काम के बदले अनाज, बद्तर आर्थिक स्थिति या काम के महत्व को न समझना ?

मालिनी मिश्र,कामठमाण्डू, २९ जुलाई ।
 सोलुखुम्बू के सोतांग इलाके में अभी भी विनिमय प्रथा के समान वस्तु के स्थान पर वस्तु न होकर मेहनत के स्थान पर अनाज देने का चलन है ।
सूत्रों के अनुसार सोतांग १ २ व ३ क्षेत्र में पीने के पानी वितरण करने वाले कर्मचारियों को काम के एवज में मकई दे रहे हैं । पानी जैसे अनिवार्य आवश्यकता को ये कर्मचारी सुबह व शाम २– २ घण्टे वितरण व इस के साथ ही नलों व पाइपों में आपूर्ति की समस्या का समाधान भी करते हैं । लगभग ३०० घरों में पानी पहुँचाना इनका काम है यदि ये २ कर्मचारी ये सेवा न करें तो लोगों को २ घण्टे रोज चलकर जाना पडेगा व पीने का पानी ढोकर लाना पडेगा ।
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 पानी के अभाव की पूर्ति के लिए अनाज देकर कर्मचारियों को रखा गया है । एक नल से आये पानी का प्रयोग लगभग १५ घरों द्वारा किया जाता है । कई वर्षों से इस  काम के लिए यही २ कर्मचारी,   दिए गये अनाज के बल पर ही कर रहे हैं । पानी की सुविधा न होने से लोगों को रोज मशक्कत करनी पडती है । पर इन कर्मचारियों को काम के एवज में अभी भी सिर्फ अनाज का देना क्या इनके काम को महत्व न देना है या आर्थिक स्थिति का बद् से बदतर होना है  ?
इस इलाके में ही ये स्थिति नही है वरन् प्रायः नेपाल के अत्यधिक पहाड़ी इलाकों में ऐसी समस्या देखने को मिल जाएगी । कई वर्षों से इनकी समस्या जहां की तहां ही है पर सरकार व एनजीओ या कहें तो सामाजिक संस्थाएं इन लोगों के लिए कुछ भी नही करती है ।
 लोगों को सिर्फ मुद्दा चाहिए राजनीति के लिए पर वास्तविक समस्याएं तों अभी भी वहीं हैं । पानी के लिए जो कि वहां प्राकृतिक  स्त्रोत साधन जैसे छोटी नदी, तालाब आदि से किसी तरह प्रयोग में लाये जाते हैं तब भी लोगों को काफी समस्याएं झेलनी पडती है तो बाकी सामानों को लाने के लिए ये क्या करते होंगे ? शायद हम इनकी कठिन जिन्दगी का अंदाजा भी नहीं लगा सकते हैं ।
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