किये पर कामरेड का पछतावा

बाबूराम पौड्याल

बाबुराम पौड्याल

एमाओवादी अध्यक्ष तथा पूर्व प्रधानमंत्री कामरेड पुष्पकमल दाहाल प्रचण्ड देश में संविधान बनाने के लिए चल रहे रस्साकस्सी के बीच अचानक दिल्ली के लिए निकल पडेÞ तो लोगों को इसीलिए कोई खास आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि लगभग सभी बड़े कद के नेपाली नेताओं के लिए दिल्ली दौड़ एक परम्परा बन चुकी है । बताया जाता है, इस बार उनके अलावा और भी कई बड़े नेता दिल्ली के न्योते पर वहां जाने के लिए कतार में खडेÞ हंै । इस हिसाब से भले ही प्रचण्ड के दौरे पर चर्चा सामान्य बात है परन्तु उन्होंने दिल्ली जाकर अपने ही विगत की गलतियों के बारे में जो कुछ कहा, उस पर दबे जुबान से चरचे चल रहे हैं ।

हकीकत जो भी हो,प्रोटोकल के हिसाब से प्रचण्ड नेपाल के गिनेचुने हाईप्रोफाइल नेताओं में से एक हैं । दिल्लीप्रवास के दौरान वे तुगलक रोड पर स्थित जनतादल युनाईटेड के अध्यक्ष शरद यादव के निवास पर पहुंचे । समाचारों के मुताबिक, वहां पर उन्होंने अन्य कुछ भारतीय प्रतिपक्षी दल के नेताओं के साथ मुलाकात में अपनी तीन राजनीतिक गलतियों का आत्मग्लानि के साथ जिक्र किया ।
हिन्दी में एक कहावत है, अब पछताए होत क्या जब चिडि़या चुग गई खेत । कामरेड प्रचण्ड की पश्चाताप भरी दास्तां सुनकर पड़ोसी  नेताओं को भी कुछ गुदगुदी सी लगी होगी । पश्चाताप भरी बातों का कामरेड ने पहली बार दिल्ली में ही खुलासा किया हो, ऐसी बात नहीं है । इससे पहले भी एक दो बार इस तरह की बात कमरेड के मुंह से सुना जा चुका है । परन्तु इस वक्त दिल्ली जाकर इन सब बातों को फरियाद करने में उनकी मजबुरी क्या थी—यकीनन कहना कठिन है । वैसे पड़ोसियों के साथ बैठकर मर्यादापूर्वक आपस में सलाह मसविरा करना अस्वभाविक नहीं है । क्योंकि यही हमारी संस्कृति भी है । फिर भी नेपाली नेताओं के दिल्ली दौरे को लेकर कई लोग मानते है कि दिल्ली ऐनवक्त पर नेताओं के जरिए नेपाली राजनीति को ट्रीट करने की कोशिश करता आ रहा है और प्रचण्ड इसी ट्रीट के एक हिस्सा थे । कुछ लोग इस ट्रीट और कामरेड की फरियाद को जोड़ कर भी देख रहे है ।
हकीकत जो भी हो,प्रोटोकल के हिसाब से प्रचण्ड नेपाल के गिनेचुने हाईप्रोफाइल नेताओं में से एक हैं । दिल्लीप्रवास के दौरान वे तुगलक रोड पर स्थित जनतादल युनाईटेड के अध्यक्ष शरद यादव के निवास पर पहुंचे । समाचारों के मुताबिक, वहां पर उन्होंने अन्य कुछ भारतीय प्रतिपक्षी दल के नेताओं के साथ मुलाकात में अपनी तीन राजनीतिक गलतियों का आत्मग्लानि के साथ जिक्र किया । उनका कहना था—पहला, गिरिजाप्रसाद कोईराला को राष्ट्रपति बनाने से मुकर जाना दूसरा, प्रधानसेनापति प्रकरण में प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना और पहली संविधानसभा में अपने पक्ष में भारी बहुमत के बावजुद संविधान न बना पाना बड़ी गलतियां थी । इससे यही अन्दाजा होता है कि अरसा बीत जाने के बाद भी गिरिजाप्रसाद कोईराला और पूर्वसेनापति कटुवाल की कटुस्मृतियां उनके दिमाग से उतर नहीं पायी है । कोइराला तो अब इस दुनिया में नहीं रहे परन्तु कटुवाल कामरेड का दुःखड़ा सुनकर जरुर अपनी मुछों पर ताव दे रहे होंगे । वैसे अपनी गलतियों का अहसास होना अच्छी बात है लेकिन यह भी सच है कि उनकी इन गलतियों की वजह से देश को भारी नुकसान उठाना  पड़ा ।
