कांग्रेस का मधेश मन्त्र

चन्द्रकिशोर

सीमावर्ती भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश में हाल ही में सम्पन्न चुनाव में केन्द्रीय सरकार का नेतृत्व कर रही कांग्रेस को बुरी तरह से पराजय का सामना करना पड। चुनाव प्रचार के क्रम में राहुल गान्धी ने जनता के साथ नजदीकी दिखाने का भरसक प्रयास किया। अपने भाषण में आक्रामकता लाने के लिए तत्कालीन मुख्यमन्त्री मायावती के भ्रष्टाचार के सम्बन्ध में उन्होंने जोशपर्ूण्ा भाषण किए। हिन्दी में अच्छी पकड है, यह दिखाने के लिए स्थानीय शब्दावली का भी प्रयोग हुआ। जो उनकी माँ सोनिया गान्धी नहीं कर

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कांग्रेस का मधेश मन्त्र

सकतीं। शब्द सचेतना, आक्रामकता और थोडी बहुत जातीय बातों के अतिरिक्त कोई दूसरा चमत्कार नजर नहीं आया। एक क्षेत्रीय दल अर्थात् मायावती की बहुजन समाज पार्टी
विकल्प में उत्तर प्रदेश के नए जनादेश ने दूसरे क्षेत्रीय दल समाजवादी पार्टर्ीीो चुना और युवा नेता अखिलेश यादव मुख्य मन्त्री हुए। अब राहुल गान्धी को पता चला है, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे गंगा के मैदानी क्षेत्र की राजनीति में कांग्रेस को पुनर्स्थापित कराने में, बहुमत दिलाने में और भरोसेमन्द दल बनाने में न तो उनके पास कोई दिशा है और न कोई साधन।
नेपाली कांग्रेस में विगत कुछ समय से मधेश के सर्न्दर्भ में कुछ बातें हो रही हैं। प्रशिक्षण कार्यक्रमों में मधेश के बारे केन्द्रिय विमर्श का अवसर कहकर प्रचारित किया जा रहा है। पर्ूर्वी तर्राई के इटहरी में और मध्य तर्राई के वीरगन्ज में प्रशिक्षण सम्पन्न भी हो चुका। इसमें कांग्रेस के शर्ीष्ा नेताओं की सहभागिता भी दिखी।  एक मुख्य राष्ट्रिय दल के द्वारा अपने आधार क्षेत्र में जनमत निर्माण करना अच्छी बात है। लम्बे समय से राजधानी में खोई हर्ुइ कांग्रेस को बाहर जनता के समक्ष पहुँचते हुए देखना प्रशंसनीय है। मगर क्या इतने से कांग्रेस मधेश में अपना पैर जमा सकती है – कांग्रेसीजन का स्वाभाविक मनोविज्ञान है कि मधेश केन्द्रित दल अलोकप्रिय हैं, विभाजित हैं, मोर्चा के अन्दर रहते हुए भी एकदूसरे को कमजोर बनाने में तत्पर हैं। तथा पडÞोसी भारत भी नेपाल में लोकतान्त्रिक शक्तियों की मजबूती की शुभेच्छा रखता है। तर्सथ मधेश कांग्रेस के लिए पैर जमाने में अनुकूल है। मधेशी मनोविज्ञान बामपन्थी झुकाव को उतना अच्छा नहीं मानता। इससे भी कांग्रेस को फायदा ही है। इस प्रकार से हवाई किला बनाने से कांग्रेस को मधेश में पुराना विश्वास और धरातल मिलना मुश्किल है। मूलतः नेपाली कांग्रेस समय के बदलाव और प्रवाह तथा मधेशी व्रि्रोह से उत्पन्न जनचेतना के सर्न्दर्भ में सामाजिक-राजनीतिक परिवेश में खुद को ढूँढ रही है।
अभी कांग्रेस की प्रतिस्पर्धा अपने ही विगत के इतिहास के साथ है। अपने इतिहास को अभी की स्थिति अनुसार पुनः परिभाषित न करते हुए केबल मधेश केन्द्रित दलों को गाली देते हुए अपनी पहचान के अस्तित्व को साम्प्रदायिक कहकर निष्कर्षनिकालने से अपने आकार को बढाया नहीं जा सकता। राजनीतिक अंकगणित नहीं है, जहाँ दो और दो मिलाकर चार होता है। मधेश में मजबूत होने के लिए कांग्रेस यहाँ के सामाजिक, राजनीतिक बहुआयामिकता को यथार्थ के आधार पर ठीक-ठीक मापन करें। अर्थात् अभी की स्थिति में मधेशी जनता की मनोवैज्ञानिक स्थिति, सक्रिय राजनीतिक शक्तियाँ, रिक्तता के चरण, कांग्रेस की सांगठनिक स्थिति, कांग्रेस प्रति कार्यकर्ताओं में व्याप्त असन्तोष, आम मधेशी द्वारा कांग्रेस के प्रति दृष्टिकोण, भूराजनीतिक स्वार्थ आदि को कांग्रेस सही ढंग से मूल्यांकन करे। सतही विश्लेषण और सीमित नेताओं की घेराबन्दी से नेतृत्व यदि अपने को उपर नहीं उठा सकता तो पडÞोसी उत्तर प्रदेश में भारतीय कांग्रेस की जो नियति हर्ुइ, तर्राई में नेपाली कांग्रेस को वही दृश्य देखना होगा।
