कात्यायनी और कविता : डा.श्वेता दीप्ति

डा.श्वेता दीप्ति, काठमांडू |  नेपाल यात्रा में आईं हुई कात्यायनी जी से मिलने का सुअवसर प्राप्त हुआ । ९ मई १९५९ को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में जन्मी कात्यायनी आज की शीर्षस्थ हिंदी कवयित्रियों में एक हैं । एक शालीन और प्रखर व्यक्तित्व है आपका । आप की कविताएँ मुख्य रूप से नारी विमर्श की कविताएँ हैं । समय को सम्बोधित आपकी कविताओं का हिन्दी साहित्य जगत की नई कविताओं में महत्तवपूर्ण स्थान है । राजनीति, कला, साहित्य और संस्कृति में आपकी सक्रियता बनी हुई है । विद्यार्थी जीवन से ही आप क्रांतिकारी वाम राजनीति में क्रियाशील हैं ।

नेपाल भ्रमण के दौरान आपका यहाँ की राजनीति, कला, साहित्य आदि से आबद्ध व्यक्तियों के साथ संवाद स्थापित करना है । आपकी कविता नारी विमर्श÷स्त्री विमर्श का दस्तावेज हैं साथ ही स्त्रियों की राजनीतिक, सामाजिक एवम् शैक्षिक समानता का आंदोलन भी हैं । जिसकी जड़े १८ वी शती के मानवतावाद और औद्योगिक क्रांति में थी । आज भी नारी के हालात में कुछ खास बदलाव नहीं आया है जिसका रोष आपकी कविताओं में दिखता है । साथ ही समाज, देश की व्यवस्था के प्रति आक्रोश भी आपकी कविताओं का विषय रहा है । रोष उन्हें आज के कवियों से भी है, इसलिए आपका मानना है कि—हर मार्मिक घटना पर कविता लिखने वाला कवि दुनिया का सबसे हृदयहीन व्यक्ति होता है । कभी–कभी कविताएं न लिखना पाखंडी और वाचाल होने से बचाता है । कविताएं न लिखना कभी–कभी दुश्चरित्र होने से रोकता है । कभी–कभी संपादक की मांग पर कविता लिखने और सुपारी लेने के बीच कोई बुनियादी फर्क नहीं रह जाता । कविताएं न लिखने का निर्णय कभी कभी भाड़े के हत्यारों, दरबारियों, भड़ुओं और मीरासियों के झुंड में शामिल होने से बचने का निर्णय होता है । “जब एक उत्कृष्ट कविता लिखने का समय था, उसे हारे हुए समय में भी लिख रहे थे दीवारों पर तारे । जब लिखनी थी अपने समय की सर्वाधिक चर्चित कहानी लिख रहे थे हड़ताल का पर्चा सामान्य ही रहे अंत तक । यूँ हुए असफल ।’’ आपकी कविताओं की महत्ता इस बात से भी सिद्ध होती है कि आपकी शोक गीत’ कविता को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है । ‘शोकगीत’ मूल रूप में जीवन की विडम्बनाओं, जीवन के संघर्ष, आशा–निराशा और इसके (जीवन) आस–पास के परिवेश में बढ़ रही मूल्यहीनता, अवसरवादिता, स्वार्थपरकता, दोहरे व्यक्तित्व इत्यादि की कलई खोलते हुए इस कठिन समय में जी रहे सामान्य व्यक्ति के असामान्य संघर्ष को सामने लाती है । यहाँ शोक जीवन से नही, इस जीवन की विडंबनाओं का है ।

कात्यायनी जी लिखती हैं कि — बस यूँ ही गुजार दी जिंदगी नहीं रच सके कोई ‘एपिक’ (महाकाव्य) न हो सके पाठकों के आँखे के तारे न किसी आलोचक श्रेष्ठ के दुलारे अपुन तो बस यूँ ही गुजार दी पूरी जिंदगी’’ कवयित्री स्वयं को आज के समाज और अवसरवादी माहोल में शायद ढाल नहीं पाती हैं और इस बात को ही उपरोक्त पंकितयों में जताना चाह रही हैं । एक कटाक्ष है आपकी पंक्तियों में और विद्रोह भी आज के कथित साहित्य और साहित्यिक माहोल को लेकर । बाजारवाद जिस तरह साहित्य को और साहित्यिक मंच को प्रभावित किए हुए है वहाँ चापलूसी और अवसरवादियों की भीड़ ही नजर आती है । जिनका आप खुलकर विरोध करती हैं । आपके प्रमुख काव्य संग्रह हैं । १. सात भाइयों के बीच चम्पा १९९४ २. इस पौरूषपूर्ण समय में १९९४ ३. जादू नहीं कविता २००२ ४. रात के संतरी की कविता । ५. चाहत ६. कविता की जगह । ७. आखेट । ८. कुहेर की दीवार खड़ी है । इनके अतिरिक्त रूसी और अंग्रेजी भाषा में आपकी कविताओं का अनुवाद हुआ है । नारी प्रश्न संबंधित आपके लेखों का संग्रह दुर्ग द्वार पर दस्तक’ नाम से प्रकाशित हो चुका है ।

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