कहानी भूत के तलाश में निकले युवक की …

नेपाल सदभावना पार्टी के संस्थापक गजेन्द्र नारायण सिंह ने उनके निधन पर श्रद्धाजंली देते हुए कहा था –गणेशमानजी जात जाति, भाषा, सम्प्रदाय, वर्ग और समुदाय से ऊपर थे । बाद में तो वह पार्टी से भी ऊपर हो गए ।

प्रकाशप्रसाद उपाध्याय:यह कहानी, कहानी क्या एक सत्य कथा है, एक युवक की, जिसे भूत की तलाश में निकलने पर देश के दुर्गम जिले,

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लौह पुरुष गणेशमान सिंह

पहाडी इलाके, वीहड जंगल और ऊफनती नदियों को पार करते हुए जाना पड़ता है दूसरे देश में, और अपनी क्रांतिकारी कारनामों से कालांतर में कहलाता है लौह पुरुष । शायद अब तक कई पाठक, विशेषतः प्रौढावस्था के पाठकगण समझ गए होंगे किस युवक की चर्चा हो रही है, जिसे दश की राजनीति के शिखर पुरुष की भी संज्ञा मिल गई है ।

अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने १८डिसेम्बर सन् १९९०में ह्वाईट हाउस में उनका स्वागत किया । संयुक्त राष्ट्र«« संघ के द्वारा पाँच वर्ष में एक बार दिया जाने वाला ह्यूमन राइट्स एवार्ड से उन्हें सम्मानित किया गया और संयुक्त राष्ट्र संघ के पूर्व महासचिव उ थाँट की स्मृति में स्थापित उ थाँट पीस एवार्ड १९९१से विभूषित किया गया । वह दक्षिण एशिया के पहले ऐसे व्यक्तित्व थे जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ से मानव अधिकार पुरष्कार से सम्मानित किया गया था
देश राणा शासकों के क्रुरतापूर्ण चंगुल में जकड़ा हुआ था । विक्रम संवत १९९३ साल के बाद कुछ युवक देश को उनके चंगुल से मुक्त कराने में भूमिगत रूप से संलग्न हो रहे थे । इस युवक की नजर जब ‘भूत का मंत्र जपकर देवता का दर्शन नही पा सकते’ लिखी परचे पर पड़ी तब उसे लगा कि ऐसा कौन सा भूत है जिसे कुछ लोग देवता का दर्शन पाने हेतु जपा करते हैं । अतः वह भूत की तलाश की धुन में घूमते घूमते पहुँचा एक ऐसे कमरे में जहाँ से शुरु हो गई उसके जीवन में उथलपुथल की घटनाएँ ।
घर में प्यार से हीराकाजी के नाम से संबोधित होने वाले यह युवक अपने इस अभियान के कारण गणेशमान सिंह के नाम से देश विदेश में प्रसिद्ध हुए लेकिन उनके साहसिक राजनीतिक कारनामों ने उन्हें पहुँचा दी जेल की कालकोठरी तक । पर अदम्य साहस के धनी और देश को राणा शासकों के चंगुल से मुक्त कराने का दृढसंकल्प लेने वाले इस युवक के सामने जेल की २४–२५फीट उँची दीवार भी उस वक्त छोटी हो गई जब वह उसे योजनावद्ध ढंग से लाँघते हुए पहुँच गए दूसरी ओर, जहाँ न तो आमावस की काली रात और न ही राह के भौंकते कुत्ते उनके स्वतंत्रता के मार्ग में वाधक हो सके । वह अपनी धुन में तब तक भूखे प्यासे पैदल चलते रहे जब तक वह अपने देश के क्रुर शासकों के सुरक्षा सैनिकों के द्वारा पकडे जाने के भय से मुक्त नहीं हुए । स्वतंत्रता की वह सुरक्षा कवच उन्हें मिली भारतीय क्षेत्र नौतनवा नगर में जहाँ से उनकी नई यात्रा हुुई रेल मार्ग से ।

