किसानों पर बोझ बन रही है पारम्परिक कृषि

बाबुराम पौड्याल:Baburam paudyalसदा की भांति इस साल भी संसद में बजट पेश हुआ । जाहिर है, प्रतिपक्ष ने बजट की आलोचना की तो सत्तापक्ष ने मोटामोटी तौर पर सामयिक होने की दलीलें दी । कुछ खींचातानी के बाद आखिरकार बजट पास हो गया । उधर बजट में उपेक्षा के लिए देश के तर्राई में विरोध भी हुआ । बजट की प्रतियां भी जलाई गई । क्योंकि ऐसा ही होता चला आ रहा है । जो कुछ होता चला आ रहा है बिना कुछ नयेपन के वही हुआ जा रहा है । कहने को नेपाल अब भी एक कृषि प्रधान देश है । बजट मंे सभी सरकार के अर्थमंत्री इस बात को कई बार जिक्र करते ही चले आ रहे हैं । वर्तमान अर्थमन्त्री रामशरण महत ने इस बार भी बडÞे ही जिम्मेदाराना अन्दाज में कृषि का जिक्र किया । उनके बजट में कृषि के प्रति कुछ अच्छी लगने वाली बातें तो हैं परन्तु विगत में हर बजट की अच्छी बातों पर किये गये लोगों की उम्मीदों का बार-बार जनाजा निकल चुका है । ऐसे में मंत्री महत के बजट में कृषि के लिए उल्लेख किये गये चन्द अच्छी बातों पर तारीफ तो फिलहाल नहींर्,र् इमानदारी से अमल में लाने की दुआएं जरूर दी जा सकती हंै । मंत्री महत के बजट को दुआओं को अभी दरकिनार कर चलिए खेती और किसानों की बात करते हैं ।
देश के कुल गार्हस्थ उत्पादन -जी.डी.पी) में अब भी तकरीबन एक तिहाई हिस्सा कृषि का ही है । दशक भर पहले देश के अर्थतन्त्र में कृषि का योगदान ३७ फीसदी था परन्तु अब ३३ फीसदी तक नीचे लुढÞक गया है । कृषि की यह हिस्सेदारी लगातार घटती ही आ रही है । यह भी कहा जा सकता है कि सेवा और औद्योगिक क्षेत्र के बढÞने के कारण कृषि का योगदान घटता दिखाई देना स्वाभाविक है । परन्तु इस तर्क के पीछे कोई दम नजर नहीं आता । अंाकडेÞ बताते हैं, देश में अब भी कृषि पर आश्रति ३८ लाख ३१ हजार परिवार हैं । इतनी बडÞी तादाद मेंे लोग अब भी कृषि पर ही आश्रति हैं तो इस पर सरकार को विशेष ध्यान देना आवश्यक है । राष्ट्रीय कृषि गणना २०६८ के अनुसार पिछले दश सालों में धान और गेहूं ८, मक्का १२, दाल २१ और सरसों के उत्पादन में १३ फीसदी कमी आई है । देश की डÞोलती आर्थिक नैया को कृषि ही किनारे तक पहुंचा सकती है । कृषि को तरजीह देने की बात तो की जा रही है, फिर भी विकास नहीं हो सका है । सेवा, उद्योग जैसे क्षेत्र अभी तक इतने परिपक्व नहीं हो पाये हैं कि अर्थतन्त्र का मेरुदण्ड माना जाये । इन क्षेत्र को अभी ही नेपाली अर्थतन्त्र के लिए भरोसेमन्द आधार मान लेना घातक सिद्ध हो सकता है ।
कृषि प्रधान देश की बदहाली इन सरकारी आंकडों से और साफ हो जाता है कि इस साल तरकारी, फल और मंासजन्य चीजों के आयात के लिए ४५ अर्ब और अनाज तथा तेल आयात में ५५ अर्ब रूपये खर्च हो चुके हैं । इस तरह बीते आषाढÞ माह के अन्त तक कुल व्यापार में तकरीबन ६०० अर्ब रूपये से अधिक घाटे का आंकलन किया जा रहा है ।
कृषि के इन बिगडÞते हालातों के लिए पुरातन खेती प्रणाली प्रमुख कारण है । मौनसून की बषर्ा पर आधारित खेती और मौसम का निरन्तर बदलता रुख भी कृषि को प्रभावित कर रहा है । जमीन का उचित आबंटन और कृषि मजदूरों की जमीन पर स्वामित्व जैसे सवालों पर कागज में पहले ही भले ही बहुत कुछ हो गया हो परन्तु व्यवहार में यह बुरी तरह पिट चुका है । खेती योग्य जमीन का स्तरीकरण, सिंचाई और मलखाद की उचित व्यवस्था, किसानों को सरल कर्जा और उत्पादों का बाजार प्रबन्धन की ओर ध्यान दिए बगैर कृषि का विकास संभव नहीं है ।
