काठमांडू– पर्यटक की दृष्टि से


देश की राजधानी होने पर भी काठमांडू से मेरा वास्ता २४ वर्ष की उम्र में उस वक्त हुआ जब मैं दिल्ली में सेवारत था और एक पर्यटक के रूप में काठमांडू आया था । काठमांडू की मेरी यह पहली यात्रा अपनी गृहनगरी राजविराज से विमान से हुई थी । प्रथम विमान यात्रा होने के कारण यह कई दृष्टि से स्मरणीय है । उन दिनों मैं छुट्टी पर घर आया था । महेन्द्र राजमार्ग के रूप में सुविख्यात पूर्व–पश्चिम राजमार्ग तैयार नहीं हुआ था । अतः पिताजी की सलाह पर यात्रा विमान से की । तत्कालीन शाही वायु सेवा निगम का ट्विन ऑटर विमान जब काठमांडू एयर पोर्ट पर उतरा तो आकाश काले नीले बादलों से ढका हुआ था । विमान से उतरने पर मैं कुछ देर भौंचक होकर चारों ओर देखता रहा । ऊपर काले–नीले बादलो से ढका आकाश और नीचे चारों ओर गाढ़े हरे–भरे पर्वतो से घिरा विमान स्थल का दृश्य मेरे सामने सम्मोहक वातावरण उत्पन्न कर रहे थे । मैं उस नैसर्गिक सुंदरता को विस्मित नजरों से कुछ देर निहारता रहा । वह अलौकिक प्राकृतिक छटा आज भी मेरी आँखों के सामने उभरती रहती है जब मैं विदेश यात्रा के लिए काठमांडू एयर पोर्ट, जो आजकल त्रिभुवन एयर पोर्ट के नाम से सुविदित है, पर पहुँचता हूँ । वहाँ से रामशाह पथ पर अवस्थित अपने फुफेरे भाई के निवास–स्थल पर पहँुचने पर भी पहाड़ाें की सुंदरता का अवलोकन घर के बराण्डे से होता रहा, क्योंकि उन दिनों काठमांडू में कंक्रिटों का जाल फैला नहीं था ।
काठमांडू एक देवभूमि है । यहाँ का हर कोना मठ, मंदिर और स्तूपों से भरे हैं । अतः मेरा पहला कार्यक्रम पर्यटक के रूप में नेपाल के आराध्य देव श्री पशुपतिनाथ के मंदिर में भोलबाबा का दर्शन करने का बना । वहाँ श्री पशुपतिनाथ का दर्शन अत्यंत सहज रूप से हुआ क्योंकि दर्शनार्थियों की भीड़ आज के समान नहीं थी । वहाँ से कुछ ही दूरी पर अवस्थित गुह्येश्वरी मंदिर पहुँचा । वह देवी सती के एक अंग–पतन की पावन गाथा प्रस्तुत करती है । यह एक शक्तिपीठ और नेपाल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में पूज्य है । किंवदंती के अनुसार पिता दक्ष प्रजापति के द्वारा जब देवी सती अपने पति महादेव की की गई निंदा को सहन न कर सकीं तब वह उस अग्निकुंड में कूद पड़ीं, जहाँ दक्ष प्रजापति के द्वारा होम का आयोजन किया जा रहा था । अपनी पत्नी के दहन का समाचार पाकर शोकाकुल महादेव जब घटनास्थल पर पहुँचे तब वह देवी सती के जले शरीर को देखकर विचलित हुए और उनके जले शरीर को कंधे पर उठाकर इधर–उधर भटकते रहे । इस प्रक्रिया में देवी सती के शरीर के जले हुए अंग विभिन्न भागों में गिरने लगे । जहाँ–जहाँ वे अंग गिरे वे स्थल शक्तिपीठ के रूप में आजपर्यंत पूज्य है । किंवदंती के अनुसार देवी सती का गुह्य भाग काठमांडू के इसी स्थल पर गिरा था,जहाँ गुह्ेश्वरी मंदिर का निर्माण हुआ है । अतः गुह्येश्वरी का मंदिर इन्हीं शक्तिपीठों में एक माना जाता है । माना जाता है कि शरीर के किसी भी अंग, विशेषतः गुप्तांग के रोग से पीडि़तयक्ति यदि गुह्येश्वरी का दर्शन और वहाँ पाठ कराता है तो उसे उस रोग से मुक्ति मिल जाती है । अतः इसे पूजनीय मानकर सुबह से शाम तक यहाँ दर्शनार्थी एवं भक्तजन देवी की पूजा करने और उनके सम्मुख सिर नवाने आते हैं ।
