कांग्रेस में नेतृत्व का विकल्प जरुरी
मधुसूदन भट्टर्राई

“मै जो बोलता हूँ, वही करता हूँ’ किसी के मुँह से यह निकले तो लोक आश्वस्त हो जाते थे कि यह काम हो कर रहेगा। सम्भव/असम्भव जो हो, लेकिन काम हो जाता था। वैसे व्यक्ति के रुप में परिचित थे, तत्कालीन नेपाली कांग्रेस के स्व. सभापति गिरिजाप्रसाद कोइराला। उनके नेतृत्व में दूसरा जनआन्दोलन -०६२/०६३) सफल होने के बाद वे सिर्फकांग्रेस सभापति नहीं रहे, राष्ट्र के राजनेता बन गए। सभी पार्टियों ने उन्हें राजनेता माना। उनकी हिम्मत तथा तत्कालीन देश में नयी शासन व्यवस्था स्थापना के लिए दश वषर्ीय सशस्त्र द्वन्द्व करने वाले माओवादी तथा अन्य दल के सहयोग से देश मंे २४० वर्षों तक अपना आधिपत्य जमाए हुए राजतन्त्र ने घुटने टेक दिए और नेपाल में जनतान्त्रिक शासन व्यवस्था की शुरुवात हर्ुइ। कोइराला हिम्मत नहीं करते, और अन्य दल साथ नहीं देते तो शायद नेपाल में गणतन्त्र स्थापित नहीं होता। मगर बिडम्बना की बात जिसने गणतन्त्र की शुरुवात की, उसे कानूनी जामा पहनाकर संस्थागत करने से पहले ही वे इस दुनिया से कूच कर गए। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव उनकी पार्टर्ीीेपाली कांग्रेस पर तो पडÞा ही, उससे ज्यादा मार पडÞी नेपाली जनता को।
वैसे दृढÞ निश्चयी राजनेता की पार्टी
, अभी नेतृत्व का अभाव है। क्षमतावान नेता की कमी से महाधिवेशन सम्पन्न हो जाने पर भी केन्द्रिय समिति और केन्द्र का विभाग सब अपर्ूण्ा रुप में है। कोइराला के बाद सभापति हुए सुशील कोइराला, वरिष्ठ नेता शेरबहादुर देउवा और संसदीय दल के नेता तथा पार्टर्ीीपसभापति रामचन्द्र पौडेल इन तीनों में नेतृत्व की क्षमता नहीं दिखती और इन में पद के लिए सिर्फआपस में टकराव हो रहा है। दूसरे शब्दों में साँप छुछुन्दर की अवस्था है। न खाते बनता है, न उगलते बनता है। हाँला कि कांग्रेस कार्यकर्ता इन तीनों को तीन खम्बा कहते हैं, मगर इन में हिम्मत और काम पूरा करने की क्षमता न होने से पार्टी
मजबूरन नेतृत्व का विकल्प खोजना पडÞ रहा है।
पार्टर्ीीा १२वाँ महाधिवेशन सम्पन्न हुए १५ महीना बितने पर भी सभापति कोइराला मंे बोल्ड डिसिजन करने की क्षमता न होने से केन्द्रिय समिति ने भी पर्ूण्ाता नहीं पाई है। विधान अनुसार महाधिवेशन के बाद दो महीना के अन्दर में यह काम हो जाना चाहिए था। इस तरह सभापति कोइराला स्वयं तो असफल हुए हीं, बाद में आने वाले सभापति के लिए भी इन का बिगाडÞा हुआ काम बनाने की जिम्मेवारी छोडÞ गए। नेपाल विद्यार्थी संघ दस महीने से नेतृत्व बिहीन है। उसी तरह तरुण दल विघटित है। नेपाल महिला संघ, आदिवासी जनजाति संघ और प्रजातन्त्र सेनानी संघ भी चार महिनों से अभिभावकत्व विहीन है। कोई भी पार्टर्ीीूसरी पार्टर्ीीे अध्यक्ष को यदि तुम देश का नेतृत्व लेते हो तो हम तुम्हे सहयोग करेंगे, ऐसा र्सार्वजनिक कार्यक्रम में खुल्लम-खुल्ला नहीं बोल सकते। यदि ऐसा कहना है तो राजनीति ही क्यू करना – लेकिन कोइराला ने ऐसा कहा। जबकि वे व्यवस्थापिका संसद में प्रमुख प्रतिपक्षी दल के सभापति भी हैं।
