कहानी :आस्था

रमा पोखरेल
आज मंगलवार का दिन है । सिद्धि विनायक मन्दिर पर दर्शनार्थियों की भीड़ लगी हुई थी । वह मंगलबार को नित्य, सिद्धि विनायक मन्दिर दर्शन करने जाया करती थी । दर्शन के बाद थोड़ी देर भजन कीर्तन पर बैठती । सिद्धि विनायक मन्दिर के सामने एक छोटा सा भवन था । वहाँ नित्य मंगलवार को विनायक भगवान की स्तुति एवं प्रार्थना हुआ करता था । विशेष तरह से करतल ध्वनि के साथ वेद की ऋचाएं गुंजती थी । लोग मन्त्र मुग्ध होकर भक्ति भाव की गंगा मे बहाते हुए दूर चले जाते थे । कोइ सुध न रहती । देर से जब आँखें खुलती, वहाँ से उठने को मन नहीं करता था, फिर भी समय की पावन्दी का भी खयाल करना था, इसलिए वह शाम को देर से घर लौटती थी ! उसकी यह क्रिया सालों से निरन्तर चली आ रही थी ।
लेकिन अब समय करबट ले चुका था । वह जीवन की उत्तरार्ध बेला मे पहुँच चुकी थी । शायद वह बीता हुआ कल जीवन का प्रातःकाल था वह अतीत को पलट कर देखने की कोशिश करती । अत्यन्त व्यस्त जीवन के बावजूद भी वह सिद्धि विनायक का दर्शन एवं पूजा तथा भजन कीर्तन के लिए समय निकाल लेती थी, उसकी आस्था प्रवल थी । वह जिन संस्कारों में पली बढ़ी थी, उसे यही पाठ पढ़ाया गया था कि अपने पास जितना समय है, उसमें से थोड़ा समय ईश्वर भक्ति के लिए निकाल लेना चाहिए ।
मन्दिर जाने का मार्ग नदी से होकर जाता था । बरसात होने के कारण पानी काफी उपर तक आ गया था । नदी पार करते–करते कपडेÞ भीग जाते थे । फिर भी, उसका लगाव, उसका संस्कारी स्वभाव, उसका दृढ़ विश्वास उसे यहाँ खींच लाता था ।
नदी का पुल टूटा हुआ था, लोग नदी पार करके ही आया जाया करते थे । मन्दिर जाने का दूसरा कोई रास्ता नहीं था । कई बार लोगों को पानी में साँप काट लेता था । जान हथेली पर रखकर उस भयावह मार्ग से जाना आना पड़ता था ।
जब से वह इस जगह पर रहने आइ थी, उसने उस पुल को ऐसे ही रूप मे अर्थात् टूटे हुए हालत में ही देखा था । बाद में उस पुल का पुनर्निर्माण हुआ । एक मित्र राष्ट ने आर्थिक सहयोग करके उस पुल को बनवाया । अब लोगों को सिद्धि विनायक के दर्शन में सहजता मिल गई है ।
लेकिन कालान्तर में उस पुल का नाम टूटा पुल ही रह गया । लोग उसे टूटा पुल के नाम से ही जानने लगे । एक बार जब वह कार्यालय के काम को निपटा कर घर आई, बच्चे भी स्कुल से आ चुके थे, उन्हे नास्ता कराया, रात का डिनर तयार किया, उसके बाद सिद्धि विनायक के दर्शन के लिए तैयार हुई, क्योंकि उस दिन मंगलवार था वह मन्दिर जाने के लिए घर से निकली, बेहद थकान के कारण वह रास्ते पर चल नही पा रही थी ! उसने एक सवारी रोकी और टूटे पुल की तरफ जाने को बोला, क्योंकि मन्दिर का मार्ग उधर से ही जाता था । वहाँ पहुँच कर जब सवारी रुकी तो चालक ने हँसते हुए कहा, मैडम आप तो कह रही थी टूटा पुल जाना है, लेकिन यह तो बिल्कुल नया पुल है । यह सुन कर उसे भी हँसी आई और उसने उस पुल का विगत उसे सुना डाला ।
