कहानी उकास

सनत रेग्मी  :ज्ञानी महतो की हमेशा की आदत है सुबह-सुबह नदी के कछार के साथ-साथ दूर तक टहलना । यह उसकी प्रतिदिन की दिनचर्या में शामिल है । सुबह उठना और लाल गमछे को कस कर माथे पर बाँधना, नीम के पेडÞ से दातून के लिए पतली सी टहनी को तोडÞना और उसे चबाते हुए नदी के किनारे-किनारे करीब तीन किलोमीटर तक चल कर दूर निकल जाना । चलते ही चलते दातून करता और जब चलना खत्म तो दातून करना भी खत्म । फिर नदी के पानी से कुल्ला करके, अपने बदन का कपडÞा उतार कर सर पर बँधे लाल गमछे को खोल कर, कमर पर लपेटता और जय राप्ती मैया कहते हुए नदी में छलांग लगा देता ।
स्नान के बाद पूरब की ओर मुख करके र्सर्ूयनारायण का दर्शन करता और भीगे वस्त्रों में ही अँजुरी में पानी भरकर र्सर्ूय को अर्ध्य देता । पूरब की ओर नदी की मिट्टी से उर्वरा हर्ुइ धरती पर बेशर्मा -कास या झौवा) की झाडÞी फैली हर्ुइ थी, जिसने अच्छे खासे जंगल का रूप ले लिया था । थोडÞा-थोडÞा बालू का कछार और मिट्टी में फैला बेशर्मा का जंगल ।
पिछले दो तीन वर्षों में राप्ती नदी पूरब की ओर की जमीन छोडÞकर पश्चिम की तरफ आती जा रही थी । नदी की उर्वरा मिट्टी की वजह से अब वो जमीन बाँझ नहीं थी । उसमें अब बेशर्मा का जंगल फैल गया था । ज्ञानी महतो दूर तक फैले उस जंगल को देखता । लगभग तीन चार बीघा में वो जंगल फैला हुआ था । अगर इस जंगल को काटकर इसमें खेती होती तो – या फिर थोडÞा चना और मसूर छिडÞक दिया जाता तो कितना अनाज हो जाता । या नहीं भी होता तो गाँव वालों को खेती योग्य थोडÞी जमीन तो मिल ही जाती । हर वर्षबाढÞ की वजह से जमीन कट रही है । अगर इस जमीन को ही आबाद करने को मिल जाता तो गाँव वालों को थोडÞी राहत तो मिल ही जाती । ये जगह भी अहीर टोली के पीछे है । नदी पार जाते ही अपनी खेती होती । ज्ञानी महतो मन ही मन तय करता है कि इस जंगल को काट कर अहीर टोली में जिनके पास जमीन नहीं है उन्हें देकर उनका कल्याण करना पडÞेगा ।
ज्ञानी घर आते ही मुलायम दर्जी के यहाँ पहुँचता है । मुलायम दर्जी अपने घर के आगे खडÞा होकर बकरे के मेंढ को ध्यान से देखकर कुछ सोच रहा था । तभी उसकी नजर ज्ञानी महतो पर पडÞी, जो उसी के घर की ओर आ रहा था ।
वह वहीं पास में खडÞी खाट को आँगन में बिछाकर महतो के स्वागत के लिए तैयार हो गया ।
मुलायम के आग्रह पर ज्ञानी खाट पर बैठ गया । दूसरे कोने पर मुलायम भी बैठता हुआ बोला, “कहिए महतो भाई क्या सेवा करें आपकी -”
मुलायम से सकारात्मक सोच पाकर ज्ञानी खुश होकर अपने घर लौट गया । उसकी चार बीघा जमीन इसी गाँव में थी पर पिछले साल नदी के कटान में पूरी जमीन नदी में समा गई । कभी अपनी जमीन का मालिक महतो आज ठाकुर रणवीर के खेत में बटेदारी पर काम कर रहा है । दो भैंस हैं उसके पास जिसका दूध बेचकर रोज का खर्च किसी तरह निकाल लेता है । पर घर खर्च में हमेशा तानातानी लगी रहती है । आज उसकी स्थिति जैसी भी हो पर राणाकाल में उसकी भी गिनती बडÞे लोगों में हुआ करती थी । वह अहीर जाति का महतो था । सब समय का फेर है । सारी शान-शौकत खत्म हो गई । पहले का महतो आज सिंगार के सामान के जैसा हो गया है । नदी के प्रकोप में महतो की पदवी के अलावा