कांवर यात्राः शिव, श्रावण और भक्ति का अनोखा संगम

सकल मनोरथ पूर्ण करती है कांवर यात्रा । स्वयं जल हैं भगवान् शिव ।

विनोदकुमार विश्वकर्मा ‘विमल’
श्रावण का महीना भगवान शिव को ही समर्पित है । ‘शिव’ शब्द का प्रयोग कल्याण व शुभ के सन्दर्भ में होता है । शिव का रुद्र नाम भी बहुत प्रचलित है । इसके अलावा शिवजी को भव, शर्व, पशुपति, उग्र, महादेव और ईशान भी कहा जाता है । शिव पुराण में शिव के पाँच कार्य– सृष्टि, स्थिति, नाश, तिरोभाव और मोक्ष हैं । पंचमुख इसी कारण कहा जाता है ।
पौराणिक ग्रन्थों में भगवान् शंकर के साकार और निराकार दो रूपों का वर्णन मिलता है । उनकी प्रतिभा पर विचार करें तो ऐसे अनेक तथ्य दिखाई देते हैं, जिन पर ध्यान देकर शिव उपासक शिवत्व की और बढ़ सकता है । उत्कृष्ट चिन्तन और सही कर्तव्य में ही उपासना का रहस्य है । धर्मग्रन्थों में कहा गया है– ‘साधकानाम् हितार्थाय ब्राह्मणों रूप कल्पना ।’ अर्थात् ब्रह्मा तो निराकार है, लेकिन उनका ध्यान करने में सुविधा हो, इसलिए ब्रह्मा के साकार रुप की कल्पना गढ़ी गई । उस एक ब्रह्म को ही विद्वानों ने अनेक रूपों में वर्णित तथ्य चित्रित किया है ।
पुराणों के अनुसार, भगीरथ जब गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाए तो पहले भगवान् शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण कर लिया । वस्तुतः यह प्रतिकात्मक वर्णन है । शिव के मस्तक में गंगा का प्रवाहित होना उत्कृष्ट विचारधारा के प्रवाह को दर्शाता है । भगवान् शिव के ललाट पर चन्द्रमा सुशोभित है । चन्द्रमा मन का प्रतीक माना जाता है । अतः ललाट पर चन्द्रमा इस बात का प्रतीक है कि हम अपने मन–मस्तिष्क को शीतल रखें, तभी श्रेष्ठ विचारों का प्रभाव संभव हो सकेगा । shiv-1
शैव सम्प्रदाय में भगवान् शिव का प्रतिमाओं व शिवलिंग की पूजा होती है । वैष्णव सम्प्रदाय के लोग शिवलिंग को शालिग्राम के रूप में देखते हैं । शालिग्राम की सेवा का अर्थ है– पूरे विश्व की सेवा ही शिव अथवा विष्णु की सच्ची भक्ति ।
शिव पुराण के अनुसार, शिव के १२ ज्योतिर्लिंग है । मान्यता है कि इन स्थानों पर भगवान् शिव ज्योति रूप में प्रकट हुए और वे लिंग के रूप में विद्यमान हैं । ये सभी ज्योर्तिलिंग तीर्थ के रूप में माने जाते हें । जानें कौन से हैं द्वादश ज्योर्तिलिंग– १. सोमनाथ, २. मालिकार्जुन, ३. महाकालेश्वर, ४. ओंकारेश्वर, ५. केदारनाथ, ६. भीमेश्वर, ७. विश्वेश्वर, ८. त्र्यंवकेश्वर, ९. वैद्यनाथ, १०. नागेश्वरम, ११. रामेश्वरम, १२. धुष्मेश्वर । सोमनाथ गुजरात के सौराष्ठ में अवस्थित है । इस स्थान के बारे में मान्यता है कि यहाँ चन्द्रमा ने भगवान् शिव की तपस्या करके दक्ष प्रजापति के शाप से मुक्ति पाई थी । माल्लिकार्जुन आंध्रप्रदेश में श्रीशैल पर्वत पर अवस्थित है । इसे कार्तिकेय की तपस्थली माना जाता है । महाकालेश्वर मध्य प्रदेश के उज्जैन में अवस्थित है । इसे देवों की तपस्थली माना जाता है । ओंकारेश्वर मध्यप्रदेश में नर्मदा नदी के किनारे में अवस्थित है । मान्तयानुसार, यहाँ शिव ने विंध्याचल पवर्त का दुःख हरा था । केदारनाथ उत्तराखण्ड में अवस्थित है । यह स्थल नर–नारायण की तपस्थली है । भीमेश्वर महाराष्ट्र में अवस्थित है । इस स्थल के बारे में प्रचलित है कि यहाँ शिव ने भीमासुर का वध किया था । विश्वेश्वर वाराणसी में अवस्थित है । मान्यता है कि काशी शिव के त्रिशुल पर स्थित है ।
महाराष्ट्रस्थित त्र्यंबकेश्वर गौतम ऋषि की तपस्थली है । वैद्यनाथ झारखण्ड के देवधर में अवस्थित है । मान्यता है कि यहाँ रावण ने शिवलिंग स्थापित किया था । नागेश्वर गुजरात के द्वारका में अवस्थित है । शिव ने यहाँ दारुक को दण्ड दिया था । रामेश्वरम तमिलनाडू में अवस्थित है । इस जगह भगवान राम ने शिवोंपासना की थी । और धुष्मेश्वर महाराष्ट्र के औरंगावाद में अवस्थित है । यहाँ भगवान् शिव ने धुष्मा को सन्तान प्राप्ति का वरदान दिया था ।