आज भी वह थकी हारी दिख रही थी । क्याेंकि आज भी उसका व्रत था मंगलबार का । उसे नियम का पालन करना था, इसलिए उसने सुबह से दूध और चाय के अलावा कुछ नहीं खाया था । वह मन्दिर से आने के बाद ही रात को देर से भोजन करती ।
वह सोच रही थी आज कैसे जाएगी मन्दिर ? उसमे तो थोड़ी सी भी शक्ति नहीं थी ! ऐसे में उसे आवाज सुनाई दी, भई नास्ता तैयार है ? बड़ी जोर की भूख लगी है । उसके पतिदेव आफिस से आ पहुँचे थे । उसने नास्ता का प्लेट ले जा कर पतिदेव को थमाया ।
किवाड़ खट खटाने की आवाज आई, अंदर कोई है ? उसने कौन है ? कहते हुए किवाड़ खोला, कुछ गेस्ट दूर से आए थे और रात को रुकने वाले थे । अब तो वह चिन्ता मे पड़ गई, वह कैसे मन्दिर जाए ? अब तो उसका नियम भंग हो जाएगा ।
पर गेस्ट सहयोगी थे, उन्होंने कहा आप अपना नियम मत तोड़ो, तैयार होकर मन्दिर मे दर्शन एवं पूजा कर आओ, उसके बाद हम सब मिल कर रात का भोजन तैयार करेंगे ।

उसे तसल्ली हुई,
सब अपने थे, कितने प्यारे थे । वह खुशी खुशी मन्दिर जा कर आई ।
उसने मन्दिर से लौटकर सब के लिए रात का भोजन तैयार किया, पहले प्रसाद बाटा, लोगों ने सिद्धि विनायक का प्रसाद ग्रहण किया और आराम से प्रसन्न मुद्रा मे बैठ कर उसके हाथों का बना हुआ स्वादिष्ट भोजन, हँसते बातें करते, खुशी खुशी माहौल में ग्रहण किया । उसके स्वागत सत्कार से गेस्ट अत्यन्त प्रभावित हुए, दुसरे दिन काली भगवती माँ का दर्शन करते हुए वे पैदल ही दूर देश अपने गन्तव्य को रवाना हुए !
बाहर बारीश हो रही थी । आकाश को बादलों ने घेर रखा था । बिजली चमक रही थी, बादल गरज रहे थे । कभी बादलों की गड़गड़ाहट तो कभी बिजली के कड़कने की आवाज से धरती कम्पायमान हो रही थी, ऐसे में वह मन्दिर कैसे जाए ? शायद आज उसका परीक्षा का दिन था, सिद्धि विनायक शायद आज उसकी परीक्षा ले रहे थे ।
जब से उसने व्रत रखना आरम्भ किया था, आज तक अपना नियम कभी नहीं तोड़ा था । आँधी आए या तुफान, वह आंधी मे गिरते हुए तुफान से लड़ते हुए भी सिद्धि विनायक के दर्शन के लिए मन्दिर जाती, लेंकिन आज वह निराश होने लगी थी । शायद आज वह मन्दिर नहीं जा पाएगी, जाए तो ऐसी बारिश में कैसे, नहीं जाए तो उसकी आस्था का क्या होगा ?
