कहीं विषवृक्ष ना बन जाए संविधान

नहीं दिखा नेताओं का ‘ऋषिमन’
pankaj das

पंकज दास

‘संविधान सभा में वो ताकत है, वो सामथ्र्य है जो अपने काम से पूरी दुनिया में एक उदाहरण बन सकता है, पूरी दुनिया को एक नई दिशा दिखा सकता है । पूरी दुनियां को अपने रास्ते पर चलने को प्रेरित कर सकता है । संविधान सभा में वो ताकत है । लेकिन हमेशा यह ध्यान में रखना होगा कि आखिÞर यह संविधान किसके लिए ?
संविधान वो हो जो सर्वसमावेशक हो । हर नेपाली नागरिक को, चाहे वो गरीब हो अमीर हो, पहाड़ में रहता हो, तराई में रहताहो, पढ़ा लिखा हो, अनपढ़ हो, गाँव में हो, शहर में हो, कहीं पर भी हो, कोई भी हो, हर नेपाली को यह लगना चाहिए कि ये संविधान एक ऐसे गुलदस्ता के रूप में आया है जिसमें मेरे भी पुष्प लगे हैं । संविधान निर्माता ऐसा गुलदस्ता बनाए हैं जिसके कारण हर नेपाली को लगेगा कि संविधान एक ऐसे गुलदस्ते के रूप में आया है जिसमें मेरे भी फुल की महक आ रही है ।




