कहानी मेरे शहर की

नेपाली भाषा से अनूदित
सुलोचना मानन्धर धिताल:लेखक, कवि और कथित विकासशील लोगों से हाँल भरा हुआ था । मुझे पहुँचने में कुछ देर हो गई थी । दो-दो बसों का सफर तय करके जब तक मैं वहाँ पहुँची तब तक कार्यक्रम शुरु हो चुका था । एक व्यक्ति जापानी कवि हान्च की कविता ‘यह शहर किसका’ का नेपाली अनुवाद सुना रहा था । इसका अनुवाद किसने किया था पता नहीं । जगह तलाश करती और पसीने को पोछती मैंने उस कविता की कितनी पंक्तियों को सुना याद नहीं, पर कविता की कुछ पंक्तियों ने मुझ पर भीतर तक असर किया था, कहीं अन्दर जाकर बस गई थीं वो पंक्तियाँ ।
गोष्ठी बहुत बडÞी थी । विषय भी बडÞा ही था- ये शहर किसका – बृहत बहस चली थी । विकास की योजना के तहत उस गोष्ठी में शहर के कई बुद्धिजीवी और देश के चर्चित कवि और लेखक आमंत्रित थे । मुझे भी विकसित व्यक्तियों की श्रेणी में ही आमंत्रित किया गया था । मैं साहित्यप्रेमी होने के कारण ही वहाँ मौजूद थी । शहर के दोनों पक्षों की वहाँ चर्चा हर्ुइ थी । कोलतार से लिपी अभी की सडÞक से लेकर कोने-कोने में बसे किराएदार, ऊँची-ऊँची इमारतें, आधुनिक भवनों से लेकर परम्परागत सौर्ंदर्य से पर्ूण्ा मठ मन्दिर तक, शहर के सौर्न्दर्य से लेकर प्रदूषण तक । अर्थात् शहर के हर विषय पर चर्चा हर्ुइ, वाद-विवाद हुआ । आयोजन में शामिल सभी विद्वत्जन हान्च की कविता को सुनकर भावविभोर हुए । मैं भी उनमें से ही थी । कविता को समझने वाली मैं एक शहरी, शहर के मध्य भाग असन की गली में जन्मी और पली-बढÞी भला मुझे वो भावपर्ूण्ा कविता कैसे नहीं छूती -र्
जर्मनी में हो या हमारे देश में, सभी शहर गाँव जैसा ही तो रहा होगा न – मेरी जन्मभूमि काठमान्डू के महानगर बनने की भी कहानी तो वैसी ही होगी । हान्च की कविता कुछ प्रश्न हमारे बीच भी छोडÞ गई- ये शहर किसका – गाँव का शहर में परिणत होने की पीडÞा-व्यथा आखिर कौन समझ सकता है –
गणितज्ञ नहीं समझ सकतेर्
धर्मशास्त्री भी नहीं समझ सकते
घर का नक्शा बनाने वाला भी यह नहीं समझ सकता
न्यायाधीश भी नहीं समझ सकता
शायद कवि ये समझ जाय –
इसलिए इस नाम के प्रश्न ने पूछा था- कवि से, कविता पढनेवाले और मुझ जैसे पाठक से भी ।
कविता के अन्तिम शब्द ने सभी की जिज्ञासा को शांत किया था । यह शहर मेरा या उसका न होकर हम सबका है, हमारा है । इसी भाव के साथ कविता की समाप्ति हर्ुइ थी । कविता निःसन्देह अच्छी थी । गोष्ठी र्सार्थक सिद्ध हर्ुइ थी । परन्तु मेरे लिए एक बात और थी, सोचने और समझने जैसी । वो ये कि उस गोष्ठी में उतने सहभागियों के बीच एक मैं ही थी, जो काठमान्डू में जन्म लेकर पली और बढÞी थी । सही मायने में शहरी । पर आजकल इस शहर को छोडÞ मैं नजदीक के गाँव में घर बना कर रह रही हूँ ।