पार्टर्ीीे दूसरे वरिष्ठ नेता देउवा बाहर कहते है- मैने गिरिजा को तो नहीं माना तो सुशीलबाबू क्या चीज है ! मगर कार्यकर्ताओं का दिल जितने के लिए देउवा भी कुछ नहीं कर पाए है। वे कहते है- पार्टर्ीीे मुझे काम करने का मौका और वातावरण नहीं दिया। मगर यह बात गलत है। संविधान सभा के निर्वाचन पश्चात देउवा को कांग्रेस ने प्रधानमन्त्री का उम्मेदवार बनाया था। वे माओवादी अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल से हार गए। उसके बाद संसदीय दल का नेतृत्व करने के लिए वे अपनी ही पार्टर्ीीे रामचन्द्र पौडेल से भिड गए और पराजित हुए। १२वे महाधिवेशन में सभापति के लिए उम्मेदवार बन कर भी हार गए। फिर वर्तमान सरकार के निर्माण के समय सहमतीय सरकार गठन के लिए प्रयास हुआ। कांग्रेस ने उन को ही नेतृत्व के लिए उम्मेदवार बनाया मगर वे सफल नहीं हुए। इन सारी घटनाओं को देखते हुए पार्टी
उन को अवसर बहुत दिया मगर वे लाभ नहीं उठा सके।
दूसरे नेता, संसदीय दल के भी नेता है, रामचन्द्र पौडेल। जिन में नेतृत्व क्षमता का विल्कुल अभाव है। पार्टी
कार्यकर्ता उनसे नाखुस रहते है और वे दूसरे को खुस करके काम कर नहीं पाते। कांग्रेस ने पौडेल को प्रधानमन्त्री के उम्मेदवार में इससे पहले मौका दिया था और १७ बार वे प्रधानमन्त्री निर्वाचन में पराजित हुए। इस को ऐतिहासिक हार कह सकते है। बार बार हारने वाले पौडेल अब भी मौका मिलते ही अब नयाँ बनने वाली सरकार का प्रधानमन्त्री मैं बनूंगा, ऐसा कहते रहते है।
पार्टर्ीीब इन नेताओं को आगे बढÞाती है, तब ये अपने प्रयास से, अपनी क्षमता से, विजयी नहीं हो पा रहे है। यह बहुत बढÞी समस्या है। इससे प्रजातन्त्र का मसीहा कहलाने वाला नेपाली कांग्रेस अब इतिहास में जाने के कगार पर है। दूसरी पीढÞी के नेता लोग अब कहने लगे है कि पार्टी
नेतृत्व का विकल्प ढूढÞना चाहिए। यह बात अब र्सार्वजनिक रुप से भी सामने आ रही है। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता अर्जुन नरसिंह केसी के अनुसार पार्टर्ीीा अस्तित्व अभी खतरे में है। इसलिए नेतृत्व परिवर्तन जरुरी है। पद में आसीन होने के बाद काम भी उस अनुरुप करना चाहिए। केन्द्रिय सदस्य महेन्द्र यादव का कहना है- नेतृत्व न खुद काम करता है, न नई पीढÞी को काम करने का मौका देता है। यही बात अधिकांश युवा केन्द्रीय सदस्य कहते है। जिम्मेवारी मिलने पर काम कर सकने की क्षमता वाले लोग कांग्रेस में हैं, मगर नेतृत्व के पास रणनीति और भिजन दोनों नहीं है। इसलिए नेतृत्व में जो बैठे हैं, वे पार्टर्ीीो इस अवस्था से ऊपर उठावें, अन्यथा जो सक्षम है, उन्हे काम करने का मौका दें।  ±±±