बजार के अभाव में जुम्ला में सेब के फल जिस समय पेडÞों पर ही सडÞ रहे होते हैं, उसी समय राजधानी काठमांडू और पोखरा के बाजारों में विदेशी सेब ऊंचे दामों में बिक रहे होते हैं । तर्राई में टमाटर के समय में बाजार के अभाव के कारण मवेशियों तक को खिलाया जाता है । उसी समय पहाडÞ के अन्य शहरों में यह ऊंचे दामों में बिक रहा होता है । शीतभण्डार के अभाव में ऐसे उत्पादों को अधिक समय तक सुरक्षित भी नहीं रखा जा सकता न ही समय पर बाजार पहुंचाने के लिए यातायात की व्यवस्था है । गन्ने के किसानों को उचित भाव के लिए चीनी मिलों के द्वार पर फसल सुखने तक विरोध पर््रदर्शन और धरना करना पडÞता है । वर्तमान खेती के तौर तरीके से किसानों को उचित प्रतिफल न मिलने के कारण कृषि कर्म उन पर बोझ बनता जा रहा है । फलस्वरूप, पूरे तौर पर खेती में आश्रति गांव के लोगों का शहरों की ओर बेहतर जीवनस्तर की खोज में पलायन हो रहा है । खेती करना अब पिछडÞापन माना जाने लगा है । पहाडÞों से लोगों का देश की कुल जमीन का १४ फीसदी हिस्से वाले तर्राई की ओर या फिर शहरों की ओर आप्रवासित होने की प्रवृत्ति में लगातार बढत दिखाई देती है । सरकार को चाहिए कि वह ८६ फीसदी हिस्से में लोगों का आकर्षा पैदा करने की नीति अपनाए जिससे लोगों का पलायन रुक जाये । पहाडÞों में अब तक बनाए गये विकास के पर्ूवाधार उपयोग में न आने का खतरा बढÞ गया है । लगातार बढÞता यह असन्तुलन देश के आर्थिक सेहत के लिए बेहद खतरनाक स्थिति की ओर संकेत करता है ।
तर्राई की खेती योग्य जमीन और पहाडÞ के शहरों के आसपास खेती की जमीन पर घर बनाने के लिए धडÞल्ले से प्लाटिंङ किया जा रहा है । खेती से कहीं अधिक जमीन की खरीद बिक्री से तात्कालिक आमदनी होने के करण भी यह धन्धा जोर पकडÞता जा रहा है । इससे कृषि क्षेत्र पर दूरगामी नकारात्मक प्रभाव पडÞ रहा है । इन हालातों में, क्रमशः छोटे-छोटे टुकडÞों में बंट रहे कृषियोग्य जमीन को एकीकृत कर बडेÞ पैमाने पर आधुनिक खेती व सहकारी अवधारणा को और आगे बढÞाने की आवश्यकता है । इससे आम लोगों की कृषि के प्रति स्वाभाविक रूपसे आकर्षा बढेÞगा और इस क्षेत्र से अच्छे जीवन स्तर के लिए देश के अन्दर और विदेशों में पलायन कर रही आबादी को स्वाभाविक तौर पर रोका जा सकेगा । पहाडÞों से तेजी से लोगों का तर्राई और सुगम क्षेत्र की ओर पलायन से हरेक दृष्टि से क्षेत्रीय असन्तुलन का खतरा बढÞ गया है । विगत में विकास के सभी अवसरों का विकेन्द्रीकरण न होने से यह असन्तुलन हो रहा है । इस में एक दशक से भी अधिक समय तक चले अन्तरिक खूनी संर्घष्ा ने आग में घी का काम किया । हिमालय और उसके निचले क्षेत्र में पशुपालन और जडÞी बूटी खेती को व्यवसायिक रूप से आगे बढÞाने के अलावा दूसरा विकल्प नजर नहीं आता । पहाडÞ और उसकी घाटियों में बागवानी और अनाज उत्पादनों को बढÞाया जा सकता है । चूरे पर्वत श्रृंखला के दक्षिण में पर्ूव पश्चिम नहरें बनाकर नदियों को जोडÞने से तर्राई की समूची जमीन पर अच्छी सिंचाई हो सकती है । प्राकृतिक रूप से चूरे की कमजोर संरचना के कारण इसकी संभावना पर पहले अध्ययन होना आवश्यक होगा । इस के अलावा सिंचाई की अन्य कई योजनाएं तैयार की जा सकती हैं ।
राजनीतिक संक्रमण के कारण विकास बजट साठ फीसद भी खर्च न होने से विकास रुक सा गया है । सदा की भांति इस बार भी एक और सवाल गम्भीरता से उठ खडÞा हुआ है कि बजट के आंकडेÞ जैसे भी हों उसका सकारात्मक प्रतिफल जनता तक पहुंचने पहुंचाने में सक्रियता दिखानेवाले संयन्त्र और उसकी प्रभावकारिता में सुधार होगा या नहीं, अगर नहीं तो वजट का खास मतलव नहीं रहेगा । नेपाल की बहुत बडÞी समस्या अब यह हो गई है कि कई दौर के राजनीतिक परिवर्तनों के बावजूद भी अर्थतन्त्र के बुनियादों पर गंभीरता से खुलकर कभी बहस नहीं हो पायी है । नारेबाजी, बन्द, हडÞताल, खूनखराबा तक ही सब कुछ सीमित हो चला है । हर सियासी नेता से कार्यकर्ता तक को विकास की फिक्र से कहीं अधिक अराजकतावादी चिन्तन से प्रभावित पाया जाता है । अराजकता विकास को निषेध करती है । विकास के लिए स्थिरता और शान्ति आवश्यक शर्ते हैं । नेपाल की उन्नति के लिए कृषि ही अकेला क्षेत्र है, जो बहुत जल्दी संवृद्धि देने की क्षमता रखता है ।

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