कायरों का कोई देश नहीं, गुलामों का प्रदेश नहीं….

कैलाश महतो , पराशी, २४ जुलाई |
अभी हाल फिलहाल ही, कुछ महीने पहले की ही ताजा खबर है कि बर्मा के मूल बासी एवं आदिवासी रहे रोहिंग्या समुदाय, जिनकी कभी अपनी प्रतिष्ठापूर्ण शासन व्यवस्था रहा, अपनी परम्परा, अपना गौरवशाली इतिहास रहा, अपनी भाषा तथा संस्कृति एवं उच्च जीवन शैली रही, आज वे जमिनी शरण के लिए दर दर भटक रहे हैं । अपने ही पूर्खों की गौरवशाली देश तथा इतिहास के कभी मालिक रहे रोहिंग्या समुदाय के लाखों के संख्या में रहे वे लोग अपने जल, जमिन और जंगलों के साथ साथ उनके राजनीति, शासन, प्रशासन, भेष–भूषा, भाषा, संस्कृति, परम्परा, पहचान आदि सारे के सारे अस्तित्व मिटा देने बाले बाहरी फिरंयों ने उन्हें उनके ही देश से लात मारकर भगा देने के बाद आज बस कुछ हजार के संख्या मे ही बाँकी रहे वे लोग कई महीनों से नाँव के सहारे समुद में रहकर जिने का बाध्य है समुदी चीजें खाकर, और जब वे जमिनी शरण के लिए समुद से सटे हुए देश मलेशिया, अष्ट्रेलिया लगायत के देशों में घुसना चाहते हैं तो वहाँ की सरकारें उन्हें खदेड कर भगा देती है संभतः ये सोंचकर कि वे सब कायर हैं । और वास्तविकता भी यही है कि दुनियाँ कायरों का नहीं, अपितु बहादुरों का है । बाँकी देशों के लिए उन्हें पनाह देना समस्या ही उत्पन्न करना समझते हैं जानकर कि जो समुदाय अपने मिटटी एवं वतन के लिए नहीं लड सके, वे उनके देशों में सर दर्द के सिवाय और क्या हो सकता ?
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हम भुटानी शरणार्थीयों को ही लें । वे लडना छोडकर भुटान से भागकर नेपाली उपनिवेश के हमारे मधेश में आ गये और आज सिर्फ भुटान ही नहीं, बल्कि वहाँ से रास्ता देकर नेपाल के औपनिवेशिक मधेश में आने देने बाला भारत भी आज उन्हें अपने घर लौटने के लिए रास्ता नहीं दे रही है, न तो भुटान ही उन्हें स्वीकार करने के अवस्था में है, भले ही नेपाल और भुटान के बीच दर्जनों सम्झौते हो गये हों ।
आज सिर्फ मधेश ही नहीं, अपितु सारे के सारे मधेशियों की धर्म, कर्म, भाषा, संस्कृति, पहचान, सम्मान, अवसर, राजनीति, समाजनीति, अर्थनीति, मधेशनीति आदि सब के सब दिन प्रतिदिन महासंकट के अवस्था में जाते जा रहे हैं और कुछ लोभी, पापी, अदुरदर्शी, स्व–स्वार्थी दलाल मधेशी इन बातों से या तो बेखबर या जानकर भी उन दरिन्दे नेपालियों के साथ मिलकर कुछ अपने निजी तथा कालान्तर में उन्हीं पहाडी नेपालियों के फायदे के लिए दलाली, तस्करी, पुलिस एवं प्रशासन की गुलामी तथा चम्चागिरी आदि करने में गर्व महशुश करते हैं जो बेहद शमनार्क बात