कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे! विदा कविवर नीरज

१९ जुलाई

साहित्य जगत काे अाज एक अपूरणीय षाति झेलनी पड रही है । महान गीतकार गाेपालदास नीरज ने अाज इस दुनिया काे अलविदा कह दिया । पर वाे कहीं गए नहीं वाे हमेशा जिन्दा रहेंगे अपनी गीताें में अाैर हर संगीत प्रेमी तथा सहृदयी के दिलाे‌ में ।

गोपालदास नीरज (जन्म: 4 जनवरी 1925), हिन्दी साहित्यकार, शिक्षक, एवं कवि सम्मेलनों के मंचों पर काव्य वाचक एवं फ़िल्मों के गीत लेखक थे । वे पहले व्यक्ति रहे जिन्हें शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में भारत सरकार ने दो-दो बार सम्मानित किया, पहले पद्म श्री से, उसके बाद पद्म भूषण से। यही नहीं, फ़िल्मों में सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिये उन्हें लगातार तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिला है ।

स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़ेखड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पातपात झर गये कि शाख़शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,

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