भगवान् शिव को सभी देवों का देव माना जाता है । श्रावण में शिव का महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि विष्णु भगवान् इसी माह में शयन कक्ष में चले जाते हैं और शंकर भगवान् प्रधान देवता हो जाते हैं । सावन में भगवान् शिव का जलाभिषेक करने से चन्द्रमा शिव के साथ तृप्त होकर अमृत की वर्षा करते हैं । सावन में शिव पूजा का वर्णन शास्त्रों में किया गया है । विशेषकर अरेराज सोमेश्वर महादेव की स्थापना का सम्बन्ध चन्द्रमा से है । कहा जाता है कि सोमेश्वर महादेव का पूजन सावन में करना विशेष फलदायक होता है । निर्णय सिन्धु में वर्णित वाक्यों के अनुसार, धतुरे का फूल चढ़ाने का बहुत ही अतुलनीय महत्व है । साथ ही जो शिव भक्त गंगाजल, दूध, गन्ने का रस, शक्कर व पंचामृत से शंकरजी का अभिषेक करता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैैं ।
भगवान् शंकर की आराधना के लिए सावन मास सर्वाधिक उत्तम एवं अनुकूल समय है । शिव भक्त सोमबार को व्रत रखते हैं तथा शिव को जल एवं बेलपत्र चढ़ाकर पूजा अर्चना करते हैं । इस माह में शिव की आरती दीपक के स्थान पर जलते हुए कपूर से की जाती है । भक्त लोग श्रावण महात्म्य की कथा सुनते हैं और मनोकामना पूर्ति के लिए शिव का रुन्द्राभिषेक एवं शिव चर्चा आयोजित किए जाते हैं । सोमबार का व्रत स्त्री, पुरुष, कुंवारी कन्याएं सभी के लिए मान्य है । सावन मास की एक अन्य विशेषता है कि इस मास के व्रत एवं पर्व तथा सभी सोमबारों को शिव आराधना विधवा, सधवा महिलाएं एवं कुंवारी लड़कियां सभी समान रुप से करने की अधिकारी हैं ।
श्रावणी मेला में कांवर यात्रा की परम्परा सदियों पुरानी है । मान्यता है कि धर्मराज युधिष्ठिर ने कांवर में जल लेकर सभी धामों की यात्रा की थी । आनन्द रामायण के अनुसार राज्याभिषेक के कुछ दिनों बाद भगवान् राम, लक्ष्मण व सीता ने भी कांवर यात्रा कर वैधनाथ धाम में बाबा का जलाभिषेक किया था । कांवर यात्रा की परम्परा तेत्रा युग में भी थी । उस समय तीर्थस्थलों की यात्रा पुत्र अपने माता–पिता को कराते थे । श्रवण कुमार की कथा से यह स्पष्ट होता है । सावन के महीने में विशेषकर सोमबार को शिवलिंग पर जलार्पण करने की परम्परा रही है । इस मास में शिव को जल चढ़ाने से विशेष फल की प्राप्ति होती है । शिव पुराण में उल्लेखित है कि भगवान् शिव स्वयं जल हैं । इस कारण हर साल नेपाल और भारत के कोने–कोने से कांवरिये भारत के वैद्यनाथधाम जलाभिषेक करने के लिए पहुँचते हैं ।
इसी प्र्रकार काठमांडू में स्थित बाबा पशुपति पर भी जलार्पण करने की परम्परा चली आ रही है । बताया जाता है कि काठमांडू उपत्यका में आज से २०–२१ वर्ष पूर्व चावहिल निवासी छोटेलाल साह ने अपने कुछ मधेशी तथा पहाड़ी साथियों के साथ सुन्दरीजल से कांवर में जल लेकर बाबा पशुपतिनाथ पर जलाभिषेक करने की शुरुआत की थी । तभी से काठमांडू के सभी शिवालयों में जलाभिषेक करने की परम्परा प्रारम्भ हो गई । और धीरे–धीरे यह परम्परा हिमाल और पहाड़ में भी फैलती गई ।
वर्तमान में काठमांडू में बोलबम कांवरियां संघ, बोल बम संघ, कांवरिया संघ, भोलेनाथ कांवरिया संघ जैसे एक दर्जन से अधिक संस्थाओं द्वारा एक महीना पूर्व से बोलबम की तैयारियां की जाती हैं और नेपाल व भारत के कोने–कोने से लाखों कांवरिये इन संस्थाओं के द्वारा भगवान् पशुपतिनाथ पर जलाभिषेक के साथ–साथ बेलपत्र चढ़ाकर बाबा को प्रसन्न करते हैं । इस दिन कुछ शिव भक्त दूध अथवा जल से शिव का अध्र्य भरकर शिव का रुद्राभिषेक भी करवाते हैं ।
इसी अवसर पर ललितपुर जिला के पाटन में स्थित भृंगारेश्वर में सिद्धरस नदी के जल और सन्तानेश्वर महादेव में गोदावरी नदी के जल अभिषेक करने पहुँचते हैं हजारों बोलबम । वर्तमान में काठमांडू के खंजनेश्वर, ताम्रेश्वर, भक्तपुर जिला के डोलेश्वर और अनंतलिंगेश्वर, खोटांग जिला के हलेशी, धरान के पिण्डेश्वर, सप्तरी के शंभुनाथ, बलुवा महादेव, हरिनन्देश्वर तथा लालेश्वर महादेव सहित नेपाल के सभी शिवालयों में सावन मास का उत्सव देखने को मिलता है ।

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