मधेशी राजनीति का मूलधार लोकतान्त्रिक ही है, इसमें दो मत नहीं। मधेशी दलों के अनेक महत्वपर्ूण्ा नेतागण की पृष्ठभूमि कांग्रेस हीं रही है। लेकिन दूसरा यथार्थ यह भी है, मधेशी दलों के अन्दर ही नहीं, एमाओवादी और एमाले जैसे मुख्य बामपन्थी दलों के मधेशी नेतृत्व में बामपन्थी मधेशी दलों की आवश्यकता के विषय में समय-समय पर बात चलती है। और राष्ट्रिय राजनीति में संविधान निर्माण के पश्चात् क्षेत्रीय बामपन्थी मधेशी दल की सम्भावना साकार हो सकती है। अर्थात् मधेश में बामपन्थी बीज को बढÞते हुए सपना देखनेवाले बामपन्थी दल के अन्दर बहुत सारे नेता लोग हैं। दूसरी अवस्था भी है। एमाओवादी और एमाले भी मधेश में योजनाबद्ध तरीके से आगे आने के लिए गृहकार्य में लगे हुए हैं। एमाओवादी ने तो अपनी अन्तिम लडाइँ मधेश से ही जीतने का उद्घोष किया है। इसके लिए उसके पास कार्ययोजना भी है। मधेश में अपना प्रभाव बढÞाने के लिए उनके पास अनेक वैकल्पिक रास्ते भी हैं।
००७ साल से हरेक आन्दोलन और सशक्त क्रान्ति, ०३६ साल का जनमत संग्रह तथा ०४६ और ०६३ का जनआन्दोलन में निर्ःशर्त और एकाग्र रुप से लगा हुआ मधेश के प्रति विश्वास, आश्वासन और भरोसा के शब्द व्यक्त करने में राजनीतिक इमान्दारी कांग्रेस दिखा रही है। ०६३ के मधेशी व्रि्रोह के नायक आम मधेशी लोग थे। मगर उसमें अन्य मुख्य दल के कार्यकर्ता के समान ही कांग्रेसीजन ने अपनी हिस्सेदारी दिखाई थी। मधेशी आन्दोलन की पृष्ठभूमि में सम्पन्न संविधानसभा निर्वाचन में रमेश रिजाल, दीपकुमार उपाध्याय, डा. शशांक कोइराला जैसे पहाडी पहिचानवाले नेता लोग भी क्या मधेश से विजयी नहीं हुए है – अभी समग्र में मधेश की समस्या को परिभाषित करने के लिए और उसको सांस्कृतिक समुदाय से राजनीतिक समुदाय में रुपान्तरण करने के लिए उदार विचार धारा प्रस्तुत करने में क्या कांग्रेस र्समर्थ है – इन प्रश्नों के आलोक में कांग्रेस अपने आगमन का आँकलन कर सकती है।
सांस्कृतिक भिन्नताओं को स्वीकार करते हुए समतामूलक समाज निर्माण करना आज की आवश्यकता है। लोकतान्त्रिक पद्धति में बहुसांस्कृतिक समाज के उन्नयन को प्राथमिकता देनी चाहिए। २०६३ के जनआन्दोलन के जनलगाव और उत्प्रेरणा के तथ्यों को कांग्रेस द्वारा यथारूप में मूल्यांकन नहीं होना, वर्तमान में दिखती समस्या का आधारभूत कारण है। कांग्रेस यदि एमाओवादी और मधेशवादी दलों के साथ प्रतिरक्षात्मक रुप से संर्घष्ा में वैचारिक ऊर्जा खर्च करने में ही लगी रहे तो स्वयं मूलधार बनकर मधेश में वह अपनी जडÞ नहीं जमा सकती। १२वें महाधिवेशन में मधेशी कोटा अर्न्तर्गत केन्द्रिय समिति में आने के लिए वैधानिक प्रावधान रखा गया, परन्तु उसके अनुसार काम नहीं हो सका। मगर यही कांग्र्रेस है, जो इतिहास के एक कालखण्ड में बिना किसी प्रचारबाजी और आरक्षण के बावजूद भी बहुत सारे मधेशी नेतृत्व को स्वाभाविक अवसर देने के लिए तैयार थी। और इस क्षेत्र के लोगों को भी लगा था, नेपाली कांग्रेस के साथ देश का भविष्य जुडÞा हुआ है। आज आरक्षण