किस्मत

गणेशकुमार लाल: उसने बहुत कोशिश की अपने भाग्य को बदलने के लिए । बलराम एक होनहार लडÞका था । अपनी कक्षा में वह सदा दौडÞ में अव्बल रहा । एक विद्यालयस्तरीय दौडÞ में तो उसने अपने से दो कक्षा आगे के छात्र को पराजित करते हुए प्रथम स्थान लाया । प्रधानाध्यापक महोदय ने अपने हाथों से उसे पारितोषिक दिया ।
अपने साथियों की सलाह पर वह क्रिकेट खेलने लगा । दर्ुभाग्यवश उसके पिता की मृत्यु हो गई । खेल छूट गया । गुजारे के लिए कुछ जमीन बचा तो चार भाइयों में बटवारा हो गया । उसकी जिंदगी में मानो बहुत बडÞा अन्धकार छा गया । वह किर्ंकर्तव्यविमूढ हो इधर-उधर भटकने लगा । घर में साथ देने वाला तथा हौसला बढÞाने वाला केवल एक माँ थी । माता ने कहा कुछ रोजी-रोटी का उपाय करों । luck
बलराम के एक चाचा ने उसे वस्पति घी के कारखाने में मजदूर पद पर नियुक्त करवा दिया । कारखाने में मजदूरी का काम श्रम साध्य था । उसे बीस किलो का डब्बा उठा कर ट्रक में लादना पडÞता था । शाम को जब छुट्टी होती तो थकान उसे जकडÞ लेता । माँ का दिया सूखी रोटी और तरकारी खा कर वह सो तो जाता पर अगले दिन की बातें फिर से उसे सताने लगती थी । सावन का महीना वनस्पति घी का डिब्बा ट्रक लादते वक्त उसके पैर फिसल गए, वह गिर पडÞा । उसके पैरो में मोच आ गई और उसे चलने में कठिनाई होने लगी ।
मरता हर जगह मजदूर ही है । चाहे वह कारखाना मजदूर हो, किसान हो या अल्प वेतन भोगी सरकारी कर्मचारी हो । चलने में कठिनाई के कारण बलराम को कुछ दिनों के लिए आराम करने की सलाह वनस्पति घी कारखाने के मैनेजर ने दिया । वह भला क्या करता । आदेश का पालन तो करना ही था । भगवान के शरण और याद के अलावा उसे कुछ भी याद न आता था । कुछ तो ताना देते । कुछ निकम्मा कहते । उसने सोचा कुछ ही दिनों मे ठीक हो जाउँगा तो कारखाने में काम मिल जाएगा । एक सप्ताह के बाद वह कारखाना गया । कारखाना मजदूर हडÞताल के कारण कुछ दिनों के लिए बन्द था । वह निराश हो घर लौट गया ।
गरमी ने अपनी चादर फैला दी थी, चारो ओर उदास, नीरस सा वातावरण दिखाई पडÞता था । अब बहुत थोडÞे से लोग सडÞकों पर नजर आते थे । दिन भर धूलभरी सायं-साय करती हवाएँ दिल को बेचैन कर देती थी । रह-रह कर एक ही सवाल उसे मेहनत करने को मजबूर करता था कि आखिर पापी पेट को कैसे भरा जाए ।
बारिश से अब बागमती नदी शान्त थी, एकदम खामोश । प्रकाश की रश्मियों ने उसे चाँदी सा सफेद कर दिया था । पक्षी दाने की तलाश में अपने घोसलों को छोडÞ बाहर निकल पडÞे थे । धीरे-धीरे बागमती नदी का पानी अब कम होता जा रहा था ।
एक छोटी सी नाव लिए बागमती तट पर बलराम यात्रियों की बाट जोह रहा था । इतनी तपन में कोई घर से बाहर नहीं निकलता था, ऐसे समय पर सिवा यात्रियों की प्रतीक्षा के बलराम के पास कोई उपाय न था । वह दिन भर बैठता, शाम होने पर घर जाकर कुछ खा-पी आता और फिर शुरु होता एक ऐसा इंतजार जो अगली सुबह होने तक अविरल रूप से चलता रहता । बलराम सदैव अपनी किस्मत को कोसता रहता । उसे न दिन में आराम मिलता न रात को चैन । करे तो क्या करे । बेचैनी ने उसे चारो ओर से घेर लिया था । भरोसा था तो एक मात्र मुरलीधर कन्हैया पर । वह कभी भर्ीर् इश्वरीय विश्वास से विमुख न हुआ । आशा और विश्वास उसके जीवन के सहारे थे ।
एक दिन जब बलराम और उसके चाचा सुबह कुछ रूखा-सूखा खा रहे थे, तभी उनका ध्यान अचानक आसमान की ओर गया । उस दिन चारो ओर बादल ही बादल छाए हुए थे, पक्षियों का कोलाहल लगभग न के बराबर था । र्सर्ूयनारायण देवता बादलो के सँग लुका छिपी का खेल, खेल रहे थे । ऐसा प्रतीत होता था, मानो जमकर बारिश होगी । दोनों के चेहरे पर खुशी की लहर दौडÞ गई । आज उन्हें कुछ अच्छा भोजन मिलने की उम्मीद थी । दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर दोनों अपने-अपने काम पर निकल गए ।
दिन भर बादल गरजते रहे, थोडÞी बहुत बारिश भी होती रही, लेकिन जैसी बारिश की कल्पना उन्होंने की थी, वैसी बारिश नहीं हो रही थी । धीरे-धीरे दिन ढलने लगा । संयोगवश बागमती पार करने के लिए पाँच व्यक्ति आए । उसमें तीन पुरुष और दो स्त्री थे । बलराम ने उन्हें नदी पार करा दिया ओर वापस लौटा बलराम नाव को किनारे लगा खूँटी से बाँध दिया । अचानक उसका पैर एक पोटली से जा टकराया ।
यह देख कर वह दूसरे विचारों में खो गया । बडÞे ही धीरज के साथ उस पोटली को खोला । उस में उसे सोने की अंगूठी और बीस हजार रुपया मिला । आदमी को धार पार कराना तो ठीक है पर समय बस दिन साथ नहीं देता । आज बहुत अरसे बाद किस्मत ने साथ दिया । इस रुपए से चाय की एक दूकान उसने गाँव के चौराहे पर खोल ली और अपना जीवनव्यतीत करनेे लगा । वह विनम्रता से ग्राहकों चाय पिलाया करता ।
बलराम । उम्र चालीस साल । छः फुटा गठीला शरीर । घनी-नुकीली मूँछ और अपेक्षाकृत मोटे-गदराए होठ, एक खास ही तेवर था उसके व्यक्तित्व में । सवेरे चाय पीने वालों की भीडÞ लगी रहती है । चाय की दूकान पर समाचारपत्र मुफ्त में पढÞने को मिल जाता है । टाटा चाय गोल्ड पीकर लोग प्रफुल्लित हो ही जाते हैं । इस तरह बलराम कि आमदनी बढÞ गई । फिर वर्षो बाद किस्मत ने साथ दिया । नजदीक के शहर में उसने तीन कमरे का घर खरीद लिया । आज फिर बारिश हो रही है । फिर भी लोग बैठ कर चाय पी रहे हैं ।

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