गजूरनुमा मंदिर के प्रांगण में प्रवेश करने पर पावन वातावरण को शिरोपर करते हुए मैं सीढी होते हुए नीचे उस स्थल पर पहुँचा, जहाँ देवी सती की स्मृति में एक संकरे मुँह का गहरा जलकुंड विद्यमान है, जहाँ नतमस्तक होकर उसके जल सिर में सेचन (अभिषेक)कर और वेदी पर सिर नवाकर मैं बाहर निकला । नेपाली समय के अनुसार भोजन का समय हो चुका था । अतः बुआ सुभद्रा देवी के साथ निवास स्थान लौट आया और भोजनादि के बाद विश्राम करता रहा ।
तीसरे दिन मुझे वह एक अन्य पावन तीर्थ स्थल दक्षिणकाली मंदिर ले गईं । राजधानी से लगभग ज्ञड–ज्ञढ कि.मी. दूर अवस्थित इस तीर्थ स्थल की यात्रा देवी दक्षिणकाली के अतिरिक्त अन्य विभिन्न देवी–देवताओं की प्रतिमा में सिर नवाने का सौभाग्य प्राप्त होने के कारण स्मरणीय रहा । कुछ सारंगीबादकों के द्वारा अपने–अपने सारंगी से निकाले जा रहे सारंगी के धुन वातावरण में संगीतरस घोल रहे थे । वहाँ की प्राकृतिक सुंदरता भी आँखो में समा गई ।
मंदिर की परिक्रमा पूरी कर भोजन करने के बाद लौटने का कार्यक्रम बना । राजधानी से ज्ञड–ज्ञढकि.मी. दूरी बस से यात्रा करते हुए लौटते–लौटते शाम ढलने लग गई थी । धार्मिक स्थलों का भ्रमण और सुहावना मौसम मुझमे एक उत्साह और हर्ष का संचार कर रहे थे ।
काठमांडू घूमने का अगला कार्यक्रम यहाँ के आकर्षण का प्रमुखयावसायिक केंद्र असन, इन्द्रचौक और नयाँ सड़क की सैर और सौगात की खरीदारी की बनी । ये सारे स्थल भी देवी–देवताओं के मंदिरों से भरे हैं । असन में दक्षिण दिशा की ओर पेगौड़ा शैली का अन्नपूर्णा देवी का भव्य मंदिर और उत्तर दिशा में गणेश का मंदिर वातावरण में एक ओर पावनता का संचार कर रहे थे तो दूसरी ओर ग्राहक लोग वहाँ अवस्थित दूकानों से अपनी आवश्यकता की सामग्रियाँ खरीद रहे थे । उन दिनों मॉल संस्कृति की शुरुवात नहीं हुई थी । इन्द्रचौक होते हुए हम बसन्तपुर दरबार क्षेत्र में पहुँचे जहाँ आकाश भैरव का विशाल मंदिर अपने सुंदर वास्तुशिल्प के कारण गर्वोन्मत्त होते हुए पावनता का संचार कर रहा था । वहाँ का दृश्य भी असन से पृथक नहीं लगा । चौक के समीप ही निर्मित काल भैरव का एक वृहताकार की मूर्ति सभी पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर खींचती है । काल भैरव को महादेव का ही प्रतिरूप माना जाता है । इसे न्यायमूर्ति के रूप में भी मान्यता मिली है । इसकी स्थापना मल्लकालीन शासक प्रताप मल्ल ने कराई थी । किंवदंती के अनुसार काठमांडू में मल्लकालीन शासन के दिनों में अपराधियों को इस स्थल पर लाकर उनके अपराधों की छानबीन की जाती थी । कहा जाता है कि जो अपराधी निकलता था वह रक्त की उल्टी करता और उसकी तुरंत मृत्य हो जाती थी । पर जो निर्दोष होता वह सकुशल घर लौट जाता । इस न्यायमूर्ति के सामने सिर नवाते हुए हम आगे बढ़े । बगल में एक टीले पर तलेजु भवानी का मंदिर और दूसरी ओर शिव मंदिर की सुंदरता भी अवर्णनीय है । तलेजु भवानी को मल्ल शासकों की इष्ट देवी माना जाता है । इसका निर्माण महेन्द्र मल्ल ने कराई थी । बाहर से ही देवी के प्रति नतमस्तक होते हुए हम लोग उस क्षेत्र की ओर बढ़े जो धार्मिक पर्यटन के अतिरिक्त राजनीतिक गतिविधियों का भी प्रमुख केंद्र रहा है । वसंतपुर दरबार नामक इस स्थल पर बजरंगबली हनुमान की विशाल मूर्ति पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करता है । अतः इस क्षेत्र को हनुमान ढोका के नाम से जाना जाता है । ढोका का मतलब द्वार होता है । इस द्वार से होकर हम उस प्रांगण में प्रवेश करते हैं, जहाँ नसल चौक है । इसी चौक में