किंग ऑफ द रिंग

शायद प्रचण्ड भूल गए थे कि नेपाल में मानव अधिकार संस्थाओं का अघोषित मालिक एमाले पार्टी ही है ।


 एमाले निकट वकीलों का काम है द्वन्दकालीन मुद्दों को जीवित रखना, विदेशी रकम लाना । और पार्टी मे योगदान देना । एमाले निकट वकील माओवादी जनयुद्घकालीन मुद्दाें में माओवादियो को लपेटने का कार्य तीब्र गति से बढ़ाने लगे तो प्रचण्ड को होश आया कि इस गठबंधन में दाल नही गलने वाली । खैर, कहते हैं कि जब जागो तब सबेरा ।


आर्थिक लगायत राज्य के विभिन्न निकाय में आपको अपनी पकड़ बनानी ही पड़ेगी । तो ऐसे में प्रचण्ड अपने कार्यकाल में ये सब करना चाहेंगे 
परन्तु प्रचण्ड को अपने पथ को अगर लंबी दूरी तक ले जाना है या कहे तो अगर वो अपने राजनीतिक पथ को एक “सिल्क रोड” बनाना है तो कुछ अलग करना चाहिये ।


विदित है की प्रचण्ड की राजनीति में उदय नेपाली जनता के मन में एक आशा की किरण ले कर आया था सीमांतकृतों के लिये ।
Prachanda-

रणधीर चौधरी
माओवादी केन्द्र के अगुवा जो की जनयुद्घ के दौरान प्रचण्ड हुआ करते थे । बीच मे गड़बड़ा से गये थे । प्रगतिशील मुद्दाें को आगे बढ़ा कर नेपाली राजनीति में अपना लोहा मनबाने मे सफल रहे पुष्पकमल कुछ समय के लिए महेन्द्रीय चिन्तन मे लिप्त हो गये थे । शायद उनका वक्त सही नही चल रहा होगा । तभी तो एमाले जैसे पार्टी का मतियार बनने मे विवश दिखाई दे रहे थे । जनयुद्घ कालीन मुद्दा में फँसने का मामला बढ़ने लगा । बाबुराम भट्टराइ पार्टी से अलग हो गये आदि, इत्यादि । आखिर ओली सरकार के प्रेम मे लिप्त पुष्मकमल को अचानक हो क्या गया जो अपना समर्थन वापस ले लिए ? मधेशियाें पर गोली का बौछार करवाने मे ओली सरकार के समर्थक प्रचण्ड फिर से मधेशी दलो को क्यों नजदीक लाने की बात सोचने लगे ? हालाँकि इन सवालों का जवाव तलाश करना मुुुश्किल नहीं है फिर भी नेपाली राजनीति के सन्दर्भ को मध्यनजर रखते हुए इसका विश्लेषण आवश्यक हो जाता है ।

प्रचण्ड नेपाल के उन्तालिसवें प्रधानमंत्री के रूप मे निर्वाचित होने मे सफल हुए हैं । परंतु क्या प्रचण्ड सरकार ऐसा कुछ कर पाएँगे जो देश को ट्रेक पर लाएगा ? आखिर क्या हो सकता है प्रचण्ड का मिसन और क्या करना चाहिये उनको ? यह अहम सवाल बन चुका है आज राजनीति के बारे मे सोचने वाले के लिए ।

