किस्सा कुर्सी का

किसी के हाथ न आएगी यह कुर्सी । किसी के साथ न जाएगी यह कुर्सी । कुर्सी पर मत ललचाओ तुम । उफ, उफ, कुर्सी । हाय, हाय, कुर्सी ।
जब रोम जल रहा था तब वहां का शासक नीरो बासुंरी बजा रहा था । यहाँ वर्तमान में हमारे पीएम देश की जनताको अवहेलित कर भोज कर रहे हैं और अपने चमचों को थाली भर खिला रहे हंै । नई–नई कुर्सी मिली है आखिर क्यों न खिलाएं ?
बिम्मी शर्मा:
कुर्सी इस देश का अभिन्न अंग है । यहां के नेता और नागरिक सांस लिए बिना जी लेंगे पर कुर्सी बिना जी नहीं सकते । इस देश में १२ वें महीने कुर्सी खींचातानी का उत्सव छाया रहता है । कोई योग्य हो या न हो, शिक्षित हो या अनपढ, मुर्ख और गंवार जो भी हो वह आगा पीछा नही देखता बस पैदा होते ही कुर्सी को ताकने लगता है । कोई नेतागण अपना चेहरा आइने में नहीं झांकता पर सत्ता के गलियारे में सजी कुर्सी को जरुर निहारता रहता है ।