सब बह गया । महतो यानि अपनी जाति का प्रमुख पर आज तो इस पदवी की शान को बचाना मुश्किल हो गया है । उसके घर काम करने वाला लच्छी आज ज्यादा सुखी हो गया है । २००७ की क्रान्ति में लच्छी ने उसे भी शामिल होने के लिए कहा था । किन्तु राणा के द्वारा दिए गए इसी पदवी ने उसे रोक दिया था । लच्छी उसी समय से गाँव का नेता बन गया । पन्द्रह साल की क्रान्ति में भी वह सक्रिय था । जिला में उसकी अच्छी इज्जत और प्रतिष्ठा थी । २०१७ साल में वह और मुलायम दर्जी एकबार फिर ठाकुर रणवीर सिंह, गंगाराम पटवारी और मुखिया हरभजन सिंह का दबदबा हो गया । वही लोग प्रधान बने, ज्ञानी महतो अपनी जाति का मुखिया होते हुए भी उनकी हाथों का खिलौना था । वह उनका हथियार था जिसे कभी रणवीर तो कभी पटवारी तो कभी मुखिया हरभजन सिंह अपने फायदे के लिए प्रयोग करते थे ।
किन्तु जो भी हो लच्छी उनका बहुत आदर करता था । जाति का महतो और उस पर भी वह र्सवहारा हो गया था । उसके राजनीतिक कार्यक्षेत्र में कोई भी मुश्किल आती तो वह ज्ञानी महतो के ही शरण में आता था । ज्ञानी महतो को आज भी गाँव वाले महतो के ही रूप में स्थान देते थे । उसके लिए अहीरों की भीडÞ उसकी एक आवाज पर कुछ करने के लिए तैयार हो जाती थी । लच्छी और मुलायम सही मायने में वहाँ के जनप्रतिनिधि थे । जनता तो उन पर विश्वास करती थी पर जिला के नेताओं का विश्वास उन पर से उठ गया था ।
ज्ञानी और मुलायम के सहयोग और क्रांतिकारी भाषण के बावजूद लच्छी गाँव का प्रधान पद नहीं जीत पाया था क्योंकि उसके पास जनबल तो था परन्तु धनबल नहीं था । अभी भी गाँव के नेता रणवीर सिंह, गंगाराम पटवारी और हरभजन सिंह ही थे ।र्
कई बार ऐसा भी हुआ कि प्रतिपक्षियों ने लच्छी और मुलायम को अपनी पार्टर्ीीें आने का न्योता दिया और टिकट देने का लोभ भी दिया पर ये लोग अपने सिद्धान्तों से नहीं हटे । गंगाराम पटवारी दो बार प्रतिपक्षी पार्टर्ीीें गया लेकिन टिकट नहीं मिलने पर फिर अपनी ही पार्टर्ीीें लौट गया ।
ज्ञानी अभी भी ठाकुर रणवीर सिंह के बटेदार के ही रूप में ही काम कर रहा था । कई बार गंगाराम पटवारी ने ज्ञानी को लालच दिया कि मैं तुम्हें जमीन दूँगा तुम मुझे जीताओ मैं कम्यूनिष्ट पार्टर्ीीे लडÞूँगा । परन्तु उसने कभी गद्दारी नहीं की उसके लिए ठाकुर ही सब कुछ थे ।
अहीरों की टोली ज्ञानी के आँगन में जमा हर्ुइ । मुलायम दर्जी, लच्छी अहीर, हसनु धोबी के अलावा दो चार व्यक्ति कोइरी, चमार, धोबी आदि थे ।
मुलायम दर्जी ने सबको सम्बोधित करते हुए कहा, “देखो, राप्ती मैया ने हम पर कृपा की है, नदी के उस पार लगभग पाँच बीघा जमीन निकली है । हममें से जिनके पास जमीन नहीं है उन सबको दस-दस कट्ठा जमीन मिलेगी । अगर तुम सब सहमत हो तो वहाँ के जंगल को साफ करने में हमारी मदद करो तो कल से ही काम शुरु हो जाएगा ।” जमीन बनाना इतना आसान तो था नहीं । काम मुश्किल था फिर भी गाँववाले ने दिन रात मेहनत करके जमीन साफ किया । मिट्टी तैयार हर्ुइ । सबको जमीन बाँटी गई । मेहनत ने अपना रंग दिखाया कुछ ही दिन में जमीन पर फसल लहलहाने लगी ।