एक नजर अतीत पर
जनयुद्घकाल में प्रचण्ड एण्ड कम्पनी का मानना था कि संसदीय प्रणाली एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमे बकरे का सर रखकर भैंसे का मांस बेचा जाता था । प्रत्यक्षनिर्वाचित कार्यकारणी की वकालत करने वाले प्रचण्ड खुद संसदीय प्रणाली की चंगुल मे फँस चुके हैं और अब वे इस प्रणाली के बेताज बादशाह के रूप में अपने आप को चित्रित करते नही थक रहे हैं । गणतान्त्रिक नेपाल के प्रथम प्रधानमंत्री प्रचण्ड को जब कटुवाल प्रकरण में फँस कर राजीनामा देना पड़ा था तभी से वे बेचैन दिखाई दे रहे थे । वैसे कहे तो सत्ता प्राप्ति हरेक नेताओ की लालसा होती है । परंतु प्रचण्ड की सत्ता प्राप्ति की मंसा थोड़ी अलग थी और है । ओली नेतृत्व के सरकार में जाना उनकी मजबूरी ही थी । ओली का प्रधानमंत्री बनना जब तय सा दिख रहा था और प्रचंड का सहयोग उसमें अहम था उस समय प्रचंड ने मौके को बड़े जोरदार तरीके से पकड़ते हुए तब के ओली सरकार से खुला नौ बुंदे और गोप्य कई समझौते किये । सारे समझौते का सार था द्वन्दकालीन मुद्दाें का सेट्लमेन्ट ।
शायद प्रचण्ड भूल गए थे कि नेपाल में मानव अधिकार संस्थाओं का अघोषित मालिक एमाले पार्टी ही है । एमाले निकट वकीलों का काम है द्वन्दकालीन मुद्दों को जीवित रखना, विदेशी रकम लाना । और पार्टी मे योगदान देना । एमाले निकट वकील माओवादी जनयुद्घकालीन मुद्दाें में माओवादियो को लपेटने का कार्य तीब्र गति से बढ़ाने लगे तो प्रचण्ड को होश आया कि इस गठबंधन में दाल नही गलने वाली । खैर, कहते हैं कि जब जागो तब सबेरा ।

होश में आना जरुरी था

ओली सरकार की नसलीय राजनीति जब सर चढ़ कर बोलने लगी तो स्वाभाविक है कि यह बात सबको खटकी । प्रतिपक्ष मे रहे कांग्रेस को कुछ ज्यादा ही । पड़ोसी राष्ट्र जो कि नेपाल के सबसे करीबी देशाें में अहम है उसको भी ओली की विदेश नीति अच्छी नहीं लगी, ऐसा बिश्लेषण आम है आज की तारीख में । माओबादी केन्द्र जो की गठबंधन सरकार की सबसे बडी ताकत थी उनको अपने पार्टी का भविष्य खतरे में दिखने लगा और ऐसी ही उप–घटनाओ की वजह से प्रचण्ड ने अपना समर्थन वापस लेने का निर्णय लिया ओली सरकार से और अन्ततः संसदीय राजनीति का फायदा उठाते हुए आज प्रचण्ड नेपाल के उन्तालिसवें प्रधानमंत्री के रूप मे निर्वाचित होने मे सफल हुए हैं । परंतु क्या प्रचण्ड सरकार ऐसा कुछ कर पाएँगे जो देश को ट्रेक पर लाएगा ? आखिर क्या हो सकता है प्रचण्ड का मिसन और क्या करना चाहिये उनको ? यह अहम सवाल बन चुका है आज राजनीति के बारे मे सोचने वाले के लिए ।