है । वे किसी जात के नाम पर या धर्म के दम्भ में अन्धे होकर अपने ही मधेशी वर्ग और समुदाय को परेशान करने, बेइज्जत करने, प्रताडना देने जैसे कार्य करने में अपने को दादा और बहादुर समझते हंै । मगर वो एक जालिम नेपाली सिपाही, प्रशासक या उसके अस्तित्व के धोखेबाज नेपाली किसी नेता से समान्य जान पहचान बना लेता है तो अपने को बहुत बडा पावरफुल समझने लगता है । अपने लोगों को तिरस्कार तथा उनकी वो गुलामी करने में ही अपने को बडा समझने लगता है । मधेशियों का जमीन खोज खोज कर प्लटिंग कर२करवाकर पहाडियों के हाथ चन्द कमिशनों के चक्कर में बेचने और बेचबाने में लगे हैं ।
हम जरा विचार करें कि समाजवाद और साम्यवाद का दुहाई देने बाली पार्टीयाँ आखिर मधेशियों के साथ नश्ल तथा रंगभेद की नीति क्यूँ अख्तियार करती है ?, प्रचण्ड जैसे प्रगतिशिल तथा क्रान्तिकारी युग की वकालत करने बाले नेता भी मधेशियों से किये गये वादों से क्यूँ मुकर जाते हैं ? मधेश आन्दोलनों से उठे मुद्दों को पूरा करने की ग्यारेण्टीपूर्ण तथा हस्ताक्षरित बूँदों को लात मारकर मधेशियों के साथ नाइन्साफी करने की कारण क्या हो सकता है ?, बैशाख १२ और २९ गते के दिन महाप्रलयकारी भू–कम्प तथा पहाडों में होन बाले भू–स्खलन को महीनों तक बारम्बार समाचार क्यूँ बनाये जाते हैं ?, लेकिन हरेक साल मधेश में हो रहे पाकृतिक एवं मानवीय आपदायें जैसेः बाढों का कहर, गाँव बस्तियों की डुवान, कोशी पीडितों की दुर्दशा, हजारों अग्नि पीडितों की रोदन एवं लाखों एकड सुक्खा खेती योग्य जमिनों का समाचार क्यों नहीं बनता ? मधेश के ही पहाडी और मधेशी बस्तियों के विकास के मापदण्ड में फरक क्यों होता है ?, एक ही मधेशी जिले में विकास योजना के लिए नेपाली बस्तियों के हरेक व्यक्ति पर रु. ४,००० और मधेशी बस्तियों में प्रति व्यक्ति रु. २,००० से भी कम क्यों विनियोजन किया जाता है ? भारतीय बाजारों से पहाडी लोग गाडी के गाडी सामान ढोये तो सीमा सुरक्षा के नामपर मधेशियों पर अत्याचार करने बाले सशस्त्र पुलिस समान्य औपचारिकता के साथ उन्हें सामान लाने लेजाने में सहयोग करते हैं, लेकिन पोलिथिन के झोले में भी पचास या सौ रुपये की सामान लाने बाले मधेशियों के साथ बद्तमिजी और विभेद क्यों ? ३३,००० हजार शसस्त्र प्रहरीयों में से मधेश में ही २३,००० हजार की पदबहाली क्यूँ ? मधेश में पूनः २०० शसस्त्र प्रहरी की ब्यारेक थप करने की मन्त्रीपरिषद् की निर्णय क्यूँ ? सीमा सुरक्षा के लिए परिचालित प्रहरीयों को जहाँ और जिस किसीको भी चेकजाँच करने, गिरफ्तार करने तथा गोली तक मारने के लिए सरकार से अनुमति क्यूँ ?
