काला दिवस का काला राज, भारत भ्रमण प्रचण्ड का जाल

कैलाश महतो, परासी.१९सेप्टेम्बर |

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उपर का यह काले रंग का खाना दक्षिण कोरिया में एकल लोग तब खाने की परम्परा है जब वे १४ अप्रिल के Valentine Day के अवसर पर अपने प्रिय लोगों से कोई गिफ्ट या उपहार पाने की अवस्था नहीं होती है । वहाँ के एकल लोग काले लिवास में एक जगह उपस्थित होकर करीब करीब काले रङ्ग के ही Jajangmyeonनामक खाना का परिकार खाते हैं । हकिकत में दक्षिण कोरिया के परम्परा अनुसार Black Day मायुस Single  लोगों का एक मनहूस दिन होता है जिसे वे मायूसी में व्यतित करते हैं ।
आज के दिन आश्विन ३ गते को मधेशी मोर्चा तथा गठबन्धन ने नेपाल और मधेश दोनों में संवैधानिक स्तर से काला दिवस मनाने का निर्णय किया है । यह राजनीतिक और संवैधानिक दोनों मसले हैं जबकि राजनीतिक या संवैधानिक रुप से ऐसा काला दिवस मनाने का परम्परा संसार में नहीं देखा जा रहा है । अगर कहीं पर है तो जानकारी के लिए हम भी कृतज्ञ होंगे ।
नाथुराम गोड्से के अदालती बहस के अनुसार उन्होंने महात्मा गाँधी को गोली इसलिए मारा कि गाँधी गलत मुद्दों को भी सपोर्ट करबाने के लिए आन्दोलित हो जाते थे, अनसन पर बैठ जाते थे । लोग उन्हें काफी इज्जत करते थे । इसलिए लोग उनके जिद्द के आगे झुक जाते थे जिसके कारण भारत और भारतवासियों को काफी बडे बडे मूल्य चुकाने पडे । गोड्से इन बातों को बहुत ध्यान से अध्ययन कर रहा था, चुकी वे गाँधी के बहुत बडे भक्त थे ।
हम भी विगत ६५ सालों से निरर्थक मुद्दों पर आन्दोलन करते आ रहै हैं । शहादत देते आ रहे हैं । उपलब्धियाँ खोते जा रहे हैं । मधेश और इसके अधिकांश हिस्सों को बेहाथ करते जा रहे हैं और अब हम काला दिवस मनाने के हालात पर आ गये हैं जिसका कोई अर्थ नहीं है ।
एक तरफ मधेशी मोर्चा की जायज माँगो को संवैधानिक संसोधन के प्रक्रिया से सम्बोधन करने की भरोसा मधेशियों को दिया जा रहा है । वहीं भारत भ्रमण मे रहे प्रधानमन्त्री प्रचण्ड भारतीय प्रधानमन्त्री मोदी से बार बार यह सवाल पूछते हैं कि विश्व के सर्वोत्कृष्ट रहे नेपाल के संविधान को भारत मान्यता क्यूँ नहीं देता ? उसी बात को दूसरे लब्जों में सरकार में सामेल नेपाली काँगे्रस के सभापति शेर बहादुर देउवा का कहना है कि नेपाल का संविधान समावेशी चरित्र को पूर्नतः पालन किया है । वहीं सरकार के प्रतिपक्ष में रहे एमाले अध्यक्ष ओली का दो टुक का कथन आता है कि नेपाल के संविधान को किसी नेपाली के द्वारा विरोध नहीं है । ओली ने तो स्पष्ट ही कर दिया है कि मधेशी नेपाली है ही नहीं जो संविधान को विरोध कर रहे हैं ।
भारतीय पत्रकार शेखर गुप्ता द्वारा दिल्ली में प्रधानमनत्री प्रचण्ड से सुवह सबेरे के घुमते टहलते कार्यक्रम के दौरान लिए गए अन्तरवार्ता में “मधेशी का नेपाल में क्या स्थान है ?” के जबाव में प्रचण्ड ने खुलकर ही कहा है कि मधेशियों को कहीं न कहीं एडजष्टमेण्ट करने की उनकी योजना है । क्या अर्थ निकलता है उनके जबाव का ? वे भी मधेशियों को नेपाली नागरिक मानने से इन्कार कर रहे हैं । “कहीं न कहीं” का मतलब तो यही होता है कि मधेशी नेपाल के गैर नागरिक हैं जिसे इधर उधर किसी छोड पर स्थान दे दिया जायेगा ठीक वैसे जैसे किसी गाडी के मूल इन्जिन को सुरक्षा देने और उससे इन्जिन को कोई गंभीर आघात न होने देने के लिए नट भल्टू और किल का प्रयोग बगल में इधर उधर किया जाता है । मगर इन्जिन के मूल धार में कतई नहीं । और इसी बात पर काँगे्रस, एमाले और माओवादी लगायत के सम्पूर्ण नेपाली पार्टियाँ तथा नेताओं की मानसिकता एक रुप से कायम है ।
इधर मधेशी मोर्चा आश्विन ३ गते आज को काला दिवस मनाने की तैयारी कर रही है । उसमें भी मधेशी गठबन्धन एक नहीं, अलग अलग होकर ः गठबन्धन का एक समूह शान्तिबाटिका में तो दूसरा समूह माइतीघर मण्डला में । इसमें फिर बडा एक सन्देह की बदबू आने लगी है कि कहीं ये दो समूह अपने आप में इस रस्साकस्सी में तो नहीं है कि सरकार का विश्वास पात्र ज्यादा कौन हो सकता है जिसके कारण इन्हें इनके आकांक्षा अनुसार का सरकार में हिस्सेदारी मिले ? यह काला दिवस मधेशियों के लिए कहीं काला राज तो सावित होने बाला नहीं है ? वहीं दुसरी तरफ मधेशी मोर्चा के बागी रहे विजय गच्छदार यह कहने लगे हैं कि आश्विन ३ गते के दिन मधेश अलग देश बनने को निश्चित है ।
उधर चीन की तरफदारी करके थक चुके प्रचण्ड साहब को यह मालुम हो चुका है कि भारत के बिना वह कुछ भी न कर सकने के कारण भारत के ही विश्वास में रहकर उनके विरोधियों द्वारा उनपर होने बाले संभावित समस्त आक्रमणों से सुरक्षित होना ही अक्लमन्दी है । डुबते हुए अपने शाख और शान को उठाने के लिए भी भारत के आलावा दूसरा शतिm उनके नजर में फिलहाल कोई न होने के कारण भी भारत के गोद में शरण लेना उनकी मजबुरी है । उसी क्रम में प्रचण्ड का भारत भ्रमण मधेशी मोर्चा के लिए एक जाल भी होने का बहुत बडा संभावना है । भारत को विश्वास में लेकर प्रचण्ड मकरे के तरह ऐसा जाल न कहीं बून दें कि मोर्चा उस जाल में फँसकर दम तोड दे । क्यूँकि प्रचण्ड को मधेशियों से बदला भी तो लेना है ।

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