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यह कुर्सी है ही इतनी भुवन मोहिनी और चित्ताकर्षक की सभी इस के लिए अपनी जान देने को तैयार हैं । पर यह अलग बात है की कुर्सी मे बैठने के बाद सभी दूसरे की जान लेने को उतारु हो जाते हैं । जिस का जीता जागता मिसाल है हमारे परम पूज्य प्रधानमन्त्री श्री के.पी. ओली महाशय । ओली को जब तक पीएम की कुर्सी नहीं मिली थी तब तक वह शेर बन कर गरज रहे थे । देश के सभी समस्याओं का निपटारा अपने मुहावरे की तरह चुटकी में करने का दम भरते थे । पर पूरे देशवासी जब ईन्धन की समस्याओं से जूझ रहे हैं तब पीएम के मुँह से वकार तक नहीं फूट रहा है । अब हमारे पी एम कुर्सी के मोह पाश में जो बंध गए हैं ।
हमारे पीएम को तो यह कुर्सी का चस्का लगा ही । और उन के अगलबगल रहनें वाले चमचो को भी लग गया । अब पीएम हैं बड़े उदारवादी वह किसी को ना कर ही नहीं सकते । इसी लिए थोक के भाव में मन्त्री की कुर्सी को बांट रहे हैं । जो गणतन्त्र और धर्म निरपेक्षता का घोर विरोधी और राजावादी है उसी को हाथ जोड़ कर पीएम में समर्थन करने के लिए आग्रह करते हंै । और कीचड़ से सराबोर यह कमल भी समर्थन देने मे तनिक भी नहीं हिचकिचाता । मजे की बात तो यह है कि इस के बदले में वह परराष्ट्र मंत्री का कुर्सी हथिया लेते हैं ।
कुर्सी का खेल इस देश में सदियों से चलता आया है । इस के लिए भीमसेन थापा से ले कर जंग बहादुर राणा तक ने कइ लोगों का खून बहाया था । चाहे सात साल की क्रांति हो या छियालिस साल का बहूदल आगमन, फिर माओवादी का जनयुद्ध या त्रिसठ साल का मधेश आन्दोलन । सब ने कुर्सी पाने के लिए हजारों नागरिक की कुर्बानी ली है । अभी मधेश में चल रह आन्दोलन में करीब पचास लोगों का खून बह चुका है पर समस्या ज्यों का त्यों है । इधर मधेश की जनता पुलिस की गोली खा कर अपनी मिट्टी को खून से रंग रही है । उधर सिंह दरवार में कुर्सी का खेल चालू है ।
अपने पड़ोसी भारत में ‘कौन बनेगा करोड़पति’ का खेल टीभी पर दिखाया जाता है । पर नेपाल में ‘कौन बनेगा राष्ट्रपति’ का खेल सिंह दरवार में लाइव होता है । देश का सब से सम्मानित पद अब मजाक का विषय बन गया है । इस कुर्सी के खेल के चलते राष्ट्रपति हो या अन्य पति के पद में कोई भेद नहीं रह गया है । अब किसी की भी योग्यता या अनुभव में उंगली उठाना सत्रहवीं शताब्दी की बात है । अब योग्यता गया तेल लेने । वर्तमान में कुर्सी पर चिपके रहने के लिए जिस के पास दावपेंच नाम का ‘फेविकोल’ और चापलुसी का ‘सुपर ग्लू’ है वही कुर्सी में बैठने और रहने के लायक है ।
अब जिस के पास यह योग्यता नहीं है वह लार टपकाता हुआ मन्त्री की कुर्सी को टुकुर, टुकुर ताकता रहता है । यहां के नेता और मंत्रियों को देख कर लगता है यह कुर्सी भी ले कर ही पैदा हुए थे । तभी तो कुर्सी को ले कर इतना हाहाकार करते हैं और तड़पते हैं जितनी मछली पानी के बाहर रखने पर नहीं करती होगी । कुर्सी मे बैठने के साथ ही जो पावर और पैसा आता है उस से कुर्सी में बैठने वाले की सात पीढी तर जाती है । अपनी आने वाली पीढी को सुख, सयल कराने के लिए ही नेता कुर्सी पर जाने और उस में टिके रहने की भगीरथ प्रयास करते हैं ।
हमारे प्यारे राजदुलारे पीएम को भी खास–खास लोगों से बहुत ही लगाव है । इसी लगाव को जगजाहिर करते हुए किसी को राष्ट्रपति बना दिया तो किसी को उप राष्ट्रपति । जंगल के सारे लड़ाकुओं को ला कर सिंह दरवार के मंत्री मण्डल के फौज मे भर्ती कर दिया यानी सब को कुर्सी में बिठा दिया । कुर्सी में बैठने की पात्रता किसी के पास नहीं है पर इस को हथियाने की तिकड़म सभी जानते हंै । कुर्सी के लिए दल बदल रहे हंै, एक दूसरे की टांग खींच रहे हैं । कार्यकर्ता नाम की इस देश की भेंड़ जनता विरोधियों पर कीचड़ फेंक रहे हैं । अपने मनभावन को कुर्सी मे पहुंचाने में मदद करेगें तभी न इनको भी सत्ता का तर चाटने को मिलेगा ।
इस देश में जनता या सामान्य नागरिक भी रहते हैं ? कभी–कभी खूब हंसी आती है जब कोई खुद को जनता कह कर अपनी पीड़ा जताता है । यदि वह सच में जनता है तो मधेश की पीड़ा उसको क्यों दिखाई नहीं देती । पर वह तथाकथित जनता को खास–खास राजनीतिक पार्टी और उसके सटोरियों का ही दुख दिखाई देता है । क्योंकि वह जनता से पहले किसी पार्टी का पिछलग्गू वा कार्यकर्ता है और अपने मसीहा को ही सत्ता का तर मारने के लिए वह कुर्सी में पहुंचाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाता है और जब उसकी मनोकांक्षा पूर्ण हो जाती है वह फूलमाला और अबीर से अपने नेता की अगवानी करता है । यह कुर्सी है ही बड़ी जादुई, अच्छे अच्छों को चमचों में तब्दील कर देती हैं ।
अपनी दैनिक उपभोग्य वस्तुओं की किल्लत होने से लोगों का दिमाग खराब है तो दिल रो रहा है । पर हमारे प्रिय पीएम अपने सरकारी निवास बालुवाटार में भोज और मोज कर रहे हैं । उन्हें भूखी जनता का खाली पेट और शोकग्रस्त चेहरा नहीं दिखाई देता । जब रोम जल रहा था तब वहां का शासक नीरो बासुंरी बजा रहा था । यहाँ वर्तमान में हमारे पीएम देश की जनताको अवहेलित कर भोज कर रहे हैं और अपने चमचों को थाली भर खिला रहे हंै । नई–नई कुर्सी मिली है आखिर क्यों न खिलाएं ?
लोग खाने और खिलाने के लिए ही तो कुर्सी को हथियाना चाहते हैं । जब अपने चमचो के बल से यह कुर्सी मिली हैं तो उनको भर पेट खिलाना ही चाहिए । इस देश में खुद खाना और दूसरों को खिलाना एक अहम शिष्टाचार है । चाहे वह खाना हो या पैसा । खाओ और डकार जाओ यही इ स देश की संस्कृति है तभी तो भ्रष्टाचार यहां पर देश के विकास से ज्यादा प्रगति कर रहा है । और इस सब की जड़ है कुर्सी । यह है तभी तो सारी उठा पठक हैं । संसद में कुर्सी हैं तभी तो कोई एमाओवादी का बाहूवली विधायक इस को फेंकने की जुर्रत करता है और इस के एवज में मन्त्री पद का कुर्सी हथिया लेता है । जिसके पास कुर्सी फेंकने की ताकत है वही कुर्सी का हकदार भी हो जाता है राजनीति में ।
यह कुर्सी जो नखरे न करवाए सो कम है । कम पावरफूल मन्त्रालय का कुर्सी मिलने पर मुँह फुलाने वाले नेता की बांछे खिल जाती है जब उसे सोने सा जगमग करता गृह मन्त्रालय की कुर्सी मिल जाति है । उस कुर्सी पर वह दिन में सो जाता है और सोने चाँदी के सपने देखने लगता है । जिस को शुद्ध और सही तरीके से अपनी भाषा बोलनी नहीं आती वह सभामुख की कुर्सी को सुशोभित करती है । हमारे रोगवान पीएम को किडनी के मरीज इतने प्यारे और दुलारे लगते हैं सभी को अपने जैसा ठान कर कुर्सी बांट देते हैं । हमारे होने वाले महामहिम उप राष्ट्रपति भी किडनी के ही रोगी हैं । उसी तरह राज्यमंत्री मेघराज नेपाली भी डायलोसिस में हैं । इस सभी को देख कर लगता है यह देश किडनी के क्षेत्र मे जरुर तरक्की करेगा ।
आखिर कुर्सी किस को प्रिय नहीं है ? घर मे रखी हुई लकड़ी, बेंत और प्लास्टिक की कुर्सी तो इतनी प्यारी होती है कि हम उस में घंटों बैठना चाहते हंै । फिर यह तो देश की सत्ता की वह सर्वोच्च कुर्सी है जो हर राजनीति करनेवाला इस मे बैठना और अपने हिसाब से इस में उछलकूद करना चाहता है । घर, आफिस, सभा, सम्मेलन सभी जगह कुर्सी हाजिर है । बिना कुर्सी का नेता या जनता कोई भी एक मिनट रह नहीं पाता । पर यह कुर्सी न साथ में आई है न साथ जाएगी । इसीलिए कुर्सी सभी को ठेंगा दिखाती हुई बडेÞ जोर शोर से गाती है यह गाना…………….
किसी के हाथ न आएगी यह कुर्सी ।
किसी के साथ न जाएगी यह कुर्सी ।
कुर्सी पर मत ललचाओ तुम ।
उफ, उफ, कुर्सी ।
हाय, हाय, कुर्सी ।

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