इन नेपालियों की नियतखोरी इतनी बढती जा रही है कि अगर इन्हें अभी भी रोका न गया तो कुछ ही वर्षों में मधेशियों के पास बाँकी रहे सिर्फ २८ पतिशत जमीन भी कब्जा कर मधेशियों को कंगाल बनाकर थारु, सन्थाल और राजवंशी मधेशियों के जैसे ही गुलाम, कमैया और कमलरी में तब्दिल कर देंगे ।ये सिर्फ दुसरों की सम्पत्ति लुटना जानते हैं, सम्झौता करना जानते हैं, संविधान बनाना जानते हैं, मानव अधिकार का बात करना जानते हैं, नियम कानुन की दुहाई देना जानते है, अन्तर्राष्ट्रिय कानुन की समीक्षा करना जानते हैं । मगर जब कोई मधेशी अपने अधिकार का बात करे, कोई जनजाति समानता की बात करे, कोई मुस्लिम अगर समावेशिता की बात निकाले, कोई दलित राज्य में अपनी सुगम पहुँच के लिए बिन्ती करे, कोई आदिवासी अगर संघीयता की ग्यारेण्टी के लिए आवाज उठाये, यदि कोई उपेक्षित आत्मनिर्णय के अधिकार के लिए फरियाद करे तो वे सबके सब देशद्रोही, राष्ट्रदोही, विखण्डनकारी तथा आत्तायी होते हैं इनके भाषा में । तब ये देश पे्रम की बात करेंगे, राष्ट्र भक्ति का नारा बुलन्द करेंगे, राष्ट्रियता तथा राष्ट्रवादिता की इनपे भूत सवार हो जाता है, मानो इनका देश किसी ब्रम्हा ने बना दिया हो, इनका राष्ट्र किसी परमात्मा ने छुट्टा कर दिया हो और ये लिखित कर दिया हो कि तुम नेपाली मधेशी तथा पहाड के आदिवासी जनजातियों पर चाहे जितना सितम ढालो, कुचल डालो, मार डालो, लुट डालो, मिटा डालो, सब जायज है, क्यूँकी यह देश तुमने खरीदा हुआ है, तुम्हारे पुर्खों ने तुम्हें बिरासत में दी है । लेकिन सारे के सारे नेपाली भी अत्याचारी नहीं है, न हो सकते हैं ।
इन्होंने अपने हाथों से अन्तरिम संविधान के धारा ८२ और १३८ में क्रमश स्पष्ट किया है, “संविधानसभाले पारित गरेको संविधान प्रारम्भ भएको दिनदेखि संविधानसभाको काम समाप्त हुनेछ” और “नेपाल संघीय लोकतान्त्रिक गणतनत्रात्मक राज्य हुनेछ । प्रदेशहरु स्वायत्त र अधिकारसम्पन्न हुनेछन् । प्रदेशहरुको सीमा, नाम, संख्या र संरचनाका अतिरिक्त केन्द्र र प्रदेशहरुका सूचीहरुको पूर्ण विवरण, साधन श्रोत र अधिकारको बाँडफाँड संविधानसभाबाट निर्धारण गरिनेछ ।”
वैसे ही अन्तरिम संविधान के भाग २ के धारा नं. ८ के नागरिकता सम्बन्धि अधिकारों को १६ बुँदे सहमति तथा संविधान का पहला मस्यौदा में ही कुण्ठित कर मधेशियों को अनागरिक बनाने की षड्यन्त्रमूलक अभ्यास जारी की गयी है, जिसका कुछ मधेशी दल, मधेशी नागरिक समाज एवं आम मधेशियों के द्वारा जब विरोध शुरु हुआ है तो ये कौवे नेपाली शासक छलफल के रास्ते खुला रखने की बात कहना शुरु किया है । अब विचारणीय बात यह आती है कि क्या ये नेपाली शासक लोग मधेशी किसी पार्टी, नेता या आम मधेशी जनता के भावनाओं को कोई अहमियत देते हैं ? क्या संविधान में किटान की गयी बातें उनके लिए कोई मायने रखती है ? मान लिया जाय मधेश के विरोध को देखते हुए अभी संविधान में अन्तरिम संविधान के भावना अनुसार ही मधेशियों को प्रान्त और स्वायत्तता मिल ही जाती है तो उस संविधान के अनुसार मधेशी अपने अधिकारों को प्रयोग करने लगेंगे, इसका कोई ग्यारेण्टी है ? मधेशीयों को नेपाली सेना में उसके जनसंख्या के आधार पर भर्ती होने की प्रमाणिक कोई आधार है ?, विदेश तथा