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लौह पुरुष गणेशमान सिंह

नौतनवा से गोरखपुर और वहाँ से कलकत्ता । शादी के चार महीने के बाद ही शुरु हुई लगभग चार वर्ष की जेल यात्रा ने जहाँ इनकी पत्नी के दाम्पत्य जीवन में सूनापन उत्पन्न किया वहीं इस रेल यात्रा ने उन्हें निर्वासित जीवन बिताने को वाध्य किया । लेकिन अपने देश की जनता की मुक्ति के लिए जीवन न्योछावर करने वाले इस साहसी युवक के सामने घर का राजसी और दाम्पत्य जीवन के सुख को बलि चढाना एक सामान्य बात थी । अतः कभी कलकत्ता तो कभी बनारस आया जाया करते थे जिससे कि वह उपयुक्त व्यक्ति से मिलकर देश को राणा शासकों के चंगुल से मुक्त करा सके ।
कलकत्ता में उन दिनों राणा शासकों के गुप्तचरों की जाल बिछी हुई थी । अतः वह वहाँ छद्म नाम धारण करते हुए रहने लगे । कुछ महीनों की प्रतीक्षा और दौडधूप के बाद उनके राजनीतिक मार्ग को उस वक्त एक दिशा मिल ही गई जब उनकी मुलाकात वी.पी. कोइराला से हुई और वह गणेशमान सिंह के नाम से वाह्य जगत में भी सुविदित होने लगे । कोइराला भी नेपाल में प्रजातंत्र की हवा का संचार करने के लिए गणेशमान जैसे त्यागी, साहसी और पराक्रमी व्यक्ति की तलाश में थे । इन दोनों की मुलाकात ने एक राजनीतिक पार्टी की स्थापना के मार्ग को प्रशस्त किया । उनके साथ कंधे से कंधे मिलाते हुए पार्टी को शक्ति और गतिशील बनाने में प्रमुख भूमिका खेलते हुए सुवर्ण शमशेर आगे बढे, जो राणाओं की वर्गीकरण की नीति से आहत होकर कलकत्ता में रह रहे थे । इन सबों के प्रयास से एक पार्टी की स्थापना की गई और नाम रखा गया नेपाली काँग्रेस ।
देश को राणा शासकों के चंगुल से मुक्त कराने और प्रजातंत्र की स्थापना करने में नेपाली काँग्रेस की अहम् भूमिका रही । लेकिन जब राजा महेन्द्र ने प्रजातंत्र का गला घोटने का काम किया तो नेपाली काँग्रेस फिर से संघर्ष पथ पर अग्रसर हुई । राजा महेन्द्र के शासन काल में जेल की सजा काट रहे वी.पी. कोइराला और गणेशमान सिंह के अतिरिक्त कई नेता जेल से रिहा हुए तो उन्होंने निर्वासन पर जाने को ही उपयुक्त माना ।
९ वर्ष के निर्वासन से स्वदेश लौटने के कुछ वर्ष बाद ही वी.पी. कोइराला का स्वास्थ्य बिगडने लगा और अंततः वह स्वर्ग सिधार गए । अब गणेशमान सिंह के ऊपर नई जिम्मेवारी आ गई यद्यपि कार्यवाहक अध्यक्ष के रुप में कृष्ण प्रसाद भट्टराई का उन्हें भरपूर सहयोग मिला । नेपाली काँग्रेस की स्थापना काल से ही यह तीनों नेता कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे थे । परिवर्तित परिवेश में गणेशमान सिंह की रणनीति पंचायत प्रणाली से टक्कर लेकर चलने की थी । अतः जब पंचायती प्रशासन अत्यधिक अनुदार होने लगी और राजा वीरेन्द्र भी देश की जनता को राजनीतिक अधिकार दिए जाने के संबंध में गणेशमानजी की बातों की उपेक्षा करने लगे तो गणेशमानजी के सामने जन आंदोलन में उतरने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं रहा । उनके नेतृत्व में बामपथी दलों के साथ की गई कार्यगत एकता के अधीन जन आंदोलन का संचालन किया गया और गणेशमान सिंह सर्वोच्च कमांडर के रुप में जन आंदोलन को सफलता के शिखर पर पहुँचाने में कामयाब हुए । फलतः कई पंचायती संगठनों को बर्खास्त किया गया और राजा वीरेन्द्र ने गणेशमान सिंह से प्रधानमंत्री पद सँभालने का आग्रह किया । लेकिन त्यागी गणेशमान सिंह ने इस बार भी सर्बोत्कृष्ट त्याग का प्रदर्शन करते हुए प्रधानमंत्री पद अपने विश्वसनीय मित्र और पार्टी के कार्यवाहक अध्यक्ष कृष्ण प्रसाद भट्टराई को देने की आग्रह करने लगे ।
इस प्रकार भूत की तलाश में निकले युवक अपने मिशन में त्याग और सफलता का नया मिसाल कायम करते हुए आगे बढते गए, जिसका विस्तृत विवरण हमें वरिष्ठ पत्रकार माथवर सिंह बस्नेत के द्वारा प्रस्तुत की गई गणेशमान सिंह की आत्मकथा ‘मेरो कथाका पानाहरु’में मिलता है ।
प्रजातंत्र की स्रुथापना, मानव अधिकाररु की ररुक्षा औरुररु शांति की ररुक्षा की दिशा में उनके कार्यो की देश विदेश में प्रशंसा होने लगीरु। अमेरिरुका के तत्कालीन ररुाष्टरुपति जाथापना, मानव अधिकार की रक्षा और शांति की रक्षा की दिशा में उनके कार्यो की देश विदेश में प्रशंसा होने लगी । अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने १८डिसेम्बर सन् १९९०में ह्वाईट हाउस में उनका स्वागत किया । संयुक्त राष्ट्र«« संघ के द्वारा पाँच वर्ष में एक बार दिया जाने वाला ह्यूमन राइट्स एवार्ड से उन्हें सम्मानित किया गया और संयुक्त राष्ट्र संघ के पूर्व महासचिव उ थाँट की स्मृति में स्थापित उ थाँट पीस एवार्ड १९९१से विभूषित किया गया । वह दक्षिण एशिया के पहले ऐसे व्यक्तित्व थे जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ से मानव अधिकार पुरष्कार से सम्मानित किया गया था ।
आज वह हमारे बीच नही है । लेकिन उनकी जन्म शताब्दी वर्ष के इस पावन अवसर पर सभी उनके आदर्श, सिद्धांत और निष्ठापूर्ण राजनीति की आवश्यकता महसूस करते हैं । वह एक ऐसे पुष्पवाटिका के माली थे जिनके उद्यान में सभी रंग और किस्म के पौधों की कद्र होती थी । उनके इन गुणों की चर्चा करते हुए नेपाल सदभावना पार्टी के संस्थापक गजेन्द्र नारायण सिंह ने उनके निधन पर श्रद्धाजंली देते हुए कहा था –गणेशमानजी जात जाति, भाषा, सम्प्रदाय, वर्ग और समुदाय से ऊपर थे । बाद में तो वह पार्टी से भी ऊपर हो गए ।

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