परिचय होने के क्रम में कई बातें पता चलीं । कोई सुदूर पश्चिम में पैदा हुए थे पर आजकल काठमान्डू में रह रहे थे । कोई पर्ूव ताप्लेजुगं तो कोई बैतडÞी के थे । कई तो ऐसे थे जो पोखरा जैसे सुन्दर शहर को छोडÞकर यहाँ आकर बस गए थे । विराटनगर, झापा से लेकर, धनगढी, महेन्द्रनगर जैसे शहरों के कवि, स्रष्टा और बुद्धिजीवी अपनी कर्मस्थली काठमान्डू को बना कर यहाँ के निवासी हो गए थे ।  इस भीडÞ में एक मैं ही थी, जो काठमान्डू को छोडÞ गाँव में जाकर बस गई थी । उन विकासशील और स्रष्टाओं के बीच मैंने यह प्रश्न रखा भी था कि अब मैं क्या करूँ सीधा चलूँ या उल्टा – एक क्षण के लिए सभी खिलखिलाकर हँस पडÞे थे ।
इस शहर में गोष्ठियाँ होती रहती हैं । कभी भव्य सभागार में तो कभी किसी स्कूल या काँलेज के पुराने हाँल में होते रहने वाली ऐसी गोष्ठियों में अभिव्यक्त विचार अक्सर सहभागियों के मन में गहर्राई से प्रभाव नहीं डÞाल पाती हैं । मंचासीन गणमान्य गोष्ठी के अन्त में जिस तरह आसन को छोडÞकर जाते हैं उसी तरह उनके द्वारा दिए गए भाषण भी श्रोता को छोडÞकर चले जाते हैं । पर उस दिन घर लौटते समय रास्ते भर सोचती रही । मन में हान्च की कविता ही नहीं कई अभिव्यक्त विचार भी घूम रहे थे । मजाक में मैंने जो प्रश्न औरों से किया था, वह भी मुझे विचलित कर रहा था, मैं उल्टा रास्ता चलूँ या सीधा – दो-दो बसों को मैंने कब बदला ये मुझे याद नहीं ।
शहर मैंने बहुत पहले छोडÞ दिया था । पर आज ये प्रश्न मुझे ज्यादा सता रहा था । दिन भर नए पुराने लोगों की मुलाकात और विचार साथ ही कविता से मैं कुछ ज्यादा ही प्रभावित हर्ुइ थी ।  जब मैं गाँव अपने घर के नजदीक पहुँची, अचानक चौंक पडÞी । लग रहा था गाँव में जैसे अभी ही कोई भूकम्प आया हो । अनचाही सी बातें हो रही थी वहाँ । लगा, ये सपना तो नहीं –
उस रात मैं नहीं सोई, सो ही नहीं पाई । रात भर मन में एक छटपटाहट थी । मेरा मन कुछ इस कदर दुखी था, जैसे मेरे शरीर का कोई अनमोल हिस्सा खो गया हो । नई सुबह के स्वागत करने के समय तक मुझे लग रहा था कि मैंने कुछ खो दिया है या मेरा कुछ ऐसा खोने जा रहा है जो अब कभी नहीं लौटेगा ।
यहाँ रातों-रात गाँव शहर में परिणत हो रहे हैं, पृथ्वी का प्राकृतिक सौर्न्दर्य कृत्रिमता के जंगल में बदल रहा है । सुन्दर बस्ती सीमेन्ट के कुरूप जंगल में परिणत हो रहा है….गोष्ठी में बार-बार दुहराए गए ये वाक्य इस वक्त सचमुच जीवित होकर जला रहे थे । मेरे घर से जुडÞी दीवार टूटी हर्ुइ थी । उसके साथ का ही केले का स्तम्भ जो कभी मुझे मेरे मुस्कुराते साथी नजर आते थे आज वो गिरे पडÞे थे । गाँववाले झुण्ड बनाकर तमाशा देख रहे थे । मैं हडÞबडÞाती गाँववालों के करीब पहुँची ।
परेशानी से पूछा, “क्या हुआ -”
गाँववाले मेरी ही ओर अचम्भित होकर देखने लगे । मैं पूछ रही थी, “इतना सुन्दर रुद्राक्ष का हरा-भरा वृक्ष कहाँ गया – खिले हुए फूलों के पौधे कहाँ गए -”
वो सभी सुन्दर पेडÞ पौधे मेरे बाहर जाने के इन कुछ ही घन्टों में खत्म हो चुके थे । शहर से जुडÞी बात-चीत और विद्वत्जन की मुलाकात से लौटकर आती हर्ुइ अचानक गाँव में घटी इस वास्तविक घटना से मैं चकित थी । मुझे अत्यधिक परेशान देखकर पडÞोसी कृष्णबहादुर नजदीक आकर बोले, “आपको पता नहीं है क्या मैडम, मोहन तो अपना घर जमीन सब बेच चुका है ।”
मुझे लगा मैं पेडÞ से गिर गई । ना, पता नहीं था । कब, किसने खरीदा – क्या करेगा यहाँ – मैं एक के बाद एक प्रश्न पूछती चली गई ।
“और क्या करेंगे – बडÞा घर बनाएँगे, ऊपर नीचे दूकान ही दूकान, सटर ही सटर ।”
“कौन”
“और कौन, जो खरीदा है वही । झापा का व्यापारी है । न्यूरोड में भी बडÞा घर बनाए हुए है ।”
ये सारी बातें देखती और सुनती मैं सपना में आए बाढÞ की तरह महसूस कर रही थी, लगा गाँव में पाई मेरी खुशी उसी बाढÞ में बह गई ।
दूसरे की सम्पत्ति थी वह घर, वह जमीन । वो पेडÞ पौधे सभी दूसरे के थे । किन्तु कानून के तलवार से पृथ्वी के सीने पर लकीर खींच कर सम्पत्ति बाँटने वाले ये नहीं समझते कि प्रकृति का बँटवारा इतना सहज नहीं है । सम्पत्ति के बँटवारे से होने वाले जख्म कितने गहरे होते हैं, कितने बडÞे होते हैं ये नहीं समझते ।
यहाँ की हरियाली तो एक ही दिन में खत्म हो गई । अब उसकी जगह कंकरीट का कुरूप पिण्ड खडÞा किया जाएगा । दूकान तो दूकान के साथ डाँस बार भी तो बनेगा । रात भर डिस्को का शोरशराबा । जिसे मजबूरन सुनने को हम बाध्य होंगे । चिडिÞयों के झुण्ड भी तो अब यहाँ नहीं रह पाएँगे ।
मैं बैचेन होती हूँ, चिडिÞयों की तरह मेरा मन भी न जाने कहाँ-कहाँ भटकता है । शाम होने को आई लेकिन मैं न तो खा पा रही हूँ और न ही सो पा रही हूँ । निकट भविष्य के कोलाहल ने वर्तमान में ही मुझे ढँक लिया है । मुझे लगा मैं अपने सीने पर हाथ रखकर अपनी आँखें बन्द कर जोर-जोर से चिल्लाऊँ ।
किन्तु मेरी इच्छा के विरुद्ध जो होना था वो तो हो चुका था । किसी ने इसे खरीदा है नाराज होने से क्या फायदा । जाने दो जो होगा सो होगा कहकर अपने आपको समझाने की कोशिश करती हूँ । औरों की तरह सोने की कोशिश भी की पर मेरे मन ने सोना नहीं चाहा ।
शहर के कोलाहल को छोडÞ मैंने गाँव में बसने का निर्ण्र्ाालिया था । किन्तु अब तो यहाँ से भी भगाया जा रहा था । अब कहाँ जाऊँ – इसी प्रश्न ने मुझे रात भर परेशान किया । आखिर वो रात बीत गई, दूसरा दिन भी बीत गया और इसी तरह सभी दिन बीतते चले गए ।
पता नहीं मेरी पीडÞा कम हो गई थी या मैं उस पीडÞा को झेलने की अभ्यस्त हो गई थी । छटपटाहट धीरे-धीरे कम होती चली गई । पर समय-समय पर कई प्रश्न मन को विचलित करते थे किन्तु उसका कोई समाधान नहीं था । ऐसे में एक और घटना घटी ।
खुद को ग्रामीण समझने वाले, शहर में बडÞे घर के मालिक एक कवि मेरे आँफिस में आए । अच्छी कविता लिखते थे । कवि के रूप में मैं उनका सम्मान भी करती थी । शहर पर आधारित उनकी कविता को मैंने एक गोष्ठी में सुना था और उसकी जी भर कर तारीफ भी की थी । शायद यही वजह रही होगी, अपनी नई कविता कृति वो मुझे देने आए थे । थैला भरकर पुस्तकों का भार लिए आए उस कवि का स्वागत कैसे करूँ मैं समझ नहीं पाई, सामने की कर्ुर्सर्ीीर बैठने का अनुरोध करते हुए मैंने पूछा कुछ लेंगे – फिर तुरन्त फोन करके मनमाया को दो अच्छी काँफी लाने को कहा ।
वो कुछ गर्व से मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे । थैले से एक नई किताब निकाली और मेरे नाम के साथ सादर के कुछ अच्छे शब्दों को लिखा और किताब को दोनों हाथों से पकडÞ कर कुछ झुकते हुए मेरी ओर बढÞा दिया । मैं भी खुश हर्ुइ । मैंने एक ही साथ धन्यवाद और बधाई उन्हें दिया और खुश होती हर्ुइ किताब ले ली । पुस्तक के आवरण ने मुझे अपनी ओर खींचा । “अहा ! गेटअप सुन्दर है ।” मैंने कहा ।
और उनसे बात करती हर्ुइ यूँ ही उस किताब के पन्नों को पलटने लगी । अचानक बीच के पन्ने पर मेरी निगाह अटक गई । ‘इस शहर की कथा’ शर्ीष्ाक की कविता थी वो । प्रेमिका के सम्बोधन के साथ शुरु हर्ुइ वो कविता काठमान्डू शहर के विषय में थी । प्रारम्भ में काठमान्डू को एक अद्भुत सुन्दरी के रूप में बयान करती उस कविता के अन्त में उसे एक चरित्रहीन वेश्या के रूप में चित्रित किया गया था । ‘सुन्दरी’, ‘विश्वासघाती’, ‘डान्सबार’, ‘जूठा प्याला’ जैसे घृणित और सस्ते शब्दों से सम्बोधन किया गया था ।
‘औरों के प्याले मे खो जाने वाली
ओ छद्मसुन्दरी…..’
इन हर्फों को मैं पढÞ नहीं पाई, मेरे हाथ काँपने लगे । किताब को पकडÞी हर्ुइ मेरी ऊँगलियाँ ठण्डी होने लगी । लगा उस किताब में कोई घृणित और विषैला कीडÞा  बिजबिजा रहा है । घृणा का विस्फोट हुआ । उस विस्फोट में पुस्तक मेरे हाथों से उछल कर गिरी और दीवार से टकराते हुए नीचे गिर गई । मैं काँपने लगी । सामने बैठे कवि महाशय आर्श्चर्यचकित थे । उन्होंने परेशान होते हुए पूछा, “क्या हुआ मैडम – आपको क्या हुआ – आपने पुस्तक में क्या देख लिया -”
इस वक्त मैं शायद पहले वाली मैं नहीं थी । उस कवि को भी मैं सम्मानित स्रष्टा के रूप में नहीं देख रही थी । मैं उठी और गुस्से से काँपते हुए बोली, “महाशय आप क्या लिखते हैं अपनी कविता में – याद है आपको ये शहर किसका है -”
अवाक कवि हतप्रभ मेरी ओर देख रहा था ।
“ये मेरा जन्म स्थान है, मेरी धरती है, मेरी माँ है । मेरी धरती को तुम सबने आकर कुचला है, थूका, इसी धरती पर आकर देश-विदेश घूमे, कंकरीट का बडÞा जंगल खडÞा किया, डान्स बार बनाया, अबोध बाल-बालिका को नाचना सिखाया, पीना सिखाया और इसी शहर को जी भर कर गाली दे रहे हो । …टू मच ।”
“…….”
“और जो बदमाश है, गुण्डा है, दो नम्बरी है ये कहलाने वाले नेता, राजनीतिज्ञ, नहीं समझने वाले विदेशी अगर गाली देते हैं तो मैं उसके पीछे नहीं लगती, पर आप तो स्रष्टा हैं न – अपने आपको बुद्धिजीवी कहते हैं न कवि जी, पर आपको होश है कि आपने कविता कहकर उसमें क्या लिखा है -”
“…….”
“अगर यह शहर अच्छा नहीं है तो अपने पवित्र गाँव में जाकर रहिए न…, अपने गाँव का सिंगार कीजिए । वह भी अच्छा ही होगा । इस शहर को गाली देना, इसे वेश्या कहना, वधशाला कहना यह तो अति ही है कवि जी, अति है ।”
कवि कुछ बोले नहीं या बोल नहीं पाए ।
“कहो, कैसे सुनूँ मैं ये सब – मेरा शहर मेरी माँ है, समझे, मेरी जन्मभूमि है ।” आवेश में कवि के प्रति मेरा सम्बोधन आप से तुम पर आ गया था ।
“इस शहर में जन्म लेना मेरे हाथ में नहीं था, उसी तरह तुम गाँव में जन्म लिए । गाँव और शहर कहना भूगोल की बातें हैं । इतिहास की बातें हैं । शहर का दोष होता है – शहरी का दोष होता है – और तुम कहाँ घर बना कर रह रहे हो महाशय -” मैं निरन्तर कवि पर चिल्लाती रही ।
“क्या बिगाडÞा है तुम्हारा इस मिट्टी ने – इस धरती ने किसी का कुछ बिगाडÞा है – बोलो मेरे शहर ने तुम्हारा क्या बिगाडÞा है – इस शहर ने तुम्हारे गाँव का कुछ छीना है । इसी धरती पर सब आँख लगाए हुए हैं । दस जगह से आकर सभी ने यहाँ बडÞे-बडÞे महल बनाए हुए हंै, इस पर राज करते हैं और इसी को गाली देते हैं । पाखण्डी हैं सब । इसी कारण मेरा शहर सर नहीं उठा सकता, इसे प्यार नहीं कर सकते पर इसे चूसते जरूर हो ।” मैंने लम्बी साँस ली, कवि ने अब तक कुछ नहीं कहा था ।
फिर थोडÞी शांति के साथ मैंने कहा, “कोई कुछ बोलता है हम सन्तान होते हुए भी चुप हैं पर अब हम चुप नहीं रह सकते । मेरी माँ के विरुद्ध कोई व्यापारी बोले या कवि मैं अब सहन नहीं कर सकती ।”
“देश या शहर औरत, वेश्या, अपवित्र । तुम मर्द जो बोलो, जो करो पवित्र – ये कैसा हिसाब है – अब बहुत हुआ कवि जी । ऐसी वाहियात कविता लेकर मेरे यहाँ कभी मत आइयेगा, समझे -”
कब का गुस्सा, दुख, हृदय का विकार सब बेचारे कवि के ऊपर उतार दिया । भौंचक्का होकर उसने मेरी ओर देखा, पर मेरी आँखों में ज्यादा देर तक वो देख नहीं पाए ।
“साँरी मैडम मैं उस पन्ने को पुस्तक से निकाल दूँगा । अब मैं ऐसा कभी नहीं लिखूँगा । मुझको माफ कर दीजिए ।”
“मैं फिर पागल की तरह चिल्लाई । निकालना है तो मेरे सामने निकालिए । मैं आप सब की ज्यादती सहन नहीं कर सकती ।”
उस कवि ने कभी नहीं सोचा होगा कि जो उसकी प्रशंसक थी, वो उसकी कविता के विरुद्ध ऐसी काली का रूप दिखाएगी ।
फिर सम्भलते हुए मैंने कहा, “शहर हो या गाँव, अपनी मातृभूमि के प्रति प्रेम और श्रद्धा कहाँ है आपमें – यहाँ समस्याएँ हैं, पर कैसे जन्मी ये समस्याएँ – ये सोचना क्या बुद्धिजीवी स्रष्टाओं का काम नहीं – यह शहर यह गाँव सब हमारा है । इसे हम सब मिलकर सुन्दर बनाएँ, ऐसा कहते हैं आप – जर्मन कवि हान्च ने अपनी कविता की अन्तिम पंक्ति में कहा है, “शहर जैसा भी है हमारा है, यह शहर हमारा है ।”
अब तक उस कवि का चेहरा काला नीला हो चुका था । कँपकपाते स्वर में उसने कहा, “हाँ मैडम हमसे गलती हर्ुइ । लिखने के समय सोच नहीं पाया । शायद फैशन के पीछे चल पडÞा अब कभी ऐसे शब्द नहीं लिखूँगा ।”
तभी दरवाजे पर आहट हर्ुइ और हमारा ध्यान उधर गया, दरवाजे पर काँफी लेकर मनमाया खडÞी थी । हम दोनों का आवेश थोडÞा कम हुआ ।
इसी मौके का फायदा उठाते हुए कवि बोले, “मुझे जल्दी है मैडम मैं जाऊँगा ।” मैंने भी जिद नहीं की । मेहमान बिना काँफी पिए चले गए देखकर मनमाया को आर्श्चर्य हुआ । दूर फेंकी हर्ुइ किताब देखकर वह चकित थी । उसने कहा “मैडम किताब उठा दूँ ।” मुझे हँसी आई । मैंने हँसते हुए कहा, “उठा दो ।” फिर खुद से कहा, “अब कभी मेरे शहर के विषय में वह ऐसा नहीं लिख पाएगा ।”

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