काठमांडू और दिल्ली के बीच की तिक्तता में परेशान मधेशी

गोपाल ठाकुर,कचोर्वा-१, बारा,जनवारी २६, २०१६
वैसे तो राज्य की उत्पत्ति ही कमजोरों को दबाने के लिए हुई है । किंतु जब राज्य साम्राज्य का रूप लेता है तो विजित राष्ट्रों पर शोषण का दोतर्फा कहर ढाया जाता है । एक तो खूद अपने राष्ट्र के कृतघ्न लोगों से हमेशा धोखाधड़ी, फरेब और नाना भाँति जुल्म के सिकंजे शख्त किए जाते हैं तो विजेता सम्राट की ओर से विजित राष्ट्रों का नामोनिशान मिटाने के लिए हर संभव दुष्चक्र चलाया जाता है । s-1
गोर्खा राज्य विस्तार अभियान और बेलायती साम्राज्य विस्तार अभियान के तहत कुछ ऐसा ही हुआ । हम सहोदर मध्यदेशी तत्कालीन बेलायती और गोर्खा साम्राज्य के बीच बाँट दिए गए । बेलायती उपनिवेशकों से तो भारत आजाद हुआ और उसके तहत मध्यदेश का पूरा पूरा भारतीयकरण कर लिया गया । इधर गोर्खा साम्राज्य को नेपाल के नाम से आगे बढ़ाने का हर टिकड़म किया जा रहा तो है किंतु इसके अधीनस्थ मध्यदेश का नेपालीकरण करने का कोई प्रयास तो दूर, अभिशप्त रूप में मध्यदेशियों को मधेशी, मदिसे, मर्स्या, धोती के उपनाम से उपहास का पात्र बनाने का दुष्कर्म किया गया । इसके तहत मधेशी लोग शुरू में ये चाहते थे कि इन्हें भी नेपाली ही कहा जाए, किंतु ऐसा कभी नहीं प्रतीत हुआ । अतः मधेशियों के यह समझने में भी काफी देर लगी कि ये इस गोर्खा साम्राज्य के किसी भी राज्य संयंत्र का हिस्सा नहीं हो सकते । फलतः नेपाल नाम का एक देश का परिचय तो इन्हें मिला किंतु नेपाल राज्य की सार्वभौमिकता, अखण्डता या स्वाधीनता का उपभोग इनके लिए हमेशा दूरस्थ ही रहा ।
अंततः हम अपनी राष्ट्रीय पहचान की खोज में लगे और हम इसे ढूँढ ही निकाले । हमारा मधेश उस मध्यदेश का हिस्सा है जो कभी पूरब और पश्चिम में समूद्रों के बीच एवं उत्तर और दक्षिण में हिमालय और विंध्य के बीच अवस्थित हुआ करता था । इसलिए अब हम गर्व से कहते हैं हम मधेशी हैं, विदेशी भगौड़े नहीं, धरतीपुत्र हैं । राजनीतिक रूप में हम आधुनिक भारत ‌और नेपाल के बीच बँटे हुए तो हैं लेकिन सांस्कृतिक और वंशानुगत रूप में हम अपने को एक-दूसरे से जुदा नहीं मानते । हाँ गोर्खा साम्राज्य की ओर से समय समय पर हमे अपने भरतीय सहोदरों से जुदा करने का दुष्प्रयास जरूर किया जाता है । किंतु ऐसा न हों, इसके लिए उपनिवेश भारत की अंग्रेजी हुकूमत से लेकर अभी के लोकतांत्रिक भारत भी हमारी चिंता लिये जरूर दिखता है । ये फिरंगी गोर्खाली हमारे साथ भेदभाव या अनुचित व्यवहार जरूर करेंगे, इसी अंदेशा में १८१६ में भारत की अंग्रेजी हुकूमत ने Memorandum for Approval में गोर्खाली शसकों से ऐसी शर्तबंदी कराई थी जिसके तहत नेपाल के राजा ने यह माना था कि किसी भी मधेशी जनता पर गोर्खा-अंग्रेज युद्ध में अंग्रेजों को साथ देने के नाम पर वे किसी प्रकार की सजा देने का या भेदभाव करने से परहेज करेंगे ।
इन संधियों सहित पहले हुई सभी संधियों को खारिज करती हुई स्वाधीन भारत और गोर्खा साम्राज्य के साथ १९५० में आखिरी बार शांति ‌और मैत्री संधि हुई । इस संधि की धारा ७ के तहत नेपाल और भरत की सरकारें यह मानती हैं कि एक देश के नागरिक को दूसरे देश में बसने, संपत्ति का स्वामित्व लेने, व्यापार और वाणिज्य में हिस्सा लेने, सामान प्रकृति की सुविधा प्राप्ति की गतिविधि में शामिल होने का अधिकार है ।
