किसी ने भी मुझे अच्छा नहीं कहा

– गौतम सापकोटा चरिदादा’

० चिडियों की आवाज की नकल आप ने कहाँ से शुरु की –
– २०६१ साल चैत्र की बात है। मैं घर में बैठ कर भारत से प्रसारित किसी चैनल को देख रहा था। उस में एक आदमी ट्रेन और मोटरसाइकल की कैरिकेचर कर रहा था। उसी समय

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गौतम सापकोटा चरिदादा’

मेरे मन में खयाल आया- चिडियों का कैरिकेचर क्यों न किया जाए। मैं भी इसे शुरु कर सकता हूँ। यह काम औरों से कुछ हटकर होगा, ऐसा लगने पर विक्रम सम्वत् २०६२ वैशाख १ गते से मैंने कौवे का कैरिकेचर शुरु किया।
० कैसे सम्भव हुआ यह कैरिकेचर –
– परिवारका बडÞा लडका होने से घर का बोझ मेरे ऊपर था। इसीलिए हेटौडा स्थित सुपर लिम्कोट नामक एक कारखाने में मैं मजदूर था। घर से कारखाना आते-जाते समय रास्ते में एक जंगल पडÞता है। वहाँ मैंने कौवे की आवाज निकालने की कोशिश की। कभी-कभी तो ऐसा होता- मैं कौवे की आवाज निकालता और सारे कौवे मेरी तरह आवाज निकालते रहते। उसी अवस्था में मैं घर पहुँचता।
० कैरिकेचर सीखते हुए कभी काम में बाधा तो नहीं आई –
– काम बाधित तो कभी नहीं हुआ, मगर एक रोचक घटना मुझे अभी भी याद है। जब रात के सिफ्ट में मुझे काम करना पडÞता, तब मैं अपने दोस्तों को कौवे और दूसरी चिडिया की आवाज निकाल कर डराया करता था। जब बाद में उन्हें पता चलता, तो वे मुझ पर बहुत नाराज होते थे।
० आप कहाँ तक पढ पाए –
– मैं सामान्य घर से था, इसलिए मैं ज्यादे नहीं पढÞ पाया। सिर्फ कक्षा ८ तक मेरी पर्ढाई हर्ुइ। और २०५८ साल के आसपास में पढर्Þाई छोडÞ कर नौकरी में लग गया।
० वर्ल्ड रर्ेकर्ड कायम करने में कितना संर्घष्ा करना पडÞा –
– शुरु-शुरु में तो बहुत दिक्कत हर्ुइ और कोई भी मेरी बात पर यकीन नहीं करता था। और किसी ने भी मुझे अच्छा नहीं कहा। किसी का सहयोग नहीं मिला।
० गिनिज बुक में रर्ेकर्ड रखने के सम्बन्ध में क्या हो रहा है –
– अभी ३ वर्ल्ड रर्ेकर्ड रखने में मैं सफल हुआ हूँ- एमरेष्ट वर्ल्ड रर्ेकर्ड, वान्डर वर्ल्ड रर्ेकर्ड और यूनिक वर्ल्ड रर्ेकर्ड। इन तीनों से र्सर्टिफिकेट आ चुका है। लेकिन रर्ेकर्ड भर कर आना बाँकी है। अमेरिका के वर्ल्ड रर्ेकर्ड से सिर्टिफिकेट लेना बाँकी है। इसके लिए वही जाना होगा। वर्ल्ड में ऐसा पहला रर्ेकर्ड है। गिनिज बुक में रर्ेकर्ड रखना कठिन है, क्योंकि वहाँ जज नहीं हैं। फिर भी प्रयास जारी है।
० आप को तो बहुत जगहों से सम्मान मिला होगा, इससे जीवन कितना सहज हुआ है – नेपाल सरकार से कोई मदद मिली है –
– सम्मान तो बहुत मिला। इसलिए ४,६०५ सम्मानपत्र और कदरपत्र हैं। पर्यटन वर्ष२०११ में मुझे सद्भावना राजदूत बनाया गया। अभी मैं नेपाल सरकार की ओर से चार संघसंस्थाओं में और फिल्म कम्पनी ने भी सद्भावना राजदूत हूँ। नेपाल सरकार से और कोई सहयोग नहीं मिला। लेकिन नेपाल स्थित संघसंस्था, स्कूल-काँलेज ने मुझे सहयोग किया है। मुझे आशा तो है- नेपाल सरकार भी कुछ करेगी। लेकिन अभी तक नेपाल सरकार ने कोई आर्थिक सहायता नहीं दी है।
० आप को परिवार चलाने में दिक्कत होती होगी –
– पहले तो कुछ समस्या थी, लेकिन अब कार्यक्रम आयोजित-प्रायोजित करनेवाली संस्थाएँ, कुछ सहयोग करती हैं। खास कर मकवानपुर जिला ने मुझे बहुत सहयोग किया है, जिसके चलते मेरा जीवन कुछ सहज है। फिर भी कठिनाई तो है ही।
० अभी किस काम में व्यस्त हैं –
– वातावरण संरक्षण सम्बन्धी और जलवायु परिवर्तन के चलते चिडिÞया, पेडÞपौधे और इन्सान पर कैसा असर पडÞ रहा है, इस विषय में नेपाल के कोने-कोने में पहुँच कर जनचेतना जगाने के साथ ही योजनाओं के काम में भी जुटा हूँ। देश-विदेश घूमने की योजनाएं बनी है। उसी में लगा हूँ।
० अभी तक जनचेतना कार्यक्रम के लिए कहाँ कहाँ गए –
– नेपाल के ६६ जिलों में पहुँचा हूँ। भारत के दार्जिलिङ, सिक्किम, मुर्म्वई, यूपि, राजस्थान आदि जगहों में पहुँचा हूँ।
० नेपाल की परिस्थिति आप के कार्यक्रमों के लिए कितने अंश में बाधक साबित होती है –
– नेपाल में बन्द, हडताल और चक्काजाम के चलते कार्यक्रमों में पहुँचना और पंछियों की आवाज के बारे मंे अध्ययन करना दोनों काम में बाधा आती है। फिर भी मैं कहूँगा, बन्द, हडÞताल, चक्काजाम यह सब बुरी बात है।
० अन्त में क्या आप पत्रिका के पठकों को कुछ कहना चाहेंगे –
– र्सवप्रथम तो मैं हिमालिनी पत्रिका को धन्यवाद देना चाहता हूँ, जिसने मुझे पठकों के सामने पहुँचाया है। पाठकों और युवा पीढÞीयों को मैंने चिडिÞयों, वन्यजन्तु और पेडÞपौधे के संरक्षण के बारे में बहुत कुछ दिखाया और सिखाया है। किस तरह प्रकृति का संरक्षण करना चाहिए, यह भी बताया है। प्रकृति हम लोगों की बहुत बडÞी सम्पदा है। विश्व के सामने अपनी पहचान बनाने के लिए भी हमें इसका संरक्षण करना होगा। त्र

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