आर्थिक नीतियों में मधेशीयों को भी सहभागी करने२ करबाने की जिम्मेबारी कोई मधेशी दल या नेता ले सकता है ?, क्या मधेश के प्रान्तीय सरकार के अधिकार में अपने मधेशियों को नागरिकता देने का ताकत रहेगा ? नहीं, कतई नहीं । क्यूँकी दुनियाँ की किसी भी प्रान्तिय सरकार को सुरक्षा नीति, विदेश नीति, अर्थ नीति तथा नागरिकता नीति की अधिकार नहीं होती है । वे सारे के सारे अधिकार केन्द्रिय सरकार में निहित रहेगी जहाँ पर मधेशियों की कभी अपने अधिकारों को प्रयोग करने के लिए समान्य बहुमत भी नहीं पहुँचेगी और संविधान में लिखे हुए बातों को भी आज के तरह ही ये फिरंगी नेपाली शासक लोग कार्यान्वयन नहीं होने देने का मजबुत सम्भावना है और रहेगी । तब मधेशियों को हमारे मधेशी नेता लोग फिर से कहेंगे लडो, मरो, मारो और हमें हरेक इण्टरभल में नेतागिरी करने को मौका देते रहना, हमारे बार्गेनिङ्ग पावर को समय समय पर बढाते रहना और हमें नेपालियों के बीच सत्ता, शराब और शबाब के रंगीन दुनियाँ में पहुँचाते रहना, और नेपाली तथा हम मधेशी नेता दोनों की गुलामी करते शदियों तक करते रहना ।
नेपाली और मौजुदा मधेशी नेताओं से हम मधेशियों को होशियार इसलिए भी होना अनिवार्य है, क्यूँकि डा. बाबुराम भट्टराई के सरकार में सूचना तथा संचार मंत्री रहे राजकिशोर यादव के हस्ताक्षर से मधेशी पत्रकारों के लगातार के १४ दिन के अनसनों से सिरहा में स्व. गजेन्द्र नारायण सिंह के नाम पर गजेन्द्र पत्रकारिता प्रतिष्ठान खोलने के निर्णय को उल्टाकर सुशिल कोइराला के सरकार ने कृष्ण प्रसाद भट्टराई के नाम से खोलने का निर्णय किया है ।
अभी मधेश के स्वराजी आन्दोलन को कमजोर करने के लक्ष्य सहित मधेश में १० स्मार्ट शहर बनाने, हुलकिया सडक निर्माण करने, मधेश के आर्थिक शहरों के सडकों को चौडा करने आदि का घोषणा नेपाली बजेट ने किया है । सबसे पहले तो मधेश विकास का वादा सिर्फ कागज के पन्नों पर सीमित रहेंगे, और खुदा न खास्ता अगर वैसा हो भी जाता है तो मधेशियों को खुश होने की कोई बात नहीं है, क्यूँकि ये फिरङ्गी सरकार मधेश के गल्ली गल्ली और चौक चौराहे, हर जगहों पर नेपाली अत्याचारी पुलिस, प्रशासन, कर्मचारी तथा दारु२शराब एवं मधेश के संस्कृति विरुद्घ के फैशनदायक भडकिले महंगे कपडे एवं लिवास के व्यापार करने के लिए अपने व्यापारियों को लाकर मधेश के हर चौक तथा बजारों में बैठाया जायेगा । कुछ दिनों तक दो चार मधेशी दलालों को साथ में रखेंगे, उनके सहयोग से ही मधेशी लोगों को नेपाली पुलिस, प्रशासन, कर्मचारी तथा व्यापारी तंग करेंगे, परेशान करेंगे, खेत खरीदेंगे, घडारी किनेंगे, घर तथा महल बनायेंगे और जब उनकी संख्या पहुँच जायेंगी तो दलाल मधेशियों को भी घायल करेंगे, झापा, कंचनपुर, कैलाली, बर्दिया तथा चितवन जैसा माहौल बनायेंगे और तब वे पूरा राज करेंगे और मधेशी या तो दास बनेंगे या रोहिंग्या मुसलमानों के तरह न घर के रहेंगे, न घाट के रहेंगे और मधेशी बेमौत मरेंगे ।
अतः समय रहते ही सारे के सारे मधेशी समुदायों से निवेदन है कि स्वराज मधेश के पवित्र अभियान से जुडें और एक होकर आवाज दें, “नेपाली शासन का अन्त करो, मधेश देश को स्वतन्त्र करो ।”
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