर यौवन हो तो दिल में कविता का जन्म लेना निश्चय ही तय है । फूलों की खुशबू, बारिश की बूँदें, चाँद की चाँदनी, कोयल की कूक या फिर पपीहे की पुकार, आखिर कविता के आलम्बन यही तो बनते हैं कभी मिलन में तो कभी विरह में ।
प्रेम की दुनिया जिसका कोई रूप नहीं, वह तो निराकार है जहाँ दो आत्माएँ एक होती हैं । जहाँ कोई ‘स्व’ नहीं होता, जहाँ मैं और तुम ‘हम’ में एकाकार हो जाता है—
कुछ नहीं बचता, रिक्त हो जाता हूँ 
तुम में ही एकाकार हो जाता हूँ ।
और इसलिए तो कवि कहते हैं कि—
तुम्हें देखने के लिए 
ऐसा नहीं कि तुम्हें देखना होगा ।
जिन्दगी जीने के लिए
ऐसा भी नहीं कि साँसें लेनी होंगी ।
प्रेम करने के लिए
यह भी नहीं कि 
तुम्हें बाँहों में भरना होगा….
मैं प्रेम में नहीं 
कविता में प्रेम लिखता हूँ ।
बहुत ही खूबसूरती के साथ वक्रोक्ति का एक सुन्दर उदाहरण कवि की निम्न पंक्तियों में है—
कीचड़ में कमल है
इसका अर्थ यह नहीं
कि कमल में कीचड़ है,
बल्कि यह है कि 
कमल में कीचड़ का सापेक्ष खिला हुआ है ।
दर्शन की दुनिया से निकल कर कभी–कभी कवि की लेखनी निराशा के बादलों से घिरी नजर आती हैं जब वो अपनी कविता ‘कतरा–कतरा’ में कहते हैं कि—
अँधेरा टपक रहा है कतरा कतरा
मन में रात घर कर रही है कतरा कतरा
जाने उजाला कहाँ है ?
मृत्यु बढ रही है कतरा कतरा ।
ऐसी ही निराशा उनकी कविता ‘जिन्दगी का हिसाब–किताब’ में भी उभर कर आती हैं—
बढ़ता जा रहा है एकाकीपन
डूबता जा रहा है सूरज
कोहरे में घुली हवा लेते–लेते
उफ विरक्त हो रहा है समय ।
मुझे अपनी सुविधा के अनुसार
मेरे भीतर के आकाश का विचरण करने दो ।
जीने के नाम पर दौड़ते–दौड़ते थक कर चूर हो चुका हूँ मैं
सोने से पहले कुछ पल ही सही
जीने की अनुभूति करने दो ।
ऐ गोधुलि मुझे सहजता से साँस लेने दो । 
परन्तु  जल्द ही कवि इस निराशा के भँवर से निकल कर कहता है कि —
हमारे जिन्दा रहने का आकर्षण है प्रेम
जिन्दगी जीने का मकसद है प्रेम ।
बात करुँ गजलों की तो उनकी गजलों के लिए उनके ही शब्द—
तुम पर ऐ जाने जाना जब से नजर पड़ी है
हर फूल हर कली की धड़कन थमी थमी है । 
जी हाँ इनके गजल की हर पंक्तियों की तासीर कुछ ऐसी है । जहाँ दिल थमता भी है, धड़कता भी है और कई बार सरगोशियाँ भी करता है—
ये नशा है, बेखुदी है या तसव्वुर 
जेहन पर छाया हुआ सा इक धुआँ है
आजमा ले दिल है क्या मैं जाँ भी दे दूँ
ये तेरे दिवाने सागर की जबाँ है । 
आपने गजलों की दुनिया में सागर उपनाम रखा है । सागर की सार्थकता देखने को मिलती है क्योंकि दिल की कोई भी भावनाएँ ऐसी नहीं हैं जिसे इस कृति में अभिव्यक्ति न मिली हो । यादें हैं, इंतजार है, चाहत है और इन सबके साथ दिल में एक खलिश भी है—
बेखुदी में क्या कहिए किसको क्या समझ बैठे
इक हसीन पत्थर को हम खुदा समझ बैठे 
इनसे क्या गिला करते सब खता मेरी थी
एक बेवफा को बावफा समझ बैठे । 
नेपाल के हिन्दी साहित्य के इतिहास में प्रस्तुत कृति एक मजबूत कड़ी साबित होगी जो निःसन्देह एक सार्थक मकाम हासिल करेगी । कृति की इन पंक्तियों के साथ इतना ही कि —
जीवन की धूप छाँव से नजरें मिलाए जा
हर गम को, हर खुशी को गले से लगाए जा
क्या होगा कल ये फिक्र न कर, मुस्कुराए जा ।
आपकी लेखनी अनवरत चलती रहे, सागर अपनी लहरों के माध्यम से  साहित्य जगत में अमूल्य मोती बिखरते रहें और हम उनकी व्यक्त भावनाओं के लहरों में डूबते उतराते रहें, उनका आस्वादन करते रहें । साधुवाद और अशेष शुभकामनाएँ । (हिमालिनी २०१८ मई अंक में प्रकाशित पुस्तक समीक्षा )
Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

avatar
  Subscribe  
Notify of
%d bloggers like this: