कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना : बिम्मी शर्मा

दो नंबर प्रदेश प्रदेश पूरी तरह चुनावी रंग मे रंग चुका है । यहां दशहरे के जैसा माहौल है । हर तरफ अस्त व्यस्तता दिखाई देती है । सभी अपने समर्थित दल और उसके उम्मीदवार के समर्थन में कसीदे काढ़ रहे हैं । जिस तरह दशहरे के मेले में व्यापारी कमाने में व्यस्त रहते हैं और अपने ग्राहकों को लूटते हैं उसी तरह उम्मीदवार को मतदाता और पत्रकार लूट रहे हैं । उम्मीदवार को वोट चाहिए और मतदाता को नोट । ऐसा लगता है यह चुनाव नहीं नोट बदलने का कोई काउंटर है जहां मतदाता उम्मीदवारों को वोट देने की गारंटी देकर उसके बदले नोट ले रहे हैं ।
प्रदेश नंबर दो के अन्तर्गत आनेवाला वीरगञ्ज शहर इस प्रदेश का एक माश महानगर ही नहीं है, देश का सबसे कनिष्ठ महानगर भी है । नेपाल के मुख्य द्वार और आर्थिक नगरी के रूप में परिचित वीरगञ्ज शहर को अभी उन्माद चढ़ा है । इस शहर को अभी देख कर लगता ही नहीं है कि दो साल पहले हुए मधेश आंदोलन में यह शहर पूरी तरह तबाह हो कर बलि का बकरा बना था । सभी दो का चार और चार का आठ करने में मस्त हैं । बहती गंगा में हाथ धोने का पुण्य फिर कब मिलेगा पता नहीं । २० साल बाद तो स्थानीय तह का निर्वाचन हो रहा है ।
भ्रष्ट और बदनाम व्यापारी और मेडिकल माफिया वीरगंज का कमान अपने हाथों में लेने के लिए एड़ी, चोटी का जोर लगा रहे हैं । जितना पानी बाढ़ के दौरान सिर्सिया नदीं में नहीं बहा होगा उससे ज्यादा पैसा यह उम्मीदवार वीरगंज में बहा रहे हैं । और यहां के मतदाता और पत्रकार इस पैसे की बाढ़ में डुबकी लगा रहे हैं । किसी पत्रकार को लैपटप और पैसा मिल रहा है तो किसी स्थानीय ऑनलाईन को लाखों रूपए यह भ्रष्ट व्यापारी बांट रहे है । दो साल पहले हुए मधेश आंदोलन में तेल की तस्करी करके कमाए हुए पैसे को यह भ्रष्ट उम्मीदवार पानी की तरह बहा रहे हैं । आखिर में निर्वाचन में जीत कर इस शहर का नगर पिता जो बनने का ख्वाब है ।
किसी ने अपने पार्टी सुप्रिमो को भेंट दे कर मेयर पद का चुनावी टिकट हथियाया है तो किसी ने प्रदेश नंबर दो का चुनावी खर्च अपने पैसे से करने का जिम्मा उठाया है । जिसकी जितनी औकात वह उसी तरीके से पैसा लुटा रहा है और मतदाता लुटने के लिए बेताब हैं । शहर के विकास और परिवर्तन की लोग जितनी भी बात कर लें पर आम जनमानस में अभी भी पुरानी पार्टी और उम्मीदवार की ही छाप गहरे रूप में पड़ी है । जो जीतेगा वह विकास तो करेगा जरुर पर अपने परिवार और अपनी तोंद का । उसके बाद अपनी पार्टी और उससे जुड़े कार्यकर्ताओं का ।
बड़ी राजनीतिक पार्टियों ने जिस तरह से कुख्यात और भ्रष्ट व्यक्ति को वीरगंज के मेयर का उम्मीदवार बनाया है उससे इस पार्टी के कार्यकर्ता और परम्परागत मतदाता बौखला गए है । इनके लिए इधर पहाड़ तो उधर खाईवाली स्थिति हो गई है । इसीलिए यह जुबान से तो अपनी पार्टी का साथ दे रहे हैं आखिर में राजनीतिक आस्था का सवाल है । पर अंदर से दूसरी पार्टी से गठजोड़ कर उसे को जिताने में लगे हुए हैं । इसी को कहते हैं “कहीं पे निगाहें और कहीं पे निशाना ।” खा पी एक पार्टी का रहे हैं और वोट देने का मन दूसरे की तरफ बनाए हुए हैं ।
सबसे ज्यादा बुरा हाल तो नेकपा एमाले का है । जिसके कार्यकर्ता, मतदाता और प्रेस चौतारी के पत्रकार बाहर से जी हुजुरी कर के खाने, पीने का काम तो अपनी पार्टी के उम्मीदवार का कर रहे हैं पर अदंर से उसके विरोधी के साथ सांठगांठ कर चुके हैं हराने के लिए । यहां के पत्रकार तो अभी जासूस भी बन गए हैं । एक पार्टी और उसकी पत्रकारिता संगठन से वर्षों से जुडा पत्रकार अपनी पार्टी को छोड़ कर दूसरे को गिराने और मसलने के लिए उसी की पार्टी का सदस्य बन कर जासूसी कर रहा है । मधेशी पत्रकार समाज और फोरम से सम्बद्ध पत्रकार एमाले में घुसा है तो प्रेस यूनियन का सदस्य बन कर सारे वीरगञ्ज में परिचित पत्रकार फोरम में जा घुसा है । सब एक दूसरे की नब्ज टटोल कर अपने राजनीतिक आस्थावाले दल के लिए जासूसी कर रहे हैं ।
मेयर पद का टिकट पाने और जीतने के लिए अनेक कसरत करके अपनी पार्टी छोड़कर नयीं पार्टी में प्रवेश करनेवाले उम्मीदवार की हैसियत रैम्प में नए–नए डिजाईन के कपड़े बदल–बदल कर मोडलिंग करने वाले मोडल की तरह होते हैं । जिस तरह रैम्प पर मोडलिंग करने वाले मोडल का अस्तित्व उसी स्टेज तक सीमित है उसी तरह इन दल बद्लुओं का भी हश्र होगा । इन्हें जिस तरह से भी मेयर पद का टिकट चाहिए और टिकट मिलने के बाद हरेक रणनीति अपना कर जीतना है । जिसके लिए यह अपने विरोधी उम्मीदवारों को बदनाम करने और गिराने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते । नए, फ्रेस और योग्य उम्मीदवारो को तो यह चीटी की तरह मसल कर रख देते हैं । अभी इनके चुनाव की डिक्सनरी मे साम, दाम, दंड, भेद और “बाई हुक बाई क्रुक” जैसे शब्द ही बचे हैं । और यह उम्मीदवार रेस के घोड़े की तरह सरपट दौड़ रहे हैं ।
‘मनी एट्रेक्ट मनी’ की तर्ज पर अभी वीरगंज में वोट एट्रैक्ट नोट का माहौल है । घोड़ा किस करवट बैठेगा अंतिम घड़ी में मतदाता की ऊंगली किस उम्मीदवार के खाने में जा कर निशान लगाएगी यह तो दशहरे के माहौल में उसी समय पता चलेगा । पर वीरगंज अभी पूरे चुनावी शबाब है । दशहरा में खाया जाने वाला मांस, चूड़ा और शराब अभी से लोग खाना शुरु कर चुके हैं । दशहरा तो हर साल आता है पर चुनाव तो कुंभ के मेले की तरह वर्षों बाद आता है । लिहाजा इस चुनावी मेले में सभी अपनी लुटिया डुबा कर अपना जनम सार्थक कर रहे है । जिस तरह चुंबक लोहे को अपनी तरफ खींचता है उसी तरह उम्मीदवारों का लोभ और नोट मतदाताओं के वोट को अपनी तरफ खींच रहा हैं । लिहाजा एक तीर से दो शिकार करनेवाले चालाक मतदाता कहीं पे निगाहें और कहीं पे निशाना लगा कर अपनी जेब भर रहे हैं । जैसा भ्रष्ट और चालाक उम्मीदवार उससे भी ज्यादा तेज और चालाक लोमड़ी जैसे मतदाता चुनावी गणित को कहीं बना रहे हैं तो कहीं बिगाड़ भी रहे हैं । प्रदेश नंबर दो यानी वीरगंज शहर का चुनावी रौनक देखने के लिए आप सभी का स्वागत है । कृपया दिमाग को आलमारी में ताला लगाकर रख आइएगा । क्योंकि यहां चुनावी माहौल में दिमाग नहीं सिर्फ पैसा चलता और दौड़ता है । करोड़ों रूपए का दाँव जो लगा है ।

 

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