नेपाली राजनीति के भीतर कामरेड प्रचण्ड एक बहुआयामी व्यक्त्वि वाले नेता हैं । एक विद्रोही नेता के रूप में उन्हाेंने एक दशक से ज्यादा समय तक सत्ता के खिलाफ हथियारबन्द संघर्ष का नेतृत्व किया और उसे शान्तिपूर्ण निष्कर्श में पहुंचाया । संविधानसभा में उनकी भारी जीत ने बन्दूक, गोला बारुद वाले विद्रोही नेता से एकाएक उनकी छवि लोकप्रियता के शिखर को चूमने लगी । हरएक विपक्षी का उन्होंने जमकर अपने पक्ष में सफल उपयोग किया । कांग्रेस के कई लोग मानते है कि कोईराला ने प्रचण्ड के उपर जोखिमपुर्ण विश्वास किया था । वे प्रचण्ड के इसी युज एण्ड थ्रो नीति के शिकार हो गये थे । इसका मतलब यह नहीं कि हठी और शातिर राजनीति के खिलाड़ी कोइराला धराशायी हो गये थे ।
चुनाव के पूर्व ही दिवारों पर बडेÞ अक्षरों में अपने को गणतंन्त्र नेपाल का पहला राष्ट्रपति बताते हुये कामरेड प्रचण्ड ने कई पोष्टर लगवाये । इससे उस समय प्रचण्ड की बढती  महत्वकांक्षा और दुस्साहस का पता चलता है । उनको लगने लगा था कि नेपाल में अब सब कुछ उनकी जेब में है  और बाकी सबों का पत्ता साफ करने में वे सफल हो गये हैं । कोईराला ने  प्रचण्ड की महत्वाकांक्षा के शीशमहल को बुरी तरह जमिदोज कर दिया । प्रचण्ड यह भूल गये थे कि बाहर से दिखने वाली उनकी सफलता एक राष्ट्रीय वाध्यात्मक स्थिति भी थी,अकेला उनका प्रयास नहींं । आखिरकार प्रचण्ड भी राष्ट्रपति नहीं बन पाये । नेपाली राजनीतिक आकाश में ऊंची उड़ान भर रहे कामरेड प्रचण्ड के कठिन दिनों की शुरुआत इसी विफलता से हुई ।
इसका मतलब यह कतई नहीं निकाला जाना चाहिए कि प्रचण्ड ने जो कुछ किया सब गलत ही किया । देश में अरसों से चली आ रही सामन्तवादी केन्द्रीय सत्ता को उखाड़ने में उनकी अहम् भूमिका रही । प्रचण्ड ही नेपाली राजनीति के एक ऐसे नेता हैं जिनकी राजनीति ने देश के सभी वर्ग की जनता को किसी न किसी रूप में प्रभावित किया । सीमान्तकृत जाति, जनजाति और समुदाय को अपने अधिकार के लिए सचेत करने में उनका महत्वपुर्ण योगदान है । जिसको भुलाया नहींं जा सकता । फिर भी मुद्दे को पहले भड़काने और बाद में उसे लावारिस छोड़ देने का आरोप भी उन पर लग रहा है । देश में विद्यमान सभी अन्तरविरोधों को एक साथ उपयोग करने का जोखिम भरा प्रयास भी उनपर भारी पड़ा ।  इस बीच उनके नेतृत्व पर भी कई बार सवाल खडेÞ किये गये । उनकी अपनी ही पार्टी कई बार विभाजन की शिकार हो गयी ।
दुसरे संविधानसभा के चुनाव तक पहुंचते पहुंचते प्रचण्ड के उंचे कद पर कई खरोच आ गई थी । आशा के विपरीत संविधान सभा उनकी पकड़ से निकल चुकी थी । कल के जनता के  नायक प्रचण्ड को जनता ने एकाएक तीसरे नम्बर पर ला खड़ाकर दिया था । उनके अन्य परिवर्तनकारी हमदमों की हालात भी पतली हो चली थी । इस खामियाजे के खास कारणों में से जातीय मुद्दे को गलत तरीके से उठाने को भी बताया जा रहा है । टक्कर देने के लिए उन्होंने कई छोटी ताकतों को साथ मिलकर एक मोरचा तैयार किया । परन्तु यहां पर भी उनको बात बनती नजर नहीं आई और उन्होंने किसी भी कीमत पर संविधानबनाने में लगना हीं उचित समझा । एमाले और कांग्रेस के साथ बातचीत शुरु हुई और मोरचे के अधिकांश ताकतों को दरकिनार करते हुये समझौते पर हस्ताक्षर किये । ऐसे में मोरचे के असन्तुष्टों की ओर से उन्हें विश्वासघात का आरोप भी लगा । अगर वे अपनी जमीर पर खडेÞ थे तो इन आरोप से उनको और भी चोट पहुंचती होगी । विगत की अपनी कमजोरियों की आत्मग्लानि और तमाम आरोपों के बीच में इन दिनों प्रचण्ड अपने लिए एक स्थिर जगह बनाने में लगे प्रतीत होते हैं ।

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