का प्रावधान आया, परन्तु केन्द्रिय समिति में मधेशी उपस्थिति कितनी है – एक ओर तो कांग्रेस को बामपन्थी पार्टियों की नकल करते हुए समुदाय आधारित कोटा प्रक्रिया रखना नहीं चाहिए था, रख लिया तो उसकी अनुभूति और प्रत्याभूति दिलाने में कांग्रेस क्यों असफल रही- महाधिवेशन में मधेश के लिए एक अलग ही समन्वय समिति का प्रावधान स्वीकार किया गया था, मगर वह नहीं हो सका। प्रशिक्षण प्रतिष्ठान के संयोजक तथा पार्टर्ीीपसभापति रामचन्द्र पौडेल की लम्बी लोकतान्त्रिक संर्घष्ामय पृष्ठभूमि है। मगर मधेशी दृष्टिकोण से देखने पर उनको अनुदार कहा जा रहा है। मधेश के साथ सम्वाद और समन्वय करने के लिए अभी भी कांग्रेस के पास विमलेन्द्र निधि ही तुरुप का एक्का है। लेकिन उनको भी अपनी कमजोरियों को दूर करना जरुरी है।
लोकतान्त्रिक ढाँचे के अन्दर मधेशी एजेण्डों को कांग्रेस को अपने कार्यक्रम के अन्तरगत समावेश करना चाहिए। प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आंशिक लाभ हो सकता है, मगर आवश्यक है, मधेश केन्द्रित कार्यकर्ताओं के विमर्श और अन्तरभूगोल के कार्यकर्ताओं के बीच सम्वादमूलक कार्यक्रमों को चलाना, जिससे कांग्रेस को ऊर्जा मिलेगी। अपनी पाँकेट से नेता और नारा स्थापित करने की परिपाटी अभी के सर्न्दर्भ में कालिदास की कहानी की तरह अव्यावहारिक लगती है। मधेश में सामाजिक, आर्थिक पृष्ठभूमियों में अन्तर आया है। जनता की अपेक्षाएं अलग ढंग से सामने आ रही हैं, मधेश बहुल क्षेत्र में ही नहीं, तर्राई के पहाडी बहुल क्षेत्र में भी कांग्रेस के प्रति विकर्षा बढÞ रहा है। इस को निचले तह तक जाकर जनविश्वास प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। पिछले समय में स्वयं सभापति सुशील कोईराला, महामन्त्री प्रकाशमान सिंह और कृष्णप्रसाद सिटौला ने तर्राई के सुदूर भागों में पहुँचकर इस सर्न्दर्भ में कुछ किया है। मगर इन सभी को आम जनता ने सिर्फवनभोज की शैली में देखा तो नहीं है, इधर भी विचार करना जरुरी है।
जिला-जिला में कांग्रेसी-कलह मन्द नहीं हुआ है। दल शुद्धीकरण के प्रयत्न सफल नहीं हुए हैं। कांग्रेसी कार्यकर्ता स्वयं को अभी भी और दलों की तुलना में अपनी आकर्ष छवि प्रस्तुत नहीं कर पाए हैं। जिला में राजनीति की वही घिसी-पिटी शैली चली आ रही है। इन में संशोधन करना होगा। हम परिवर्तनकामी शक्ति हैं, कहकर जनता में कांग्रेस को भरोसा जगाना होगा। ०४६ साल के संविधान में शाब्दिक परिवर्तन करनेवालों को दल का नेतृत्ववर्ग खबरदारी करें। तर्राई की विविधता को अन्तर समुदाय तक पहुँचाना, पुरानी छवि को जिला और क्षेत्र में पहुचाना, संगठन की पारम्परिक धूरी की खोज करने में विलम्ब नहीं करना चाहिए। मधेश में किसी जाति विशेष का व्यक्ति उसका प्रतिनिधि नेता नहीं हो सकता। लोकतन्त्र ही समावेशी राज्य मार्फ संस्थागत प्रतिनिधित्व दे सकता है। इसका प्रचार होना चाहिए। गणतन्त्र, संघीयता और संसदीय प्रणाली के मार्फ ही नेपाल के अन्य भूगोल की जनता की तरह मधेशी समुदाय का वर्तमान और भविष्य उन्नत हो सकता है, इस भाव को जितना बढावा देंगे, उतना ही मधेश के साथ कांग्रेस का सामिप्य बढÞता जाएगा। कांग्रेस का चिन्ह वृक्ष की जड यहाँ की भूमि में मजबूत होगी। कांग्रेस का वृक्ष मधेश की उर्वर भूमि में अभी भी फलफूल सकता है। मगर उसके लिए खासी मेहनत और सुरक्षा की जरुरत है।

साभारः कान्तिपुर  ±±±

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