ज्ञानी महतो, मुलायम दर्जी और लच्छी अहीर की तारीफ होने लगी । पर उस लहलहाते फसल को देखकर पटवारी, ठाकुर और हरभजन सिंह के तीनों नेत्र जल उठे । उन लोगों ने जमीन पर अपने अधिकार की बात की और फसल पर आधे हिस्से की दावेदारी करने लगे ।
गाँववाले अपनी मेहनत और जमीन जाने की बात सुनकर आक्रोशित हो उठे । अहीरों की बस्ती में तनाव बढÞ गया । किसान मरने मारने पर उतारु हो गए । ठाकुर और पटवारी जाली कागज बनवाने लगे । नदी से बनी उस धरती ने आक्रोश का वातावरण तैयार कर दिया । गाँव विकास का अध्यक्ष ठाकुर रणवीर सिंह था इसलिए वहाँ न्याय मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी इसलिए गाँववाले न्याय माँगने जिला आफिस गए । वहाँ जाकर अपनी बात कही । एक ओर ठाकुर रणवीर सिंह, पटवारी और हरभजन सिंह जैसे रसूख वाले व्यक्ति और दूसरी ओर सात साल से पार्टर्ीीे लिए त्याग, तपस्या जेल भोगे हुए त्यागी नेता मुलायम बाबा और लच्छी अहीर जैसे व्यक्ति ।
पार्टर्ीीेता असमंजस में थे । इसलिए उन्होंने तटस्थ रहना ही सही समझा । उनकी तटस्थता देख कर प्रशासन भी तय नहीं कर पा रहा था कि क्या किया जाय । सत्तासीन पार्टर्ीीे कलह को देखकर प्रतिपक्ष खुश हो रहे थे । वे उन्हें भडÞकाने का ही काम कर रहे थे । अंततः विवाद बढÞता ही चला गया । उपज काटने का समय गुजरता जा रहा था आखिर एक दिन वह धरती कुरुक्षेत्र का मैदान बन गया । उपज के बीच गाँववाले हँसिया, डोरी लेकर फसल काटने के लिए तैयार थे तो दूसरी तरफ फसल नहीं काटने देने के लिए बन्दूक लेकर ठाकुर खडÞे थे । मुलायम बाबा और ज्ञानी महतो के हाथों में लाठी थी, लच्छी अहीर के हाथ में बन्दूक ।
गाँववाले फसल काटने के लिए तैयार हो गए । ठाकुरों ने उन्हें रुकने का आदेश दिया, फिर भी किसान खेत में घुसने का प्रयास करने लगे । ठाकुरों ने हवाई फायर शुरु कर दिया । जिससे उनमें दहशत फैल गई । वे सभी रुक गए ।
मुलायम बाबा सोचने लगे । आज के जनतांन्त्रिक युग में भी इन्हीं सामन्तों की हुकूमत है । कल भी इनकी चलती थी, इनका शासन था आज भी ये शोषक हैं । अतीत का मालिक, कल का शासक और आज का नेता, जब भी इन्हीं की अगुवाई, इन्हीं की हुकूमत, हम हमेशा इनके शोषण का शिकार बनते रहे । हमेशा इनसे सघर्ंष्ा करते रहे । यही जीतते रहे और हम हारते रहे । जब तक इनकी समाप्ति नहीं होगी तब तक हमारा उदय नहीं होगा । जब तक ऐसा नहीं होगा जनता अपने स्वाभिमान की रक्षा नहीं कर पाएगी और न ही अपने अधिकारों का उपयोग कर पाएगी । मुलायम बाबा आक्रोशित होकर लच्छी अहीर के हाथों से बन्दूक छीन कर उत्तेजना में चलाते हैं- पडÞाक…. पडÞाक…. ।
ठाकुर रणवीर सिंह, पटवारी और हरभजन सिंह तीनों अपनी छाती हाथों से दबाए वहीं खून से लथपथ होकर गिर गए । वहाँ खून ही खून फैल गया । खेत की जमीन खून से लाल हो गई ।
एक घन्टे के भीतर वहाँ पुलिस आ गई । मुलायम, लच्छी और ज्ञानी पकडÞे गए । तीन लाश वहाँ से उठी । मुलायम बाबा को सनकी, पागल और हत्यारा घोषित कर दिया गया । उस जमीन का फैसला नहीं हो पाया । आखिर वो धरती किसकी थी – ठाकुर, पटवारी या हरभजन के सन्तान की या फिर मेहनत करके उपज पैदा करने वाले किसानों की – युग और समय आज भी इसका निर्ण्र्ाानहीं कर पाया है ।

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