“मै जो बोलता हूँ, वही करता हूँ’ किसी के मुँह से यह निकले तो लोक आश्वस्त हो जाते थे कि यह काम हो कर रहेगा। सम्भव/असम्भव जो हो, लेकिन काम हो जाता था। वैसे व्यक्ति के रुप में परिचित थे, तत्कालीन नेपाली कांग्रेस के स्व. सभापति गिरिजाप्रसाद कोइराला। उनके नेतृत्व में दूसरा जनआन्दोलन -०६२/०६३) सफल होने के बाद वे सिर्फकांग्रेस सभापति नहीं रहे, राष्ट्र के राजनेता बन गए। सभी पार्टियों ने उन्हें राजनेता माना। उनकी हिम्मत तथा तत्कालीन देश में नयी शासन व्यवस्था स्थापना के लिए दश वषर्ीय सशस्त्र द्वन्द्व करने वाले माओवादी तथा अन्य दल के सहयोग से देश मंे २४० वर्षों तक अपना आधिपत्य जमाए हुए राजतन्त्र ने घुटने टेक दिए और नेपाल में जनतान्त्रिक शासन व्यवस्था की शुरुवात हर्ुइ। कोइराला हिम्मत नहीं करते, और अन्य दल साथ नहीं देते तो शायद नेपाल में गणतन्त्र स्थापित नहीं होता। मगर बिडम्बना की बात जिसने गणतन्त्र की शुरुवात की, उसे कानूनी जामा पहनाकर संस्थागत करने से पहले ही वे इस दुनिया से कूच कर गए। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव उनकी पार्टर्ीीेपाली कांग्रेस पर तो पडÞा ही, उससे ज्यादा मार पडÞी नेपाली जनता को।
वैसे दृढÞ निश्चयी राजनेता की पार्टर्ीीें, अभी नेतृत्व का अभाव है। क्षमतावान नेता की कमी से महाधिवेशन सम्पन्न हो जाने पर भी केन्द्रिय समिति और केन्द्र का विभाग सब अपर्ूण्ा रुप में है। कोइराला के बाद सभापति हुए सुशील कोइराला, वरिष्ठ नेता शेरबहादुर देउवा और संसदीय दल के नेता तथा पार्टर्ीीपसभापति रामचन्द्र पौडेल इन तीनों में नेतृत्व की क्षमता नहीं दिखती और इन में पद के लिए सिर्फआपस में टकराव हो रहा है। दूसरे शब्दों में साँप छुछुन्दर की अवस्था है। न खाते बनता है, न उगलते बनता है। हाँला कि कांग्रेस कार्यकर्ता इन तीनों को तीन खम्बा कहते हैं, मगर इन में हिम्मत और काम पूरा करने की क्षमता न होने से पार्टर्ीीो मजबूरन नेतृत्व का विकल्प खोजना पडÞ रहा है।
पार्टर्ीीा १२वाँ महाधिवेशन सम्पन्न हुए १५ महीना बितने पर भी सभापति कोइराला मंे बोल्ड डिसिजन करने की क्षमता न होने से केन्द्रिय समिति ने भी पर्ूण्ाता नहीं पाई है। विधान अनुसार महाधिवेशन के बाद दो महीना के अन्दर में यह काम हो जाना चाहिए था। इस तरह सभापति कोइराला स्वयं तो असफल हुए हीं, बाद में आने वाले सभापति के लिए भी इन का बिगाडÞा हुआ काम बनाने की जिम्मेवारी छोडÞ गए। नेपाल विद्यार्थी संघ दस महीने से नेतृत्व बिहीन है। उसी तरह तरुण दल विघटित है। नेपाल महिला संघ, आदिवासी जनजाति संघ और प्रजातन्त्र सेनानी संघ भी चार महिनों से अभिभावकत्व विहीन है। कोई भी पार्टर्ीीूसरी पार्टर्ीीे अध्यक्ष को यदि तुम देश का नेतृत्व लेते हो तो हम तुम्हे सहयोग करेंगे, ऐसा र्सार्वजनिक कार्यक्रम में खुल्लम-खुल्ला नहीं बोल सकते। यदि ऐसा कहना है तो राजनीति ही क्यू करना – लेकिन कोइराला ने ऐसा कहा। जबकि वे व्यवस्थापिका संसद में प्रमुख प्रतिपक्षी दल के सभापति भी हैं।