अब का प्रचण्ड पथ

बिना किसी संशय के कहा जाय तो प्रचण्ड के सत्ता मोह का कारण व्यतिगत लाभ प्राप्ति के सिवा और कुछ दिखाई नही दे रहा है । तीन अहम स्वार्थ है उनके मन में । पहला, द्वन्द कालीन मुद्दे को कैसे अपने फेवर में लाया जाय । इसमें सत्ता साझेदार का भी स्वार्थ है जिसको नकारा नही जा सकता । माओवादी जनयुद्घ जिस वक्त शुरु हुआ था उस वक्त देश के प्रधानमंत्री थे शेरबहादुर देउवा, अभी के कांग्रेस सभापति । द्वन्दकालीन मुद्दे में उनको भी लपेटा जा सकता है । दूसरा, तब के नेकपा माओवादी पुराने अहम सथियो को वापस बुलाकर माओवादी केन्द्र बनाया है तो स्वाभविक है उन सब को खुश करना पड़ा और उस के लिए मंत्रालय तलाश कर के सौंपना । तीसरा, आने वाले चुुनाव की तैयारी । गौरतलब है की नेपाली चुनाब में अगर आप बहुत सारे हथकन्डे नहीं अपनाएंँगे तो चुनाव मे अपना दबदबा नही बना पाएँंगे । आर्थिक लगायत राज्य के विभिन्न निकाय में आपको अपनी पकड़ बनानी ही पड़ेगी । तो ऐसे में प्रचण्ड अपने कार्यकाल में ये सब करना चाहेंगे ।
परन्तु प्रचण्ड को अपने पथ को अगर लंबी दूरी तक ले जाना है या कहे तो अगर वो अपने राजनीतिक पथ को एक “सिल्क रोड” बनाना है तो कुछ अलग करना चाहिये । विदित है की प्रचण्ड की राजनीति में उदय नेपाली जनता के मन में एक आशा की किरण ले कर आया था सीमांतकृतों के लिये । स्थाई सत्ता से पीड़ित लोगों के लिए प्रचण्ड का जन्म सुल्तान से कम नहीं था । दशकों से आन्दोलित मधेशियो को और भी ज्यादा उम्मीद थी । तो ऐसे मे विभेदकारी संबिधान में संसोधन करबाने का प्रण लेना चाहिये उनको । संघीयता को कैसे सार्थकता दिया जाय उस पर बिशेष ध्यान देना होगा उनको ।
नेपाली राजनीतिक नेताआें में संभावनाओ से ओतप्रोत व्यत्तित्व का नाम है प्रचण्ड । देखना ये है की केबिनेट से होने बाली निर्णय जिस में सम्भवतः दो तिहाई वाली तरबार नही लगता है वो पहले बैठक से ही उनको करना बेहतर होगा । जैसे कि, मधेश आन्दोलन में मारे जाने बाले वीराें को शहीद घोषणा, घायलाें का सही उपचार और क्षतिपुर्ति, मधेशी और थारुओ पर जो झूठा मुद्दा चलाया गया है वो वापस लेना ।
कहा जाता है की राजनीति में अगर आप को लगता है कि आप जिस एजेण्डे को समझते हो की सही है तो उस के लिये आप एग्रेसिव निर्णय ले सकते हो । शायद पुष्पकमल से अच्छी तरह इस बात को कोई नही समझ सकता । नहीं तो वो दस साल तक जनयुद्घ ही नहीं करते । वत्र्तमान समय भी उसी का है । संविधान मे संशोधन हेतु संशोधन प्रस्ताव पंजीकृत कराना चाहिये उनको । और प्रस्ताव को पारित करने के लिए पहल भी उठाना चाहिये । जो कोई उसको पारित होने से रोकेगा उनको दुनिया भी तो पहचानेगी । ऐसै निर्णय के लिए उनको अपने नाम से कुछ सीखना होगा । अगर पुष्मकमल बन के चाहते हंै कुछ करे तो वो शायद कुछ एग्रेसिव नहीं कर पाएँगे । इसलिए उनको प्रचण्ड रूप धारण कर के ही कुछ करना होगा । संसदीय राजनीति में अभी प्रचण्ड का महत्त्व कुछ ज्यादा ही है । कांग्रस एमाले की कोई गठबंधन बनने की सम्भावना नही दिख रही है । ओर तीसरी अहम पार्टी माओवादी केन्द्र का ही वर्चस्व दिखाइ दे रहा है । उपर उल्लेखित पथ पर अगर प्रचण्ड अपना कदम बढाने मे सफल रहे तो वाकइ में वो नेपाली राजनीति के इतिहास में किंग अफ द रिंग ही कहलाएँगे ।

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