नेपाल के राजा सिंहासनारुढ होते रहे । अब तो यह इतिहास का एक अंग मात्र रह गया है । यहीं से हम उस नौ मंजिला महल में प्रवेश करते हैं, जो नौ तल्ले दरबार के नाम से प्रसिद्घ है और जहाँ नेपाल के शासकों की शानोशौकत से भरी जीवन शैली का दृश्य देखने को मिलता है । वहाँ बनाए गए संग्रहालय में उनके जीवन से संबंधित विभिन्न सामग्रियाँ रखी गई हैं । वहाँ से निकलने पर बगल में ही अवस्थित जीवंत देवी, जो कुमारी के नाम से प्रसिद्घ हैं, का मंदिर है, जहाँ उनका निवास भी है । जयप्रकाश मल्ल के द्वारा बनवाई गई इस मंदिर के दरवाजे और खड़कियों की काष्ठकला और वास्तुकला मल्लकालीन शासकों की कलाप्रियता की एक झाँकी प्रस्तुत करती है । इन्द्र जात्रा के अवसर पर भाद्र महीने में कुमारी की रथ यात्रा निकाली जाती है जो देखने योग्य होती है । इस प्रथम यात्रा काल में तो नहीं पर कालांतर में इस पंक्तिकार को कुमारी का निकट से दर्शन पाने और उनके हाथों टीका (तिलक) प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था । इसके बाद हम काष्ठमण्डप देखने गए जो इस क्षेत्र का एक प्रसिद्घ स्थल है । इसके संबंध में यह किंवदंती है कि इस तीन मंजिले मण्डप का निर्माण साल (शिशम) के एक ही बड़े पेड़ से ही किया गया है । चूँकि इस मण्डप का निर्माण लकड़ी से की गई है अतः इसका नाम काष्ठमण्डप पड़ा । इस मण्डप के अंदर भी विभिन्न देवी–देवताओं की मूर्तियाँ रखी गई हैं अतः इसे भी मंदिर की मान्यता दी गई है और यहाँ पूजा करने वालों का आवागमन होता रहता है । पर यह ऐतिहासिक भवन विगत भूकंप में धाराशयी होकर अब इतिहास के गर्भ में विलीन हो चला । इसके अतिरिक्त इस स्थल पर विद्यमान विभिन्न देवदेवियों के मंदिरों को इस स्थल की शोभा बढ़ाते हुए देखा गया पर समयाभाव के कारण उन सभी का अवलोकन नहीं हो पाया ।
मैं कुछ दिनों की यात्रा पर ही काठमांडू आया था और अपनी नौकरी के सिलसिले में दिल्ली लौटने की भी जल्दी थी । अतः पाँचवें दिन गृह नगर लौट गया ।
विभिन्न मंदिरों से भरे इस क्षेत्र का एक कोना जहाँ एक ओर नेपाल के प्रथम शहीदों में एक गंगा लाल के घर की ओर संकेत करता है तो वहीं दूसरी ओर कोत नामक उस ऐतिहासिक स्थल की ओर भी ईंगित करता है जहाँ की खूनी घटना ने नेपाल के इतिहास में जंगबहादुर का उदय कराया और राणा शासन की नींव पड़ी । काठमांडू जात्राओं के लिए भी प्रसिद्घ है । गाईजात्रा, इन्द्रजात्रा, घोड़ेजात्रा जैसी जात्राएँ यहाँ के लोगों की धार्मिक आस्थाएँ और सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक हैं ।
काठमांडू को अच्छी तरह देखने के लिए कम से कम ८–१० दिन की यात्रा करनी चाहिए । राजधानी होने के कारण विभिन्न राजनीतिक घटनाओं, किंवदंतियों और तंत्र–मंत्र की गाथाओं से युक्त काठमांडू उपत्यका का इतिहास विभिन्न वर्ग के पर्यटकों के लिए अत्यंत रोमांचकारी सामग्रियों से भरा है । विभिन्न बजट के पर्यटकों के ठहरने के लिए यहाँ धर्मशाला से लेकर गेष्ट हाउस और साधारण से लेकर पाँच तारे होटल तक विद्यमान हैं । विदेशी पर्यटकों के लिए तो ठमेल ऐसा क्षेत्र है जहाँ उन्हें अपनी इच्छा की हर सुविधा मिलती है । यह काठमांडू का ऐसा क्षेत्र है जो मध्य रात में भी जीवंत रहता है । अतः परिवहन की कोई समस्या नहीं होती । वर्षा ऋतु के अलावा हर मौसम यहाँ की यात्रा के लिए उपयुक्त है ।

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