संविधान वो हो जो सर्वजन हिताय हो । संविधान वो हो जो सर्वजन सुखाय हो । किसी खÞास समुदाय या वर्ग विशेष का भला करने वाला ना हो । संविधान जनसामान्य की आशा और आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए होना चाहिए । संविधान जोड़ता है, संविधान कभी तोड़ता नहीं । संविधान विवादों को संवाद की ओर ले जाने का एक माध्यम होना चाहिए ।
इसलिए चाहे पहाड़ हो, हिमाल हो या तराई हो, संविधान से इन सबके बीच जोड़ने का काम होना चाहिए तोड़ने का नहीं । संविधान वर्तमान की बोझ से दबा हुआ नहीं हो । और ऋषिमन से मेरा तात्पर्य यही है जो वर्तमान से मुक्ति की अनुभूति करता है, जो आने वाले कल को बहुत ही गहराई से देख सकता है । वही ऋषिमन होता है जो संविधान का निर्माण अपने लिए नहीं बल्कि आने वाले पीढि़यों के लिए करता है ।
संविधान में हजारों चीजें अच्छी होंगी । लेकिन एक कॉमा, एक फुलस्टॉप भी ऐसा आ गया जो आज तो पता नहीं रहे । लेकिन आज से पचास साल बाद, सौ साल बाद पता लगा वही कॉमा या वही फुलस्टॉप कहीं विषबीज ना बन जाए, विषवृक्ष को जन्म ना दे, जो नेपाल के सपनों को रौंद डाले । ऐसी स्थिति ना आने पाए इस बारीकी की चिंता संविधान सभा करेगी ऐसा मुझे पूर्ण विश्वास है ।
इन वाक्यों को आप भूले नहीं होंगे, इन वाक्यों के एक एक शब्द आज भी आप के कान में गूंजते होंगे, इन वाक्यों को पढ़ते समय आपके चेहरे पर खÞुशी के भाव तो जरूर आए होंगे । और याद आया होगा वह विहंगम दृश्य । आखिर आप उस दृश्य को, उन बातों को, उस दिन के भाषण को कैसे भूले जाएंगे । कैसे भूल जाएंगे कि इन्हीं बातों पर इन्हीं वाक्यों पर, इसी भाषण पर संविधान सभा का सम्मानित सदन तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा था । कैसे भूल सकते हैं वह ऐतिहासिक दिन जब इन्हीं बातो पर संविधान सभा के सभी सम्मानित सदस्य मेज थपथपाते हुए थक नहीं रहे थे । आप भले ही नहीं भूले होंगे लेकिन संविधान बनाने वाले देश के कुछ शीर्ष नेता जरूर भूल गए । जिन नेताओं के ऊपर जनता ने भरोसा कर संविधान सभा में भेजा उन्हें भला कैसे याद रहता ? उनमें से किन्हीं के कन्धों पर सरकार का बोझ और किसी के आँखों में सरकार में जाने का सपना पल रहा था तो भला यह याद भी कैसे रहता ।
जनता के द्वारा चुने हुए संविधान सभा से ही संविधान का निर्माण हो इसके लिए हुए निर्णायक आन्दोलन के आठ बरस और दो संविधान सभा चुनाव कराने के बाद जो पहला मसौदा आया उसमें कहीं भी संविधान निर्माताओं का ऋषिमन नहीं दिखा । संविधान सभा भले ही जनता के द्वारा चुनी गई थी लेकिन काम उन्हीं चन्द नेताओं ने बंद कमरे में ही किया । सत्ता के जालझेल, राजनीतिक स्वार्थ और नेताओं की महत्वाकांक्षा ने संविधान को लेकर नेपाली जनता के सपनों को चकनाचूर कर दिया है ।
भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नेपाल की संविधान सभा में दिए संबोधन, सुझावों, आशंकाओं और परिणाम के बारे में बारीकी से बताए जाने के बावजूद नेताओं ने उस पर मनन नहीं किया । संविधान का ड्रापÞm्ट जारी करने से पहले यदि एक बार भी नरेन्द्र मोदी के उस दिन के भाषण को सुन लिया जाता तो संविधान के ड्रापÞm्ट की यह दुर्गति कभी नहीं होती । संविधान के ड्रापÞm्ट का संविधान सभा के अन्दर ही विरोध कभी नहीं होता । इससे बड़ा अपमान संविधान सभा का क्या हो सकता है कि जिस समुदाय के लोगों ने संविधान सभा की मांग सबसे अधिक की थी, जिन समुदाय के लोगों को नए संविधान की सबसे अधिक आवश्यकता थी उसी समुदाय के जनप्रतिनिधियों के द्वारा ड्रापÞm्ट जारी होने के साथ ही उसे फाड़ कर विरोध जताने को मजबूर होना पड़ा ।
संविधान के इस ड्रापÞm्ट में ना तो नेताओं का वह ऋषिमन ही दिखता है, ना तो यह सभी नेपाली जनता का गुलदस्ता ही लगता है । पूरे नेपाल में कोई ऐसा समुदाय नहीं जो यह कह सके इस गुलदस्ता रूपी ड्रापÞm्ट से मेरे फूल की खुशबु आ रही है । या इस गुलदस्ते में मेरा भी फूल लगा है । जिस तरह से नरेन्द्र मोदी ने संविधान बनाने को लेकर नसीहत दी थी कि यह वर्तमान के बोझ से दबा हुआ नहीं होना चाहिए । लेकिन हुआ ठीक उसके विपरीत । संविधान का ड्रापÞm्ट पढ़कर ही लगता है कि यह वर्तमान के बोझ से दबा हुआ है । और ना जाने इसकी सांस कहाँ रूक जाएगी ।
जैसे तैसे संविधान का ड्रापÞm्ट लाने की हड़बड़ी में ऐसा दस्तावेज आया है जो ना तो आज की पीढ़ी के लिए है तो आने वाली पीढ़ी के लिए तो सोचना भी पाप है । यह दस्तावेज तो पुराने निरंकुश दिनों की याद दिला रहा है । तभी इस दस्तावेज के आने के बाद कुछ नेताओं और बुद्धिजीवी लोगों की प्रतिक्रिया थी कि इस संविधान से तो कहीं बेहतर अंतरिम संविधान ही है । कहीं बड़े दल के बड़े नेताओं की यही साजिश तो नहीं कि जानबूझ कर ऐसा संविधान लाया जाए जो अस्वीकार्य हो और अंतरिम संविधान में ही थोड़ी बहुत फेरबदल कर उसे ही स्थायित्व प्रदान कर दिया जाए । या कुछ अधिक राष्ट्रवादी लोग तो फिर से संवैधानिक राजतंत्र की वकालत करते हुए ०४७ साल का संविधान ही जारी कर दिया जाए ।
नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण में कहा था कि संविधान जोड़ने का काम करता है । वह दस्तावेज संविधान नहीं कहला सकता है जो तोड़ने का काम करे । लेकिन नए संविधान के ड्रापÞm्ट को देख कर लगता है कि यह जोड़ने का काम किस आधार पर किस धारा और उपधारा में करता है पता नहीं लेकिन नेपाल के लोगों के बीच में दूरियाँ बढाने का काम जरुर कर सकता है । एक खÞास वर्ग समुदाय को विशेष फायदा पहुँचाने के लिए लाया गया संविधान किस प्रकार हिमाल को पहाड़ से और पहाड़ को तराई से जोड़ेगा जबकि उस दस्तावेज में ऐसा कुछ भी समावेश नहीं किया गया है ।
संविधान के ड्रापÞm्ट से तो लगता है कि यह ना तो समावेशी है और ना ही इसमें ऐसा कुछ भी दिखता है जो समावेशी की ओर लेजाने का प्रयास करे । संविधान के ड्रापÞm्ट के आते ही जिस तीव्र रूप से इसका विरोध हो रहा है उससे यह कहना मुर्खता ही होगी कि यह सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय है । और जिस प्रकार से भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को यह आशंका थी वही हुआ । यह ड्रापÞm्ट विष बीज बन कर बाहर आया है इसके विष वृक्ष बनते देर नहीं लगने वाली है । उन्हें तो सिर्फ एक कॉमा या एक फुलस्टॉप छूट जाने के कारण ऐसा होने की आशंका जताई थी यहाँ तो पूरा का पूरा भाग से लेकर दफा तक और उपधारा से लेकर इसके व्याख्या तक में त्रुटियाँ भरी पड़ी है ।
अभी भी समय है ड्रापÞm्ट आना एक आधार भर है । इसमें यदि अभी ही गलतियां नहीं सुधार की गई, दो तिहाई का दंभ दिखाया गया, इसको समावेशी नहीं बनाया गया, अधिकार संपन्न नहीं बनाया गया और गलतियों को नजरअंदाज किया गया तो इसका गंभीर परिणाम हमारी आने वाली सन्ततियां भी भुगतेंगी




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