वह असमंजस में थी, उसके मन में द्वन्द्ध चल रहा था । वह सोंच रही थी काश ! यह बारिश रुक जाती ! फिर उसे एक खयाल आया, क्यों न वो तैयार होकर बैठे, कपड़े बदले पूजा का सामान ठीक कर ले, तब तक हो सकता है बारिश भी रुक जाए । फिर वह मन ही मन कहने लगी, हमें मन्दिर तो जाना ही होगा, क्योंकि सिद्धि विनायक राह देख रहे होंगे, कब मेरी भक्तिन आएगी और हमे लड्डु खिलाएगी । वो तो कहीं जाते नहीं हैं ।
एक जगह बैठे रहते हंै, लम्बी सूँड़ और बड़ा सा पेट लेकर ।
प्रसंगवश उसे बचपन मे सुनी हुई एक कहानी याद आई, एक किसान दिन भर खेत में काम करने के बाद प्रत्येक मंगलवार को लड्डु ले कर सिद्धि विनायक मन्दिर जाया करता था, पुल टूटा होने के कारण नदी में भीगते हुए जाना पड़ता, बारिश होने के कारण पानी उपर तक आया हुवा था । नदी को पार कर पाना बहुत मुश्किल नजर आ रहा था । वह किसान सोच में पड़ गया । जाएँ तो कैसे ? नदी का पानी तो शायद उसको बहा ही ले जाएगा । नही जाए, तो भी भगवान राह देख रहे होंगे, कब आएगा, किसान, लड्डु लायेगा, हमें खिलायेगा ।
चाहे जो भी हो, उसने हिम्मत बाँधी और मन्दिर जाने का निश्चय किया, कपड़े उतार कर प्लास्टिक बैग में पैक किया, और तैर कर मंदिर पार किया ।
नदी के उस पार पहुँच कर उसने कपड़े पहने, मन्दिर के नजदीक एक मिठाई की दुकान थी, उसने पाँच मोतीचुर का लड्डु खरीदा और सिद्धि विनायक को भोग लगाया । वह गुस्से से पागल हो रहा था, भोग लगाते हुए वह अपना गुस्सा भी निकाल रहा था, लो गणेश खा लो, मीठा लड्डु लाया हूँ, तुम्हारे लिए, तुम्हें तो कितना आनन्द है एक जगह बैठे रहते हो, लो खाओ लड्डु . कहते हुए उस किसान ने सिद्धि विनायक की मुँह में लड्डु ठूँस दिया, उन्हें भी गुस्सा आया, उन्हाेंने भी मुँह से लड्डु निकाल कर किसान के मुँह में ठूँसते हुए कहा तुम्हीं खाओ, किसान जब घर पहुँचा तो अपनी छोटी सी झोपड़ी की जगह महल देखकर चकित रह गया । सिद्धि विनायक ने उसे प्रसाद के रूप में आलिशान महल दे दिया था ।
उसने सोचा शायद ऐसा ही कोई प्रसाद शायद उसे भी मिल जाय । बारिश अभी भी रुकी नहीं थी, उसने मन्दिर जाने का निश्चय कर लिया, पूजा की सामग्री ठीक किया, दुर्बा, पूmल धूप दीप नैवेद्य सब एक डालिया मे सजा कर रखा लाल साड़ी पहनी, बच्चों को स्कुल की किताब पढ़ते रहने को बोल कर और पति देव को घर जल्दी आने को बोल कर वह मन ही मन सिद्धि बिनायक की चरण में नतमस्तक होती हुई मन्दिर जा पहुँची ।
किसान की तरह उसका कोई महल तो नहीं बना, लेकिन जीवन में कुछ ऐसी घटनायें घटी जो कम चमत्कारी नहीं थी ।
उन दिनों वह किसी सरकारी कार्यालय में नौकरी किया करती थी । बहुत से सरकारी सेवकों को बर्खास्त किया गया, एक उसी की नौकरी बच गई ।
यह तो बहुत ही आश्चर्य की बात हुई ।
लोग दाँतो तले उँगली दबाने लगे, अरे ! ऐसा भी कभी हो सकता है क्या ? एक उसी की नौकरी कैसे बच गई ? तरह तरह की बातें करने लगे । रास्ते, बस स्टाप, कार्यालय, सभी जगह उसी की चर्चा होती थी । इष्र्या करनेवालों की भी कमी नहीं थी ।
लोग क्या जाने, यह तो उसकी तपस्या का परिणाम था । किसी की खुशामद व सलामत से उसे नसीब नहीं हुआ था ।यह सिद्धि विनायक की कृपा से उसे मिला था ।
कुछ दिनों बाद जिन जिन की नौकरियां गई थीं, उन सब की वापसी हुई । उसकी सामीप्यता से उन सबको उसकी अथक परिश्रम का कुछ देर ही सही मीठा फल मिला ।
हुआ यह था कि, एक निर्णय किया गया था, जिसका कार्यान्वयन करना जरुरी था और उसकी व्यक्तिगत फाइल जो थी, उसे चूहे ने वहाँ पर से हटाकर दूसरी जगह ले जा कर रख दिया था, अफसर को उसकी फाइल नहीं मिली और उसकी नौकरी बच गई । यह तो सिद्धि विनायक की कृपा के बिना सम्भव ही नहीं था ।

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