पार्टर्ीीे दूसरे वरिष्ठ नेता देउवा बाहर कहते है- मैने गिरिजा को तो नहीं माना तो सुशीलबाबू क्या चीज है ! मगर कार्यकर्ताओं का दिल जितने के लिए देउवा भी कुछ नहीं कर पाए है। वे कहते है- पार्टर्ीीे मुझे काम करने का मौका और वातावरण नहीं दिया। मगर यह बात गलत है। संविधान सभा के निर्वाचन पश्चात देउवा को कांग्रेस ने प्रधानमन्त्री का उम्मेदवार बनाया था। वे माओवादी अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल से हार गए। उसके बाद संसदीय दल का नेतृत्व करने के लिए वे अपनी ही पार्टर्ीीे रामचन्द्र पौडेल से भिड गए और पराजित हुए। १२वे महाधिवेशन में सभापति के लिए उम्मेदवार बन कर भी हार गए। फिर वर्तमान सरकार के निर्माण के समय सहमतीय सरकार गठन के लिए प्रयास हुआ। कांग्रेस ने उन को ही नेतृत्व के लिए उम्मेदवार बनाया मगर वे सफल नहीं हुए। इन सारी घटनाओं को देखते हुए पार्टर्ीीे उन को अवसर बहुत दिया मगर वे लाभ नहीं उठा सके।
दूसरे नेता, संसदीय दल के भी नेता है, रामचन्द्र पौडेल। जिन में नेतृत्व क्षमता का विल्कुल अभाव है। पार्टर्ीीें कार्यकर्ता उनसे नाखुस रहते है और वे दूसरे को खुस करके काम कर नहीं पाते। कांग्रेस ने पौडेल को प्रधानमन्त्री के उम्मेदवार में इससे पहले मौका दिया था और १७ बार वे प्रधानमन्त्री निर्वाचन में पराजित हुए। इस को ऐतिहासिक हार कह सकते है। बार बार हारने वाले पौडेल अब भी मौका मिलते ही अब नयाँ बनने वाली सरकार का प्रधानमन्त्री मैं बनूंगा, ऐसा कहते रहते है।
पार्टर्ीीब इन नेताओं को आगे बढÞाती है, तब ये अपने प्रयास से, अपनी क्षमता से, विजयी नहीं हो पा रहे है। यह बहुत बढÞी समस्या है। इससे प्रजातन्त्र का मसीहा कहलाने वाला नेपाली कांग्रेस अब इतिहास में जाने के कगार पर है। दूसरी पीढÞी के नेता लोग अब कहने लगे है कि पार्टर्ीीो नेतृत्व का विकल्प ढूढÞना चाहिए। यह बात अब र्सार्वजनिक रुप से भी सामने आ रही है। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता अर्जुन नरसिंह केसी के अनुसार पार्टर्ीीा अस्तित्व अभी खतरे में है। इसलिए नेतृत्व परिवर्तन जरुरी है। पद में आसीन होने के बाद काम भी उस अनुरुप करना चाहिए। केन्द्रिय सदस्य महेन्द्र यादव का कहना है- नेतृत्व न खुद काम करता है, न नई पीढÞी को काम करने का मौका देता है। यही बात अधिकांश युवा केन्द्रीय सदस्य कहते है। जिम्मेवारी मिलने पर काम कर सकने की क्षमता वाले लोग कांग्रेस में हैं, मगर नेतृत्व के पास रणनीति और भिजन दोनों नहीं है। इसलिए नेतृत्व में जो बैठे हैं, वे पार्टर्ीीो इस अवस्था से ऊपर उठावें, अन्यथा जो सक्षम है, उन्हे काम करने का मौका दें।  ±±±

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