भारत ने इस संधि की कहाँ, कब और किस तरह की अवज्ञा की है, नेपाल की ओर से कभी प्रमाण के साथ कहीं उठाने का प्रयास किया गया नहीं दिखता । इतना ही नहीं इस संधि की धारा १० का प्रयोग कर एक वर्ष की सूचना देकर इसे खारिज करने का भी नेपाल या भारत ने कभी प्रयास नहीं किया है । किंतु नेपाल में इस संधि को लेकर हमेशा खस-गोर्खाली शासकों का एक तप्का अंधराष्ट्रवाद का झंडा लहराते रहते हैं । अपनी कमजोरी को छुपाने के लिए ये हमेशा एक दूसरे के शर भारतपरस्ती का इलजाम मढ़ते चलते हैं । उदाहरण के रूप में सरकार और संसद में पहुँचने से पहले कांग्रेस, एमाले, एमाओवादी, रोहिते सभी के सभी इस संधि को असमान बताया । खासकर वामपंथियों को तो सरकार नशीब होने से पहले इस संधि का बिना विरोध किए खाना भी हजम होता नहीं देखा गया है । किंतु सरकार में पहुँचते पहुँते उनकी यह अड़ान हवा में छूमंतर हो जाती है । हाँ, इस संधि के बावजूद अब तक किसी भारतीय नागरिक को नेपाल की कोई भी सरकार भू-स्वामित्व मुहैया कराना मुनाशिब नहीं समझी है । इतना ही नहीं, १८१६ की संधि अनुसार के सीमांकन के बाद जो मध्यदेशी भारतीय हो गये और उनकी जमीन नेपाल में रह गई, उसका तो नेपाल सरकार ने हक तबादला भी नहीं करने दिया । इसके साथ साथ नेपाल में अंधराष्ट्रवाद का ढिंढोरा पीटता हुआ नेपाल के दक्षिण और वाम दोनों खेमे के कुछ अतिवादी लोग खुली सीमा को नेपाल की हर कंगाली के लिए कोसते रहते हैं ।
इसी बीच कुछ वर्ष पहले से सीमा व्यवस्थापन के नाम पर भारतीय नंबर प्लेट वाली की गाड़ियों के नेपाल प्रवेश में नेपाल सरकार ने कुछ अड़चने पैदा की है । इसके तहत नेपाल के सीमा शुल्क कार्यालय में प्रवेश दर्ज कराने के साथ साथ अग्रिम सीमाशुल्क भुग्तान करने के बाद ही भारतीय नंबर प्लेट वाली गाड़ियों को नेपाल प्रवेश करने दिया जाता है । यह अलग बात है कि अभी मधेश आंदोलन के कारण यह प्रावधान कार्यान्वयन में नहीं दिखता । किंतु इस प्रावधान से भारत के सीमावर्ती इलाके के मध्यदेशीय जन को नेपाल में अपने सगे संबंधियों से मिलने के लिए अपनी गाड़ियों का इस्तेमाल करने में काफी परेशानी झेलनी पड़ती ह
अब इधर भारत की ओर से भी इसी तरह का प्रावधान कार्यान्वयन में लाया गया है । इसके तहत नेपाल-भारत सीमा पर केवल २३ सीमाशुल्क कार्यालयों से प्रवेशाज्ञा लेने के बाद ही नेपाली नंबर प्लेट वाली गाड़ियाँ, वह भी केवल सीमा से ३ किलोमीटर तक के लिए, भारत प्रवेश कर सकती हैं । इससे अधिक दूरी के लिए नेपाल स्थित भारतीय महावाणिज्य दूतावास या भारतीय राजदूतावास से अनुमतीपत्र को अनिवार्य किया गया है ।
इस प्रकार काठमांडू और दिल्ली के बीच की असमझदारी से दोनों देश के सीमावर्ती इलाके के मध्यदेशीय सहोदरों के बीच ही परेशानी बढ़ी है । इसका अर्थ राजनीतिक प्रभाव दोनों ओर नकारात्मक ही होगा । अतः इस पर समय पर ही दोनों ओर से पुनर्विचार हो । क्योंकि सीमा व्यवस्थापन के नाम पर आम जनता अगर दोनों ओर परेशानी झेलती हैं तो ऐसे प्रावधानों से हमारे बीच के परापूर्व काल से चलता आ रहा अन्योन्याश्रित संबंध पर ही कुठाराघात होगा जो किसी के लिए भी सुखद अनुभूति नहीं होगी ।

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